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लोकरुचि


महोबा में कजली मेला सोमवार से शुरू

महोबा में कजली मेला सोमवार से शुरू

महोबा, 27 अगस्त (वार्ता)उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का परिचायक तथा गौरवशाली वीरोचित परंपरा का संवाहक आठ सौ सैंतीस वर्ष प्राचीन वीरभूमि महोबा का सुप्रसिद्ध कजली मेला(भुजरियों का मेला) सोमवार से शुरू हो गया है।

इस अवसर पर यहां भव्य शोभायात्रा निकाली गई जिसमें सुदूर क्षेत्रों से आकर सम्मलित हुये करीब तीन लाख के अपार जनसमूह ने यहां ऐतिहासिक कीरत सागर सरोवर में सामूहिक कजली विसर्जन की पुरातन परम्परा का निर्वहन किया। इसके साथ ही महोबा समेत आसपास के क्षेत्र में रक्षाबंधन का पर्व भी हर्ष और उल्लास से मनाया गया।

उत्तर भारत के सबसे प्राचीन और विशाल मेले के रूप में विख्यात महोबा के कजली मेले की परम्परागत शुरुआत यहां 1857 में प्रथम स्वाधीनता संग्राम के अमर शहीदों के बलिदान के साक्षी हवेली दरवाजा मैदान से हुई। जिलाधिकारी सहदेव और पुलिस अधीक्षक कुंअर अनुपम सिंह ने इस मौके पर कजली की शोभायात्रा को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। बैंडबाजो और प्राचीन वाद्य यंत्रों की मधुर स्वर लहरियों के बीच हाथी, घोड़े, ऊंट तथा कजली के पर्णपात्रो को सिर पर धारण किये सैकड़ो की संख्या में महिलाओं के साथ यहां के ऐतिहासिक तथा धार्मिक परिवेश की झांकियो के साथ शोभा यात्रा जब शहर के मुख्य मार्ग से गुजरी तो इसे देखने को सड़क के दोनों ओर महिलाओ और पुरुषों की भारी भीड़ उमड़ी। लोगो ने पुष्पवर्षा करते हुए इसका करतल ध्वनि से स्वागत किया।

श्री सहदेव ने बताया कि मेले की 837 वीं वर्षगांठ में इस बार यहां कजली की शोभायात्रा में हाथी में सवार वीर आल्हा अश्वारूढ़ वीर ऊदल ,चंदेल राजकुमारी चंद्रावल का डोला आदि की झांकिया लोगों के प्रमुख आकर्षण का केंद्र रही। मेले में अपार भीड़ के कारण शोभायात्रा को लगभग दो किलो मीटर के अपने निर्धारित मार्ग को पूरा करने में पांच घंटे से भी अधिक का समय लगा। कीरत सागर तट सामूहिक कजली विसर्जन कार्यक्रम सम्पन्न होने के साथ ही यहां स्थित आल्हा परिषद के ऐतिहासिक मंच में एक सप्ताह तक अनवरत रूप से चलने वाले विविध सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भी शुरुआत हो गई।

उन्होने बताया कि विशुद्ध ग्रामीण परिवेश में आयोजित तथा बुंदेली लोककला संस्कृति का दिग्दर्शन कराने वाला कजली मेला महोबा के तत्कालीन चंदेल साम्राज्य द्वारा बारहवीं शताब्दी में हुए भुजरियों के युद्ध में मिली शानदार विजय के उत्सव की स्मृति में आयोजित होता है। प्रचलित कथा के अनुसार दिल्ली नरेश पृथ्वी राज चौहान ने तब इस क्षेत्र में अपना आधिपत्य कायम करने के लिए यहाँ आक्रमण कर चंदेल शासक परमाल से युद्ध के बदले अपनी बेटी चंद्रावल को सोपने, लोहे को छुलाने पर सोना बना देने वाली चमत्कारी पारस पथरी, नोलखा हार आदि सात महत्वपूर्ण वस्तुएं उपहार में दे उसकी आधीनता स्वीकार करने अथवा युद्ध करने का प्रस्ताव भेजा था। श्री सहदेव ने बताया कि सन 1182 में सावन माह की पूर्णिमा के दिन एकाएक अपनी मातृभूमि की आन बान और शान पर आए इस गंभीर संकट का सामना करते हुए चंदेल सेना के दो वीर सेनानायकों आल्हा और ऊदल ने अप्रतिम युद्ध कौशल का प्रदर्शन कर चौहान सेना को बुरी तरह परास्त कर विजय प्राप्त की थी। इस युद्ध मे भारी शिकस्त के साथ पृथ्वीराज चौहान को अपने एक पुत्र को भी खोना पड़ा था। पूर्णिमा का दिन तब युद्ध में गुजरने के कारण महोबा में राखी का त्योहार नही मनाया जा सका था और कजली भी विसर्जित नही हो सकी थी।

कजली मेला आयोजक महोबा संरक्षण एवम विकास समिति के सचिव तथा जिले के मुख्य विकास अधिकारी हीरा सिंह ने बताया कि ऐतिहासिक कीरत सागर तट पर 27 अगस्त से आरंभ होकर तीन सितंबर तक चलने वाले मेले को लोक रंजन का उत्सव करार देते हुए इसे अति आकर्षक स्वरूप प्रदान करने को विभिन्न खेलकूद प्रतियोगिताओ और रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अलावा इस बार दीनदयाल उपाध्याय अंत्योदय मेला व प्रदर्शनी भी आयोजित की गई है।

मेले के मुक्ताकाशी मंच पर दिन में जिले के कृषि उद्यान समाज कल्याण आदि विभागों द्वारा गोष्ठियों में लोगों को शासकीय योजनाओं की जानकारी दी जाएगी। जबकि संध्या कालीन कार्यक्रमो में यहां हर रोज विभिन्न विधाओं के प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के कलाकार सांस्कृतिक कार्यक्रमों से मेलार्थियों का मौज मनोरंजन करेंगे।

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