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खुद के शहर ने ही भुला दिया फिराक

खुद के शहर ने ही भुला दिया फिराक

गोरखपुर, 27 अगस्त (वार्ता) “बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं, तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं”। उर्दू साहित्य के क्षेत्र में गोरखपुर का नाम देश दुनिया में रोशन करने वाले अजीम शायर फिराक गोरखपुर को उनके ही शहर ने बिसरा दिया है।


       गोरखपुर-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 28 पर रावत पाठशाला से होकर घंटाघर जाने वाली सड़क पर स्थित लक्ष्मी भवन में उम्दा शायर ने 28 अगस्त 1896 में जन्म लिया था। रावत पाठशाला में फिराक साहब ने शिक्षा आरम्भ की थी। लक्ष्मी भवन उनके जीते जी ही बिक गया था। फिराक के नाम पर इस शहर में न तो पार्क है और न ही भवन और न ही कोई शिक्षण संस्था। बस एक चौराहे पर उनकी प्रतिमा लगी हुयी है जिससे लगता है कि शहर में इस शायर का कोई रिश्ता था।

     साहित्यिक साधना के दम पर गाेरखपुर का नाम देश दुनिया में ऊंचा उठाने वाले फिराक ने एक बार कहा था कि ..

   हांसिले जिन्दगी तो कुछ यादे हैं ।

   याद रखना फिराक को यारों ।।

       फिराक साहब आईसीएस की नौकरी को छोडकर और गांधी जी से प्रभावित होने के बाद आजादी की लडायी में भाग लिया। उनके पिता ईश्वरीय प्रसाद वरिष्ठ अधिवक्ता थे और पंडित जवाहर लाल नेहरू उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते थे।

फिराक साहब अपनी उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए इलाहाबाद भी गये जहां वह आनन्द भवन के सम्पर्क में आये। उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में हिस्सा लिया तो घर की आर्थिक स्थिति बिगडने लगी। पंडित नेहरू को उपकी स्थिति भांपने में देरी नहीं लगी। उन्होंने फिराक साहब को कांग्रेस कार्यालय का सचिव बना दिया।

        फिराक साहब उर्दू के प्रसिद्ध शायर तो थे ही और राजनीति में भी उनकी बहुत रूचि थी। वर्ष 1962 में उन्होंने सिब्बल लाल सक्सेना के किसान मजदूर पार्टी से बांसगाव लोकसभा का चुनाव लडा था जिससे उन्हें हार का मुंह देखना पडा था।

        फिराक साहब पंडित जवाहर लाल नेहरू और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सम्पर्क में आने के बाद जीवन के आरम्भिक काल में ही राजनीति और स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड गये थे और 1923 से 1927 तक कांग्रेस के सचिव भी रहे लेकिन फिराक साहब को साहित्य की दुनिया में अपना नाम रोशन करना था इसीलिए साहित्य सृजन के क्रम को उन्होंने जारी रखा। वह पहले कानपुर फिर आगरा के एक महाविद्यानय में अंग्रेजी प्रवक्ता नियुक्त हुए और बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रवक्ता हो गये।

         अंग्रेजी भाषा पर उनका भरपूर ज्ञान भारतीय संस्कृति और संस्कृति साहित्य की अच्छी समझ . गीता के दर्शन और उर्दू भाषा के उनके लगाव ने फिराक को एक हिमालय बना दिया जहां विभिन्न दिशाओं से आने वाली धाराएं एक हो जाती है फिर फिराक सिर्फ गोरखपुर के ही नहीं बल्कि ग्लोबल हो जाते हैं।

        उन्होंने उर्दू गजल की एक नाजुक वक्त में नयी जिन्दगी दी जब लग रहा था कि नारेबाजी और खोखली शायरी गजल की प्रासांगिकता को समाप्त कर देगी लेकिन फिराक ने इस गजल में आम हिन्दुस्तानी का दर्द भर दिया तभी वह कह सके कि ....

कहां का दर्द भरा था तेरे फंसाने में

फिराक दौड गयी रूह सी जमाने में

शिव का विषपान तो सुना होगा

मैं भी ऐ दोस्त रात पी गया आंसू

इस दौर में जिन्दगी बसर की

बीमार की रात हो गयी।

फिराक साहब ने उर्दू साहित्य को उस जगह लाकर खडा कर दिया जहां दुनिया की दूसरे भाषाओं से वह काफी आगे नजर आता है। वह आवाज जिसमें एक जादू था खामोश हो गयी लेकिन फिराक ने जिस आवाज को मर मर कर पाला था

वह आवाज आज भी साहित्य की दुनिया में सुनायी दे रही है।

        मैने इस आवाज को मर मर कर पाला है फिराक

         आज जिसकी नर्म लौ है शमेय मेहरावें हैयात।

       फिराक साहब को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में वर्ष 1970 में पद्मभूषण, गुल-ए-लगमा के लिए साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ एवं सोवियत लैंड नेहरू सहित कई पुरस्कारो से भी नवाजा गया था। फिराक साहब 1970 में साहित्य अकादमी के सदस्य भी नामित हुए थे।

       फिराक गोरखपुरी की साद में प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से आयोजित आज यहां हवचार गोष्ठी में अतंराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के पूर्व कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि फिराक गोरखपुरी हिन्दू-मुस्लिम संस्कृतियों के सेतु थे। गुलामी से लेकर आजादी तक उन्होंने अपनी लेखनी से गंगा-जमुनी तहलीब को जो विरासत सौंपी उस पर देशवासियों को नाज है। दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष अनिल राय ने कहा कि फिराक ने अपने समय में जो भी लिखा उसमें उस समय की विसंगतियों के खिलाफ प्रतिरोध दिखता है।

       उन्होंने कहा कि आज के दौर में लेखकों के सामने विसंगतियों का संकट है जिससे लडना उनका दायित्व है। उन्होंने कहा कि फिराक की रचनायें इस लडायी में लेखकों का मार्गदर्शन कर सकती है।

उदय प्रदीप

वार्ता

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