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प्रौद्योगिका का फसल शोध एवं प्लांट ब्रीडिंग पर सकारात्मक प्रभाव

नयी दिल्ली 02 अगस्त (वार्ता) फेडरेशन ऑफ़ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एफएसआईआई) ने कहा है कि प्रौद्योगिकी का सीक्वेंसिंग एवं फेनोटाईपिंग के साथ फसल से संबंधित शोध एवं प्लांट ब्रीडिंग पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
संगठन के कार्यकारी निदेशक शिवेन्द्र बजाज ने यहां कहा कि जेनेटिक्स एवं जीन के काम करने के बारे में मिली जानकारी ने ब्रींडिंग की दक्षता एवं इच्छित गुणों के चयन में वृद्धि की है। किसानों एवं पौधा उत्पादकों द्वारा विभिन्न फसलों के लिए दशकों से एग्रोनोमिक डेटा एकत्रित किया गया है तथा नई प्रगति द्वारा पौधा उत्पादक जेनेटिक इन्फॉर्मेशन भी प्राप्त कर सकते हैं। आज पौधा उत्पादक जेनेटिक अंतरों को गुणों के अंतर से जोड़ सकते हैं। विस्तृत रूप से उपलब्ध डेटा के विश्लेषण से पौधा उत्पादक अपने प्रयोगों से बेहतर गुण पाने के लिए सर्वश्रेष्ठ संकर का अनुमान लगा सकते हैं। कृत्रिम योग्यता सही अनुमान लगाने में मदद करती है।
उन्होंने कहा कि जीवन के सभी पक्षों में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का समावेश आधुनिक सभ्यता की पहचान है। हम उम्मीद करते हैं कि टेक्नॉलॉजी चुनौतियों को संबोधित कर हमारा जीवन आसान बनाएगी। यही उम्मीद में खेती में टेक्नॉलॉजी के उपयोग के लिए करते हैं। किसान टेक्नॉलॉजी का उपयोग कर मशीनीकरण द्वारा खेत तैयार करने की प्रक्रिया आसान बनाते हैं और खेती के लिए इनपुट को ज्यादा प्रभावशाली बनाते हैं। खेतों की निगरानी एवं आंकड़ों का विश्लेषण, खेत में हो या फिर दूर बैठकर, यह उचित पोषक तत्वों के सप्लीमेंट एवं कीट नियंत्रण की विधियों द्वारा सेहतमंद फसल के विकास में मदद करते हैं। मशीनीकरण का उपयोग कटाई एवं उत्पाद को बाजार में पहुंचाने की प्रक्रिया में भी विस्तृत तौर पर होता है। मार्केट एक्सेस डिजिटल प्लेटफाॅर्म, जैसे मौसम के पूर्वानुमान, फसल कटाई के पूर्व तथा बाद में सभी संभावित जरूरतों, विनिमय एवं वित्तीय जरूरतों के लिए ई-नाम, एम-किसान, किसान सुविधा एवं पूसा कृषि का उपयोग कर दूर बैठे ही प्राप्त की जा सकती है। इसी प्रकार बीजों के मामले में अनुमोदित फसल के लिए बायोटेक विशेषताएं किसानों द्वारा व्यापक तौर पर स्वीकार की गई हैं।
श्री बजाज ने कहा कि उत्पादकों के लिए दूसरा टूल है प्राकृतिक तौर से होने वाली प्रक्रिया, यानि जीन एडिटिंग, जिसका उपयोग कर किसी बाहरी जीन/डीएनए की मदद के बिना निश्चित तरीके से जीन्स/डीएनए सीक्वेंसिंग में संशोधन या सुधार किया जा सकता है। जीन एडिटिंग की विभिन्न विधियों में से क्रिस्पर/कैस9 सबसे लचीला एवं यूज़र-फ्रेंडली प्लेटफार्म है, जो आरएनए डिज़ाईन पर आधारित है इसलिए सबसे किफायती है। सहज़ डिज़ाईन एवं क्रिस्पर एडिटिंग का आसान क्रियान्वयन छोटे खिलाड़ियों एवं सार्वजनिक संस्थानों द्वारा उपयोग के लिए व्यवहारिक है, जो कसावा, सेम, मटर, शकरकंद आदि फसलों के साथ विभिन्न फसलों (जैसे दाल, बाजरा एवं सब्जियों) के लिए टेक्नॉलॉजी का उपयोग करते हैं।
उन्होंने कहा कि पारंपरिक ब्रीडिंग या फिर केमिकल म्यूटाजेनेसिस क्रमशः जीन मिक्सिंग एवं म्यूटेशन की प्रक्रियाएं हैं। इसलिए सही पृष्ठभूमि में इच्छित गुण प्राप्त करने के लिए विभिन्न पीढ़ियों के विस्तृत चयन की जरूरत होती है। पारंपरिक रूप से उगाई गई फसलें केवल बीज की गुणवत्ता के लिए नियमित की जाती हैं। जीन एडिटिंग द्वारा सटीक तरीके से एक ही पीढ़ी में पारंपरिक ब्रीडिंग की भांति ही जेनेटिक परिवर्तन हो सकते हैं। इसलिए मल्टीजनरेशन चयन एवं क्रासिंग में लगने वाला समय तथा श्रम बचता है तथा अंतिम उत्पाद बिल्कुल पारंपरिक रूप से उगाए गए उत्पाद की तरह होता है।
उन्होंने कहा कि अंतिम किस्म में बहुत अल्प जेनेटिक परिवर्तन होता है तथा इसमें किसी बाहरी जेनेटिक सामग्री का समावेश नहीं होता, इसलिए अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया जैसे अनेक देशों ने इस तरह की संशोधित किस्मों को नियमों से छूट दे दी है। दक्षिण अमेरिकी देश हर मामले के आधार पर जेनेटिक परिवर्तन की तीव्रता के लिए संशोधित फसल की जाँच करते हैं और उन्हें विस्तृत जाँच या डेटा की जरूरत के बिना अल्प नियमों के दायरे में रखते हैं। इस तरह के विज्ञान आधारित नियम अभिनवता को संबल देते हैं और आगे चलकर किसानों व उपभोक्ताओं, दोनों की मदद करेंगे।
भारत भी जीन एडिटेड पौधों के लिए नियमों का विकास करने की प्रक्रिया में है। यह दक्षिण एशिया का पहला देश होगा, जहां पर इसके लिए नियम होंगे और अन्य देशों के लिए यह एक उदाहरण प्रस्तुत करेगा। विज्ञान आधारित, अनुमान आधारित नियम से सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों में टेक्नाॅलाॅजी के उपयोग में सुधार होगा एवं अनेक कंपनियां विविध फसलों में सुधार करेंगे।
शेखर
वार्ता
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