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वन्य प्राणी बारहसिंगा संरक्षण के लिए बनी हस्‍तिनापुर सेंचुरी मानव हस्तक्षेप की शिकार

वन्य प्राणी बारहसिंगा संरक्षण के लिए बनी हस्‍तिनापुर सेंचुरी मानव हस्तक्षेप की शिकार

अमरोहा, 06 जुलाई (वार्ता) उत्तर प्रदेश में गंगा के किनारे वनाच्छादित क्षेत्र में वन्य प्राणी बारहसिंगा संरक्षण के लिए बनाई गई हस्तिनापुर सेंचुरी मानव हस्तक्षेत के चलते अपने उद्देश्य से भटकने के बावजूद वर्षा ऋतु आने पर उत्तराखण्ड से बारहसिंगों का मूवमेंट सेंचुरी की ओर देखा गया है।


       मुख्य वन संरक्षक वाईल्ड लाईफ हस्तिनापुर सेंचुरी ललित कुमार वर्मा ने बताया कि विश्व की संकटग्रस्त प्रजातियों की सूची में शामिल बारहसिंगा जो उत्‍तर प्रदेश का राज्‍य पशु भी है। अब बरसात शुरू होने पर  हस्तिनापुर सेंचुरी में वापस आ रहे हैं। दरअसल यह वन्य जीव सर्दियों में उत्‍तराखंड की ओर रुख कर लेते हैं। अब बरसात में वहां बाढ़ आने के कारण ये घर वापसी कर रहे हैं।




     वाइल्‍ड लाइफ इंस्‍टीट्यूट ऑफ इंडिया (डब्‍ल्‍यूआईआई) के एक अध्‍ययन में इनके हस्‍तिनापुर की ओर रुख करने का पता चला है। उनक कहना है क‍ि जीपीएस सैटेलाइट कॉलर की मदद से बारहसिंगा के उत्‍तराखंड से उत्‍तर प्रदेश में आने की जानकारी मिली है। पिछले दिनों देहरादून स्‍थ‍ित डब्‍ल्‍यूआईआई ने गंगा किनारे उत्‍तराखंड और उत्‍तर प्रदेश के हस्तिनापुर में बारहसिंगा पर एक सर्वे किया था। यहां इनकी संख्‍या करीब 400 पता चली थी। इनमें सबसे ज्‍यादा उत्‍तराखंड में मिले थे।



      उन्होंने बताया कि उत्‍तराखंड के झिलमिल ताल के पास इनकी संख्‍या लोगों को हैरान कर देने वाली रही। बारहसिंगा पर अध्‍ययन करने वाली विशेषज्ञ टीम वन्यजीव जंतुओं को लेकर समय समय पर अनुसंधान व अध्ययन करती रहती है।, उत्‍तराखंड का झिलमिल ताल  बिजनौर (उत्तर प्रदेश) से लगभग 20 किलोमीटर ऊपर है। लगभग दो माह पूर्व झिलमिल ताल के पास दो मादा बारहसिंगा पर जीपीएस सैटेलाइट कॉलर लगाकर अध्‍ययन शुरू किया गया था। इनमें से एक उत्‍तराखंड और दूसरी हस्‍तिनापुर सेंचुरी पहुंच चुकी है।

 मुख्य वन संरक्षक वर्मा ने बताया कि कॉलर की मदद से हर तीन घंटे में बार‍हसिंघा की लोकेशन मिलती रहती है। प्रदेश के पांच जिलों बिजनौर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, अमरोहा तथा हापुड़ को मिलाकर गंगा नदी के किनारे वनाच्छादित क्षेत्र में 2073 वर्ग   किलोमीटर में फैली इस सेंचुरी में अब नाममात्र के जीवजंतु ही शेष बचे हैं। उत्तराखंड के अलग हो जाने के बाद से वन क्षेत्र बढाए जाने के प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं।

      उन्होंने बताया कि दिनों दिन बढते मानव हस्तक्षेप से वन्यजीवों मे अपेक्षित बढोत्तरी नहीं हो पा रही है। वर्ष 1986 में बनी हस्तिनापुर सेंचुरी की केन्द्र सरकार द्वारा घोषणा वन्यजीव जंतुओं खासतौर से बारहसिंगा को बचाने के लिए ही की गई थी लेकिन सेंचुरी मे स्थानीय लोगों के बढते हस्तक्षेप से इसका उद्देश्य अधूरा ही रह गया।

      उन्होंने बताया कि वन क्षेत्र में अवैध रूप से खेती करने के मामले हमेशा से चर्चा का बिंदु बने रहते हैं। वन विभाग ने अवैध कब्जे जमाए बैठे लोगों से काफी वन भूमि मुक्त भी कराई गई है, लेकिन अभी भी सेंचुरी घोषित क्षेत्र की जमीन पर अवैध कब्जेदारों का बोलबाला है।

     उन्होंने बताया कि इस सबके बावजूद बारहसिंगा की मौजूदगी अमरोहा से लेकर बिजनौर, मुजफ्फरनगर, मेरठ और हापुड़ तक देखी गई है। इसमें डाल्फिन, घडियाल,बारहसिंघा के अलावा सांभर तथा तेंदुए, नीलगाय,, खरगोश, समेत कई अन्य जीव जंतु रहते हैं।

 श्री वर्मा ने बताया कि बारहसिंगगा वर्षा ऋतु में पहाड़ों से नीचे आ जाते हैं और सर्दियों में वहां वापस लाैट जाते हैं। इस तरह इनका लगातार मूवमेंट बना रहता है। मौसम और दलदली जमीन पर बढ़ रही खेती को भी इनके घर छोड़ने की वजह माना जाता रहा है। बारहसिंगा झुंड में संख्या लगभग 12 के आसपास होती है, इस कारण इसको यह नाम दिया गया। ये दलदली जगह पर पाए जाते हैं। इस कारण इन्‍हें स्वैम्प डियर भी कहा जाता है।

      उन्होंने बताया कि ये शाकाहारी होते हैं और इनकी ऊंचाई 130-135 सेमी. होती है। इनका वजन लगभग 180 किग्रा. होता है। वाईल्ड लाईफ अब बारहसिंघा को लेकर काफी संवेदनशील है, और उसके बढोत्तरी व सुरक्षा, संरक्षण के प्रति गंभीर है। केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई इस सेंचुरी का उद्देश्य तभी पूरा हो पाएगा जब तक उसमें बाहरी दखलअंदाजी पर पूरी तरह रोक नहीं लग पाती है।

    गंगा नदी के तटवर्ती मंडी धनौरा रैंज के वनक्षेत्राधिकारी भुवनचंद पंत ने बताया कि क्षेत्र में वृक्षों, वन्यजीवों के प्रति जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। जिससे लोगों में वन क्षेत्र को लेकर सकारात्मकता के प्रति रुझान बढ़ेगा

    उन्होंने बताया कि वनों की चोरी छिपे अवैध कटाई ने पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचाया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वन क्षेत्र में काफी कमी आई है। वन विभाग ने वित्तीय वर्ष 2015-16 में यूपी का आर्थिक क्षेत्रवार भौगोलिक एवं वनाच्छादित क्षेत्रफल के आधार पर गणना की थी, जिसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश का पूरा भौगोलिक क्षेत्रफल 79,832 वर्ग किलोमीटर है। इसमें कुल 3,938 वर्ग किमी यानी 4.93 प्रतिशत क्षेत्र ही वन आच्छादित बचा है। जबकि प्रदेश के अन्य हिस्सों में वनआच्छादित क्षेत्रफल की प्रतिशत मात्रा अधिक है।

      इसी प्रकार केंद्रीय उत्तर प्रदेश की 5.29, पूर्वी उत्तर प्रदेश की 9.16 और बुदेलखंड की 8.29 प्रतिशत है।पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विगत पांच वर्ष में सधन वन क्षेत्रफल का दायरा सिकुड़ा है। वर्ष 2011 में सघन वन का दायरा 7 प्रतिशत के आसपास था जो वर्ष 2016 के आंकड़े की तुलना में यह 2 प्रतिशत कम हुआ है।

 पर्यावरणविद् पर्यावरण पुरुष रूपचंद नागर ने बताया  कि विकास के नाम पर  पिछले 10 वर्षाें से हो रही लगातार अवैध कटाई ने जहां मानवीय जीवन को प्रभावित किया है, वहीं असंतुलित मौसम चक्र को भी जन्म दिया है। वनों की अंधाधुंध कटाई होने के कारण देश का वन क्षेत्र घटता जा रहा है, जो पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत चिंताजनक है। गजरौला औद्योगिक क्षेत्र में बहते रासायनिक अपशिष्ट से जल, जंगल जमीन को हानि पंहुचाई है।

     उन्होंने बताया कि विकास कार्यों, आवासीय जरूरतों, उद्योगों तथा खनिज दोहन के लिए भी पेड़ों-वनों की कटाई वर्षों से होती आयी है। कानून और नियमों के बावजूद वनों की कटाई धुआंधार जारी है। वनों और वृक्षों का विनाश मौजूदा दौर में पश्चिम उत्तर प्रदेश की सबसे गंभीर और संवेदनशील समस्या बन गया है। आंकड़े गवाह हैं कि केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही नहीं देश में भी पिछले 15 सालों में शहर बसाने और विकास के नाम पर हर मिनट 9.3 हेक्टेयर वन उजाड़ दिए गए।

     उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने कई ऐसे कानून बनाए जो वन या पेड़ काटने पर सजा के लिए काफी थे, लेकिन उन कानूनों का आज तक कोई पालन नहीं हुआ है। पारिस्थितियों के संतुलन के लिए कंजरवेशन एक्ट 1980 लागू हुआ। 1988 में संरक्षण कानून पास हुआ। 1985 में राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड की स्थापना की गई। 1986 की राष्ट्रीय वन नीति में 60 प्रतिशत पर्वतीय भूभाग तथा कृषि भूमि को छोड़कर 20 प्रतिशत मैदानी भाग को वनाच्छादित करने का लक्ष्य रखा गया, लेकिन ये सब कागजों में चल रहा है।

     जिला वनाधिकारी रमेश चंद्र ने बताया कि अमरोहा की छह हजार हेक्टेयर,मंडी धनौरा रैंज मे प्राकृतिक वन क्षेत्र तो रहा नहीं इसलिए प्रति वर्ष 100-200 हेक्टेयर भूमि पर वृक्षारोपण किया जाता है। जटीवन, हसनपुर क्षेत्र में वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। गंगा नदी के बाढ प्रभावित क्षेत्र में हर साल वृक्ष जल प्रवाह में बह जाते हैं। सागौन, शीशम , जामुन खैर, यूकेलिप्टस आदि पेड पौधों से वनच्छाादित क्षेत्र बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। इसके लिए समय-समय पर अभियान चलाया जाता है।


मुख्य वन संरक्षक वर्मा ने बताया कि कॉलर की मदद से हर तीन घंटे में बार‍हसिंघा की लोकेशन मिलती रहती है। प्रदेश के पांच जिलों बिजनौर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, अमरोहा तथा हापुड़ को मिलाकर गंगा नदी के किनारे वनाच्छादित क्षेत्र में 2073 वर्ग किलोमीटर में फैली इस सेंचुरी में अब नाममात्र के जीवजंतु ही शेष बचे हैं। उत्तराखंड के अलग हो जाने के बाद से वन क्षेत्र बढाए जाने के प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं।

उन्होंने बताया कि दिनों दिन बढते मानव हस्तक्षेप से वन्यजीवों मे अपेक्षित बढोत्तरी नहीं हो पा रही है। वर्ष 1986 में बनी हस्तिनापुर सेंचुरी की केन्द्र सरकार द्वारा घोषणा वन्यजीव जंतुओं खासतौर से बारहसिंगा को बचाने के लिए ही की गई थी लेकिन सेंचुरी मे स्थानीय लोगों के बढते हस्तक्षेप से इसका उद्देश्य अधूरा ही रह गया।

उन्होंने बताया कि वन क्षेत्र में अवैध रूप से खेती करने के मामले हमेशा से चर्चा का बिंदु बने रहते हैं। वन विभाग ने अवैध कब्जे जमाए बैठे लोगों से काफी वन भूमि मुक्त भी कराई गई है, लेकिन अभी भी सेंचुरी घोषित क्षेत्र की जमीन पर अवैध कब्जेदारों का बोलबाला है।

उन्होंने बताया कि इस सबके बावजूद बारहसिंगा की मौजूदगी अमरोहा से लेकर बिजनौर, मुजफ्फरनगर, मेरठ और हापुड़ तक देखी गई है। इसमें डाल्फिन, घडियाल,बारहसिंघा के अलावा सांभर तथा तेंदुए, नीलगाय,, खरगोश, समेत कई अन्य जीव जंतु रहते हैं।

श्री वर्मा ने बताया कि बारहसिंगगा वर्षा ऋतु में पहाड़ों से नीचे आ जाते हैं और सर्दियों में वहां वापस लाैट जाते हैं। इस तरह इनका लगातार मूवमेंट बना रहता है। मौसम और दलदली जमीन पर बढ़ रही खेती को भी इनके घर छोड़ने की वजह माना जाता रहा है। बारहसिंगा झुंड में संख्या लगभग 12 के आसपास होती है, इस कारण इसको यह नाम दिया गया। ये दलदली जगह पर पाए जाते हैं। इस कारण इन्‍हें स्वैम्प डियर भी कहा जाता है।

उन्होंने बताया कि ये शाकाहारी होते हैं और इनकी ऊंचाई 130-135 सेमी. होती है। इनका वजन लगभग 180 किग्रा. होता है। वाईल्ड लाईफ अब बारहसिंघा को लेकर काफी संवेदनशील है, और उसके बढोत्तरी व सुरक्षा, संरक्षण के प्रति गंभीर है। केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई इस सेंचुरी का उद्देश्य तभी पूरा हो पाएगा जब तक उसमें बाहरी दखलअंदाजी पर पूरी तरह रोक नहीं लग पाती है।

गंगा नदी के तटवर्ती मंडी धनौरा रैंज के वनक्षेत्राधिकारी भुवनचंद पंत ने बताया कि क्षेत्र में वृक्षों, वन्यजीवों के प्रति जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। जिससे लोगों में वन क्षेत्र को लेकर सकारात्मकता के प्रति रुझान बढ़ेगा

उन्होंने बताया कि वनों की चोरी छिपे अवैध कटाई ने पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचाया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वन क्षेत्र में काफी कमी आई है। वन विभाग ने वित्तीय वर्ष 2015-16 में यूपी का आर्थिक क्षेत्रवार भौगोलिक एवं वनाच्छादित क्षेत्रफल के आधार पर गणना की थी, जिसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश का पूरा भौगोलिक क्षेत्रफल 79,832 वर्ग किलोमीटर है। इसमें कुल 3,938 वर्ग किमी यानी 4.93 प्रतिशत क्षेत्र ही वन आच्छादित बचा है। जबकि प्रदेश के अन्य हिस्सों में वनआच्छादित क्षेत्रफल की प्रतिशत मात्रा अधिक है।

इसी प्रकार केंद्रीय उत्तर प्रदेश की 5.29, पूर्वी उत्तर प्रदेश की 9.16 और बुदेलखंड की 8.29 प्रतिशत है।पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विगत पांच वर्ष में सधन वन क्षेत्रफल का दायरा सिकुड़ा है। वर्ष 2011 में सघन वन का दायरा 7 प्रतिशत के आसपास था जो वर्ष 2016 के आंकड़े की तुलना में यह 2 प्रतिशत कम हुआ है।

पर्यावरणविद् पर्यावरण पुरुष रूपचंद नागर ने बताया कि विकास के नाम पर पिछले 10 वर्षाें से हो रही लगातार अवैध कटाई ने जहां मानवीय जीवन को प्रभावित किया है, वहीं असंतुलित मौसम चक्र को भी जन्म दिया है। वनों की अंधाधुंध कटाई होने के कारण देश का वन क्षेत्र घटता जा रहा है, जो पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत चिंताजनक है। गजरौला औद्योगिक क्षेत्र में बहते रासायनिक अपशिष्ट से जल, जंगल जमीन को हानि पंहुचाई है।

उन्होंने बताया कि विकास कार्यों, आवासीय जरूरतों, उद्योगों तथा खनिज दोहन के लिए भी पेड़ों-वनों की कटाई वर्षों से होती आयी है। कानून और नियमों के बावजूद वनों की कटाई धुआंधार जारी है। वनों और वृक्षों का विनाश मौजूदा दौर में पश्चिम उत्तर प्रदेश की सबसे गंभीर और संवेदनशील समस्या बन गया है। आंकड़े गवाह हैं कि केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही नहीं देश में भी पिछले 15 सालों में शहर बसाने और विकास के नाम पर हर मिनट 9.3 हेक्टेयर वन उजाड़ दिए गए।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने कई ऐसे कानून बनाए जो वन या पेड़ काटने पर सजा के लिए काफी थे, लेकिन उन कानूनों का आज तक कोई पालन नहीं हुआ है। पारिस्थितियों के संतुलन के लिए कंजरवेशन एक्ट 1980 लागू हुआ। 1988 में संरक्षण कानून पास हुआ। 1985 में राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड की स्थापना की गई। 1986 की राष्ट्रीय वन नीति में 60 प्रतिशत पर्वतीय भूभाग तथा कृषि भूमि को छोड़कर 20 प्रतिशत मैदानी भाग को वनाच्छादित करने का लक्ष्य रखा गया, लेकिन ये सब कागजों में चल रहा है।

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