Thursday, Feb 21 2019 | Time 07:40 Hrs(IST)
image
BREAKING NEWS:
  • किम जोंग के साथ और मुलाकातों की उम्मीद : ट्रम्प
  • इराक में घुसपैठ करने वाले आईएस के 24 आतंकवादी हिरासत में
  • तुर्की में सैन्य प्रशिक्षण के दौरान विस्फोट, पांच सैनिक घायल
  • पाकिस्तान ने राजौरी में संघर्ष विराम उल्लंघन कर की गोलीबारी
  • पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से कश्मीर में शांति बाधित : डीजीपी
राज्य Share

सावन बीत गया, नही सुनायी पड़े कजरी के मीठे बोल

सावन बीत गया, नही सुनायी पड़े कजरी के मीठे बोल

 


मिर्जापुर, 28 अगस्त (वार्ता) उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर तथा इसके आसपास गायी जाने वाली कजरी के गीत समय के साथ अब अतीत की बात बनकर रह जायेगी।

     सावन की रिम-झिम फुहारों के साथ दो माह तक पूरे जिले में कजरी महोत्सव के रूप में चलने वाली कजरी अब अन्तिम दौर से गुजर रही है। जब लोग अपनी मिट्टी में जन्मी इस लोक साहित्य, लोक कला को जीवित रखने के लिए सरकारी अनुदान की ओर मुंह जोहते हैं। यदि समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो मिर्जापुरी कजरी अतीत की बात बनकर रह जायेगी।

       कभी मिर्जापुर माटी की रसभीनी गंध से उपजी ‘मिर्जापुरी कजली’ अपनी सहजता, सरलता, अछूती मनोभाव स्वर माधुर्य तथा संगीत रचना के लिए देश-विदेश में अद्वितीय स्थान रखती है, लेकिन आज अपने जन्मस्थली में ही पहचान खो रही है। सावन की रिमझिम फुहारों के साथ दो माह तक सारे जिले में कजरी महोत्सव के रूप में चलने वाली कजली अब मरणासन्न स्थिति में पहुच गयी है। आश्चर्यजनक यह है कि जब लोग अपनी मिट्टी में जन्मी लोक कला, लोक संस्कृति को जीवित रखने के लिए सरकारी अनुदान की मुह जोहते हैं। गांव के चैपालों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। सावन माह में पुत्रियों को मायके बुलाने की परम्परा अतीत का विषय बन गयी है। चोर सिपाही का खेल लोग भूल चुके है।

सावन भादो माह में रिमझिम फुआरे आज भी पड़ रही है लेकिन विध्यांचल में सड़कों, बाजारों, गलियों और विथिकाओं में पर्दे डाल कर गाये जाने वाले कजरी के बोल सुनने के लिये लोग तरस गये है। कजरी गीतों ने कभी स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाने में मदद की थी। कजरी के गीत देशभक्ति की प्रेरणा देते थे, लेकिन बदलते परिवेश में यह सब एक कहावत बनकर रह गयी है। सावन भादों माह में रिम-झिम फुहारें आज भी पड़ती हैं, मां विंध्यवासिनी के दरबार में आज भी भक्तों की भीड़ उन्हें उनके जन्मदिन का प्रणाम अर्पित करने के लिए जुटती है पर जिले की सड़कों, बाजारों, गलियों और विथिकाओं में पर्दे डालकर खेली जाने वाली-‘मुनियां कजरी’ अथवा ‘परय बुदियां’ की टेक के साथ मादक कजरी की गूंज अब नहीं सुनाई पड़ती।

     मिर्जापुर निवासी शिव प्रताप ने बताया कि महंगाई तथा सिनेमा के बढ़ते प्रभाव के कारण यह लोक संस्कृति विलुप्त होती जा रही है। अब पूरे सावन-भादों में यदा-कदा कजरी नृत्य के साथ महिलाएं गाती दिखाई पड़ जाती हैं।

     उन्होने बताया कि पुरूषों केबीच कजरी का दंगल अब नहीं होते है। युवक-युवतियाॅ इस स्थानीय लोक संस्कृति से कट चुके हैं। अब न घरों से चावल के अनरसों (एक मिठाई जो कजरी के दिन विशेष रूप से बनती है) की महक आती है और न ही कजरी के धुन के साथ कानों पर ‘जरई’ (जौ का पौधा) रखने की शताब्दियों पुरानी प्रथा निभाई जाती है। जागरण के दिन महफिलें तथा सारे नगर में जगह-जगह सारी रात कजरी गाती महिलाओं का झुंड अब नहीं दिखाई पड़ता। क्षेत्र अब कजरी के नामी गिरामी बफ्फत और जहांगीर के अखाडे तथा कजरी गायकी के कज्जालों से रिक्त हो चुका है।

 लोक मान्यता के अनुसार कजरी का उदभव मां कज्जला (माॅ विन्ध्यवासिनी का एक नाम) के प्रशस्ति गान के लिए हुआ था। जो कालान्तर कज्जला से कजरी नाम से प्रसिद्ध हो गया। बरसात के दो महीने सावन-भादों में तीनों तीजो की तीन त्योहारों में देवी पूजन के लिए चर्चित है।

     कजरी के दिन महिलाएं गाती बजाती कजरहवाॅ पोखरा पर जरई की मिट्टी धोने जाती हैं। जैसे होली के अवसर पर रेड के वृक्ष की स्थापना कर त्योहार मनाया जाता है ठीक वैसे ही कजरी जौ के पौधे काे स्थापित कर त्योहार मनाया जाता है। कजरी का प्रसार मध्य प्रदेश के सीमान्त जिलों तथा पूर्वान्चल के जिलाे में व्यापक रूप में हुआ। रीवाॅ एवं सीधी जिलों में विकसित कजरी को ‘दक्खिनहियां’ कहते हैं तथा वाराणसी में शास्त्रीयता का स्पर्श पाकर ‘ठुमरी’ अंग के रूप में निबद्ध करके प्रस्तुत करते हैं।

     मर्दानी कजरी दंगली, कजली गायक तख्ते पर खड़े होकर गाता है और साथी कलाकार तथा वादक मंच पर बैठे रहते हैं। चैलर कजरी की टोली में कम से कम चार गायक होते हैं जो हाथों में रंगीन डंडियां लेकर उस पर ताल देते रहते हैं। ठुनमुनिया कजली गाने वाली गांव की बालाएं आमने सामने दो कतार में खड़ी होकर बिना किसी साज के बारी-बारी एक कदम आगे बढाकर थोड़ा झुककर गाती हैं। वे गाते समय एक दूसरे के हाथ को भी थामें रहती हैं तथा गोलाकार घूमती रहती हैं। वे गीत की एक कड़ी पूरी होने पर पुनः पीछे हट जाती हैं।

     हिन्दी के कई प्रसिद्ध साहित्यकारों को भी कजरी ने आर्कर्षित किया। उन्होंने उत्कृष्ट साहित्यिक कजरियों का सृजन किया भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, चौधरी ‘प्रेमधन’, बालकृष्ण भट्ट, छविराम, जयदेव वर्मा, बेचन शर्मा आदि साहित्यकारों ने कजरी को साहित्यिक रूप भी दिया।

     गुरू-शिष्य परम्परा से निरन्तर आगे बढाने वाली इस लोककला की घरानेदारी को अखाड़ा कहा गया हालांकि अब वे अखाड़े नहीं हैं पर इस विद्या को अलग-अलग तरह से बढाने वाले अब भी अजीता श्रीवास्तव, उर्मिला श्रीवास्तव, मधुप पाण्डेय, रानी सिंह, खोखा मिर्जापुरी आदि लोग प्रमुख हैं।

More News
18 अलगावववादी नेताओं की सुरक्षा वापस

18 अलगावववादी नेताओं की सुरक्षा वापस

20 Feb 2019 | 11:39 PM

नयी दिल्ली/ जम्मू 20 फरवरी (वार्ता) जम्मू-कश्मीर सरकार ने 14 फरवरी को पुलवामा में हुए भीषण आतंकवादी हमले के बाद बड़ा कदम उठाते हुए यासीन मलिक, सैयद अली शाह गिलानी, सलीम गिलानी, मौलबी अब्बास अंसारी समेत 18 अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा बुधवार को वापस ले ली।

 Sharesee more..

ईसागढ़ छात्रावास अधीक्षक निलंबित

20 Feb 2019 | 11:27 PM

 Sharesee more..

मालगाड़ी के छह डिब्बे पटरी से उतरे

20 Feb 2019 | 11:26 PM

 Sharesee more..

कमलनाथ मिलने पहुंचे बावरिया से

20 Feb 2019 | 11:16 PM

 Sharesee more..
image