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अष्टमी पर पांच लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने किया विंध्यवासिनी के दर्शन

अष्टमी पर पांच लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने किया विंध्यवासिनी के दर्शन

विंध्याचल (मीरजापुर), 04 अप्रैल (वार्ता) देश के कोने-कोने से आये पांच लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने आज चैत्र नवरात्र की अष्टमी को 51 शक्तिपीठों में एकमात्र पूर्णपीठ मानी जाने वाली मां विंध्यवासिनी की पूर्जा अर्चना की। तडके से ही मंदिर परिसर के बाहर लगी श्रद्धालुओं की लंबी कतार देर शाम तक खत्म होने का नाम नही ले रही थी। इस दौरान माता के जयकारे के अलावा “या देवी सर्वभूतेषू शक्ति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्ये, नमस्तस्ये, नमस्तस्ये नमो नम:॥” मंत्र का उच्चारण लगातार गुंजायमान हो रहा है। आदिशक्ति की लीला भूमि विंध्यवासिनी धाम में सालभर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, पर शारदीय और चैत्र नवरात्र में यहां देश के कोने-कोने से आए भक्तों का सैलाब उमड़ा रहता है। यहां 12 किलोमीटर के दायरे में तीन प्रमुख देवियां अष्टभुजा पहाड़ी पर अष्टभुजी देवी तो कालीखोह पहाड़ी पर महाकाली स्वरूपा चामुंडा देवी विराजमान है। इनके बीच तीसरी देवी महालक्ष्मी के रूप में मां विंध्यवासिनी विराजमान हैं। मेला अधिकारी चन्द्र प्रकाश ने बताया कि आज अष्टमी पूजन के अवसर में अपरान्ह तक पांच लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने मां विंध्यवासिनी के दर्शन कर लिये थे। मंदिर क्षेत्र में श्रद्धालुओं की बडी संख्या में भीड लगी हुई है। लोग दर्शन के लिए लम्बी कतार में सुबह अपनी पारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बडी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने के मद्देनजर जिला प्रशासन ने सुरक्षा की चाकचौबन्द व्यवस्था की है। 


            श्री प्रकाश ने बताया कि विंध्यवासिनी के दरबार में दर्शन के लिए सालभर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, हालांकि नवरात्र के दौरान प्रतिदिन डेढ से ढाई लाख श्रद्धालु मां के दर्शन कर रहे हैं। अब तक 18 लाख से अधिक श्रद्धालु दर्शन कर चुके हैं। मां विंध्यवासिनी मंदिर के प्रधान पुजारी मोहित मिश्रा ने ‘यूनीवार्ता’ से कहा कि मान्यताओं के अनुसार तीनों देवियों के त्रिकोण परिक्रमा के दर्शन किए बिना विंध्याचल की यात्रा अधूरी मानी जाती है। इस पुण्य स्थल का बखान पुराणों में तपोभूमि के रूप में किया गया है। शास्त्रों और पुराणों में मां विंध्यवासिनी के ऐतिहासिक महात्म्य का अलग-अलग वर्णन किया गया है। श्री मिश्रा ने बताया कि नवरात्र के दिनों में बडी संख्या में श्रद्धालुओं की यहां भीड पहुंचती है। अधिसंख्य लोग मां के पताका के दर्शन करके ही खुद को धन्य मानते हैं। मान्यताओं के अनुसार शारदीय और वासंतिक नवरात्र में मां भगवती नौ दिनों तक मंदिर की छत के ऊपर पताका में ही विराजमान रहती हैं। हालांकि मां के दर्शन किये बगैर कोई लौटता नहीं है, लेकिन ऐसी मान्यता है कि पताका के भी दर्शन होने पर भी श्रद्धालु अपनी यात्रा पूरी मानते हैं।


           सोने के इस ध्वज की विशेषता है कि यह सूर्य चंद्र पताकिनी के रूप में जाना जाता है। यह निशान सिर्फ मां विंध्यवासिनी के पताका में ही होता है। नवरात्र के दिनों में मां मन्दिर के पताका पर वास करती हैं ताकि किसी वजह से मंदिर में न पहुंच पाने वालों को भी मां के दर्शन हो जाएं। उन्होंने बताया कि श्रद्धालु मां विंध्यवासिनी पीठ के दर्शन तो साल के बारहों महीने करते हैं, लेकिन यहां नवरात्र का विशेष महत्व है। यहां शारदीय तथा वासंतिक नवरात्र में लगातार चौबीस घंटे मां के दर्शन होते हैं। नवरात्र के दिनों में मां के विशेष श्रृंगार के लिए मंदिर के कपाट दिन में चार बार बंद किए जाते हैं। सामान्य दिनों में मंदिर के कपाट रात 12 बजे से भोर चार बजे तक बंद रहते हैं। प्रधान पुजारी ने बताया कि नवरात्र में महानिशा पूजन का भी अपना महत्व है। यहां अष्टमी तिथि पर वाममार्गी तथा दक्षिण मार्गी तांत्रिकों का जमावड़ा रहता है। आधी रात के बाद रोंगटे खड़े कर देने वाली पूजा शुरू होती है। तांत्रिक यहां अपनी तंत्र विद्या सिद्ध करते हैं। कुछ रामगया घाट स्थित श्मशानघाट पर पूजन करते हैं तो कुछ तांत्रिक अपनी आराध्य मां तारा देवी के मंदिर में पूजन करते हैं। साधक भैरवकुण्ड पर भैरव तंत्र की साधना करते है। वाममार्गी तांत्रिक यहां अपनी आराध्य का पूजन पंचमाकार तरीके से करते हैं। दक्षिणपंथी तंत्र साधक सात्विक पूजन करते हैं। इसमें नींबू, जायफल आदि से पूजा होती है। महानिशा पूजन को देखने के लिए भी काफी संख्या में लोग पहुंचते हैं। कमजोर दिल के व्यक्ति वाममार्गी तंत्र साधना में हिस्सा नहीं लेते।


            अघोरपंथी तंत्र साधक वाममार्गी विधि से मां का पूजन करते हैं। मान्यताओं के अनुसार मां के हर श्रृंगार के बाद उनके अलग रूप के दर्शन होते हैं। मां का सबसे सुन्दर श्रृंगार रात्रि के दर्शनों में होता है। पुजारी ने बताया कि यहां के लोगों का सरल जीवन मां भगवती की भक्ति से ओतप्रोत है तथा इस क्षेत्र की लोक कलाओं का कोई सानी नहीं। जप, तप, ध्यान, ज्ञान, आस्था, संस्कृति, सभ्यता व पर्यटन की अनूठी मिसाल विंध्याचल सही मायने में जीने की कला सिखाता है। उन्होंने बताया कि पवित्र गंगा की कलकल करती धाराओं से लगा यह क्षेत्र महज भूखंड नहीं, बल्कि कला एवं संस्कृति का अद्भुत अध्याय है। यहां की माटी में अतीत के विविध तथ्य समाहित हैं। यहां से कुछ ही किलोमीटर दूर चुनारघाट से लगा ऐतिहासिक चुनारगढ़ का किला है, जिससे अनेक किंवदंतियां जुड़ी हैं। तंत्र साधना की संगमे नील तंत्र पुस्तक में इस बात का वर्णन है कि जहां विंध्याचल पर्वत को पतित पावनी गंगा स्पर्श करती हैं वहीं मां विंध्यवासिनी का वास है। इस महाशक्तिपीठ में वैदिक तथा वाम मार्ग विधि से पूजन होता है। 


 


            श्री मिश्र ने शास्त्रों का हवाला देते हुए बताया कि आदिशक्ति देवी कहीं भी पूर्णरूप में विराजमान नहीं हैं, विंध्याचल ही ऐसा स्थान है जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं। अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है। लगभग सभी पुराणों के विंध्य महात्म्य में इस बात का वर्णन है कि 51 शक्तिपीठों में मां विंध्यवासिनी ही पूर्णपीठ हैं। यहां सच्चे दिल से की गई मां की पूजा कभी बेकार नहीं जाती। हर रोज यहां हजारों लोग मत्था टेकते हैं और देवी मां का पूजन करते हैं। दो शक्तिपीठ स्थल देश से बाहर हैं जिनमेें एक नेपाल की गोहेश्वरी पीठ और दूसरी पाकिस्तान की हिंगलाज पीठ है। उन्होंने बताया कि पुरानी मान्यता है कि पुरोहितों के साथ मां के पूजन से यजमान के शरीर में मौजूद अदृश्य बुरी शक्तियां पुरोहित में स्थानांतरित हो जाती हैं। यही वजह है कि यहां लगातार पूजन करने वालों के अपने पुरोहित होते हैं। यहां मां का श्रृंगार कोई भी श्रद्धालु सामग्री देकर करा सकता है। श्रृंगार हो जाने के बाद सबसे पहले श्रृंगार कराने वाले को ही दर्शन कराए जाने की व्यवस्था है। श्री मिश्रा ने बताया कि पर्यटन के लिहाज से भी विंध्यधाम अपना खास स्थान रखता है। विंध्य क्षेत्र में ही देवीधाम के आसपास चालीस किलोमीटर वृत्त क्षेत्र में पुरातात्विक महत्व के नौगढ़ और विजयगढ़ के विश्वप्रसिद्ध किले मौजूद हैं, जबकि विंडमफॉल, राजदरी, देवदरी, लखनिया दरी जैसे झील-झरनों से लबरेज नैसर्गिक क्षेत्र हैं। यहां जाने वाले उसके आसपास का मनोरम दृश्य उन्हे वहीं बस जाने को विवश करता है। 


 

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