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भारत अमेरिका के बीच खुलेगा रक्षा क्षेत्र में नवान्वेषण एवं व्यापार का रास्ता

भारत अमेरिका के बीच खुलेगा रक्षा क्षेत्र में नवान्वेषण एवं व्यापार का रास्ता

नयी दिल्ली 04 सितंबर (वार्ता) भारत और अमेरिका के विदेश एवं रक्षा मंत्रियों की ‘टू प्लस टू’ बैठक में दोनों देशों के बीच रक्षा क्षेत्र में संयुक्त रूप से उच्च प्रौद्योगिकी वाले नवान्वेषण एवं व्यापार का रास्ता खोलने तथा हिन्द-प्रशांत क्षेत्र को समावेशी, सुरक्षित, शांतिपूर्ण एवं सबके लिए समान रूप से खुला बनाने के नये रोडमैप पर चर्चा होने की संभावना है।

अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस के साथ अमेरिकी सैन्य बलों के प्रमुखों की समिति के अध्यक्ष भी बुधवार शाम को नई दिल्ली पहुंच रहे हैं और गुरुवार को उनकी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज तथा रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ बैठक होगी। बैठक के बाद ये नेता प्रेस वक्तव्य देंगे और शाम को चारों की संयुक्त रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भेंट होगी।

बैठक की तैयारियों से जुड़े सूत्रों के अनुसार भारत एवं अमेरिका वैश्विक रणनीतिक साझीदार होने के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्वतंत्र एवं संप्रभु देश हैं और अधिकांश मुद्दों पर इनकी एक राय होने के साथ कुछ मामलों में भिन्न-भिन्न राय भी रखते हैं। टू प्लस टू बैठक में हिन्द-प्रशांत क्षेत्र, आतंकवाद निरोधक कार्रवाई, ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक साझीदारी पर बातचीत होने की संभावना है। विदेश मंत्रियों की द्विपक्षीय बैठक में आव्रजन के मुद्दे पर भी बात होगी।

सूत्रों के अनुसार अमेरिकी रक्षा मंत्री श्री मैटिस ने हिन्द-प्रशांत क्षेत्र को लेकर एक अवधारणा की रूपरेखा तैयार की है। इस बैठक में उसे सुनने का मौका मिलेगा। हिन्द प्रशांत क्षेत्र और भारत-अमेरिका-जापान-ऑस्ट्रेलिया की चतुर्भुजीय प्रणाली के बारे में सूत्रों ने साफ किया कि यह संवाद की एक प्रणाली है। भारत हिन्द-प्रशांत क्षेत्र को समावेशी, सुरक्षित, शांतिपूर्ण एवं सबके लिए समान रूप से खुले क्षेत्र के रूप में देखना चाहता है।

श्री पोम्पियो भारत के बाद इस्लामाबाद के दौरे पर जाएंगे। पाकिस्तान की नयी इमरान खान सरकार के बारे में उनके विचार क्या हैं, यह भी सुनने का मौका मिलेगा। सूत्रों ने कहा कि आतंकवाद निरोधक उपायों पर भी चर्चा होगी लेकिन उन्होंने इस बैठक की विषयवस्तु के बारे में अधिक नहीं बताया।

अमेरिका ने गत वर्ष भारत को प्रमुख रक्षा साझीदार का दर्जा दिया था और इस साल सामरिक प्रौद्योगिक समझौता (एसटीए) 1 का दर्जा दे दिया है जिससे दोहरे उपयोग की प्रौद्योगिकी को भारत को बिना रोकटोक हस्तांतरित करना संभव हो गया है। सूत्रों के अनुसार इस बैठक में रक्षा क्षेत्र में नवान्वेषण और मेक इन इंडिया के तहत भारत में उत्पादन को बढ़ावा दिया जाएगा। दोनों देशों के बीच रक्षा व्यापार एवं प्रौद्याेगिकी पहल को आगे बढ़ाने को लेकर भी बात होगी। इसके अलावा इस्पात एवं अल्युमिनियम आदि पदार्थों पर शुल्क का मुद्दा भी व्यापारिक मसलों में शामिल रहेगा।

रूस से एस-400 मिसाइल कवच के सौदे को लेकर अमेरिकी रुख के बारे में सवालों पर सूत्रों ने साफ किया कि कैटसा कानून अमेरिकी कांग्रेस का बनाया हुआ है और उसके बारे में कोई भी रुख अमेरिका को ही तय करना है। भारत इस बारे में क्या कदम उठाएगा, यह प्रश्न अभी नहीं उठता है। भारत के सभी महाशक्तियों से संबंध स्वतंत्र हैं। इस साल भारत के प्रधानमंत्री ने चीन एवं रूस के नेताओं से मुलाकात की है। उन्होंने कहा कि भारत एवं अमेरिका के बीच टू प्लस टू संवाद जैसी प्रणाली भारत एवं चीन के बीच भी है।

ईरान के बारे में सूत्रों ने कहा कि भारत एवं अमेरिका के बीच गत वर्ष तेल एवं गैस आयात में सर्वाधिक वृद्धि दर्ज की गयी और करीब ढाई अरब डॉलर का आयात रहा। लेकिन भारत तेल एवं गैस के आयात पर आधारित अर्थव्यवस्था वाला देश है और तकरीबन 25 प्रति आयात ईरान से होता है। अमेरिका हिन्द प्रशांत क्षेत्र में भारत को सशक्त देखना चाहता है और भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव ना आये, यह भी उसके हित में होगा। सूत्रों का कहना है कि हम कोशिश करेंगे कि अमेरिका की अपेक्षा क्या है, वह हमें बताए और हम बताएंगे कि हमारी अमेरिका से क्या अपेक्षा है।

चाबहार बंदरगाह के बारे में भी देखना होगा कि इस बंदरगाह से अफगानिस्तान को वैकल्पिक समुद्री मार्ग मिला है जो उसके विकास के लिए बहुत अहम है। अफगानिस्तान सरकार की भी इस बारे में एक राय है जिसे अमेरिका को सुनना होगा। भारत अमेरिका से अनुरोध करेगा कि चाबहार को प्रतिबंधों के दायरे से बाहर रखा जाये।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी सूत्रों ने साफ किया कि भारत ईरान काे परमाणु शस्त्र संपन्न नहीं देखना चाहता है लेकिन परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के उसके अधिकार का हिमायती है। पांच महाशक्तियों एवं एक देश के साथ ईरान के संयुक्त समझौते जेसीपीओए को लेकर कोई समस्या है तो उसे पक्षकार आपस में मिल कर सुलझाएं तो ही अच्छा रहेगा। ईरान को भी संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के दायरे में भी काम करना चाहिए।

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