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रक्तदान किया तो 90 की उम्र में भी रह सकते हैं सेहतमंद

रक्तदान किया तो 90 की उम्र में भी रह सकते हैं सेहतमंद

डॉ़ आशा मिश्रा उपाध्याय से 


नयी दिल्ली, 16 फरवरी (वार्ता) हमारा खून का कतरा-कतरा जहां कई मौतों को रोकता है वहीं यह हमारे तन-मन को ढलती उम्र में भी ‘सुंदर’ बनाए रखने मेें मदद करता है। इसके जीते जागते उदाहरण दक्षिण अफ्रीका के 90 वर्षीय मॉरिस क्रेसविक अौर अमेरिका के हाॅराल्ड मेनडेनहाल (88) हैं जो इस ‘महादान’ की वजह से अपने हम उम्रों के मुकाबले बहुत सेहतमंद और खुशहाल जिन्दगी बिता रहे हैं। रक्तदान हृदयाघात और कैंसर समेत कई गंभीर बीमारियों से बचाव में कारगर होने के साथ-साथ मोटापे से भी मुक्ति दिलाने में सहायक है। अब तक कई लीटर खून दान करने वाले दक्षिण अफ्रीका के क्रेसविक और अमेरिका के फ्लोरिडा के मेनडेनहाल आज भी तंदुरुस्त हैं तथा उन्हें एक भी दवा की जरूरत नहीं है। दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में बेहद खूबसूरत ओल्ड हाेम “ईल्फिन लॉज रिटायरमेंट विलेज” में रह रहे क्रेसविक 18 साल की उम्र में सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गये थे। किसी अजनबी के खून से नयी जिन्दगी पाने वाले क्रेसविक ने अपने शरीर के पोर-पोर में महक रहे ‘लाल गुलाब’ से कई जिंदगियाें में खुशबू और रंग भरने का व्रत लिया और मन की खूबसूरती की मिसाल पेश करते हुए अपने जैसे हजारों चेहरों के लिए आदर्श बनें। अबतक 413 पाइंट्स यानी 195़ 4 लीटर रक्त दान करने वाले क्रेसविक को नियमित रूप से सर्वाधिक खून देने वाले व्यक्ति के रूप में वर्ष 2010 में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में शामिल किया गया। लंबे समय तक खुशमिजाज और स्वस्थ बने रहने का राज क्रेसविक इन शब्दों में व्यक्त करते हैं, “ खून का कतरा-कतरा अहमियत रखता है। आप यह देखकर अचंभित रह जायेंगे कि एक यूनिट खून से क्या हासिल किया जा सकता है। मौके पर पहुंच कर मौत को मात देने वाले खून की यह खूबी मेरे स्वस्थ मन का राज है और धूम्रपान से दूरी मेरी सेहत का मंत्र।” कैंसर से पत्नी फ्रैनकी की मौत के बाद सदमे से उबरने के लिए मेनडेनहाल 07 जुलाई 1977 से रक्त दान कर रहे हैं । जिंदगी के नाजुक मोड़ पर अपने दो जवान बेटों को भी खोने वाले मेनडेनहाल ने रक्तदान करने से मुंह नहीं मोड़ा। बेहद स्वस्थ मेनडेनहाल अब तक वह 400 गैलन खून दे चुके हैं। उन्होंने तीन मौतों के गहरे सदमे से उबरने के लिए इस पुण्य काम को अपनी जीवन शैली में शामिल किया। वह अधिकतर प्लेटलेट्स दान देने देते हैं। वह अभी भी प्लेटलेट्स के माध्यम से हर साल छह गैलन खून देकर कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे कई लोगों की मदद कर रहे हैं। मेनडेनहाल के शब्दों में “ईश्वर ने मुझे जो कुछ भी दिया है मैं उसका ऋणी हूं और खून दान देकर उसके प्रति अपना दायित्व निभाने का अदना-सा काम कर रहा हूं। जब तक चलता फिरता रहूंगा, महीने में दो बार ब्लड बैंक जाकर ‘उसका’ शुक्रिया अदा करता रहूंगा।


             रेड क्रॉस सोसायटी के संयुक्त सचिव एवं कार्यवाह महासचिव डॉ़ वीर भूषण ने ‘यूनीवार्ता’ से कहा “ चूंकि खून की न तो कोई फैक्ट्री है और न ही इसे किसी से जबरदस्ती लिया जा सकता है। थैलेसीमिया, कैंसर ,सड़क हादसे एवं बड़े ऑपरेशन जैसी कई परिस्थितियों में समय पर खून देकर मरीजों की जान बचायी जाती है। हर देश में आबादी के एक प्रतिशत खून की आवश्यकता होती है। हमारे यहां करीब 30 लाख यूनिट खून की कमी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानक के तहत भारत में सालाना एक करोड़ यूनिट रक्त की जरूरत है लेकिन 75 लाख यूनिट ही उपलब्ध हो पाता है। विशेषज्ञों के अनुसार देश में कुल रक्तदान का केवल 59 फीसदी स्वैच्छिक होता है। एेसे में आवश्यकता यह है कि इस ‘यज्ञ’ में स्वेच्छा से आहूति देने वालों की संख्या बढ़े और यह तभी संभव है जब रक्तदान करने के संबंध में व्याप्त भ्रांतियों को दूर किया जाये। इस दिशा में जागरुकता की कमी के कारण हर वर्ष कई मौतें हो रही हैं।” डॉ़ भूषण ने कहा कि आम तौर पर लोगों में गलत धारणा बनी हुयी है कि रक्तदान से कमजोरी हाेती है और एचबी का स्तर कम होने समेत कई परेशानियां होती हैं जबकि सच्चाई इसके उलट है। खून देने के स्वास्थ्य संबंधी कई फायदे तो है हीं, साथ ही नौजवानों में ‘मैचोमैन’ की फीलिंग भी आती है कि वे सामाज के लिए कुछ कर रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि खून दान करने वाले व्यक्ति में 24 घंटे के अंदर खून की मात्रा सामान्य हो जाती है और उसके एचबी के स्तर में काेई खास अंतर नहीं आता है। तीन माह के अंदर व्यक्ति दोबारा रक्त दे सकता है। उन्होंने कहा “हमारे शरीर में ‘सिक्वेस्टरेड ब्लड सेल्स’ हैं जो जरूरत पड़ने पर सक्रिय हो जाते हैं और बोन मैरो से भी ब्लड सेल्स बनते हैं। रक्त नहीं निकलने पर वैसे भी 21 दिनों के अंदर रेड ब्लड सेल्स मर जाते हैं और नये बनने लगते हैं। एक तरह से रक्त चक्र का नवीनीकरण हो जाता है। इसके अलावा आयरन के ओवरलोड से होने वाली बीमारियाें की आशंका कम हो जाती है। अगर हम रक्तदान को मोटापा कम करने में कारगर होने की बात करें तो आपको जानकर हैरानी होगी कि एक बार रक्तदान करने में हमारी 650 कैलोरी खत्म होती है।” उन्होंने कहा कि हर दूसरे सेकेंड में किसी न किसी को खून की जरूरत पड़ती है। डॉक्टर, विशेष तौर पर बड़े संस्थानों के, बेहद अनिवार्य परिस्थितियों में किसी मरीज में खून चढ़ाते हैं क्योंकि ‘जीरो विंडो पीरियड रिस्क’वाला कोई भी देश नहीं है। कई बीमारियों का विंडो टाइम लंबा होता है। यानी एचआईवी ,मलेरिया समेत कई संक्रमण ऐसे हैं जो सात से 20 दिनों के बाद जांच में सामने आते हैं। कोई व्यक्ति एचआईवी से संक्रमित है और उसे भी नहीं मालूम है कि उसे इस तरह का कोई संक्रमण है, ऐसे में यह संक्रमण खून चढ़ाए जाने वाले व्यक्ति में पहुंच जाता है। हमारे देश में हर 10 हजार खून के नमूनों में तीन मामले एचआईवी पॉजिटिव के निकलते हैं।


                संयुक्त सचिव ने कहा “खून देने के कारण किसी को खतरा नही होता। अच्छा हाेता कि हर स्वस्थ व्यक्ति स्वेच्छा से यह नेक काम करे। उन्होंने कहा“ हम थैलेसीमिया पीड़ितों और गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगोें को मुफ्त में खून मुहैया करवाते हैं और बाकी मामलों में तय मानकों के अनुरूप ही मामूली रकम ली जाती है। खून की विभिन्न जांचों में अलग -अलग खर्च आता है। सरकारी अनुदान मिलता है लेकिन उसे और बढ़ाये जाने की जरूरत है ताकि यह सोसायटी अपनी सेवाएं आैर अच्छी तरह से दे पाये।” डॉ़ भूषण ने कहा“ व्यक्तियों द्वारा स्वेच्छा से दान किया गया खून सबसे अच्छी गुणवत्ता का हाेता है और हमारे देश में ऐसे कई ‘मॉरिस क्रेसविक’ और ‘हाॅराल्ड मेनडेनहाल’ की जरूरत है।” सफ्दरजंग अस्पताल के प्रोफेसंर एवं कंसलटेंट(सर्जरी) डॉ. चिंतामणि ने कहा कि रक्तदान की बात करने से पहले इसके बारे में आम लोगों को जानना आवश्यक है तभी हम औरों को जिंदगी देने में सहायक और अपने लिए हितकारी हाे सकते हैं। डॉ. चिंतामणि ने कहा “धमनियों, हृदय एवं नसिकाओं में प्रवाहित होने वाले खून के माध्यम से शरीर में पोषण, इलेक्ट्रोलाइट, हार्मोन, विटामिन, एंटीबॉडी, ऊष्मा और ऑक्सीजन पहुँचती है और यह अपशिष्ट तत्व और कार्बन डाई ऑक्साइड को निकालती है। खून संक्रमण से लड़ता है और जख्मों को भरने में मदद करता है। इसकी कमी से हमारी जान चली जाती है। ऐसे में रक्तदान एक तरफ जहां मरते हुए व्यक्ति के लिए “संजीवनी” है वहीं दानकर्ताओं के लिए सबसे बहुमूल्य वस्तु जिसे देकर वह कई जिंदगियां बचा कर आत्मसंतुष्टि के साथ -साथ बेहतर स्वास्थ्य का ‘हकदार’ बन सकता है। उन्होंने कहा“ हमारे शरीर के वजन का 70 फीसदी खून है। शरीर में किसी भी प्रकार के संक्रमण के खिलाफ पहली अवरोधक श्वेत रक्त कणिकाएं होती हैं। ग्रेनुलोसाइट श्वेत रक्त कणिकाएँ रक्त कोशिकाओं की दीवारों के साथ तैरती हैं और विषाणुओं को नष्ट करती हैं। लाल रक्त कणिकाएं शरीर के अंगों और कोशिकाओं तक ऑक्सीजन पहुंचाती हैं।दो-तीन बूंद खून में करीब एक अरब लाल रक्त कणिकाएं होती हैं। रक्त प्रवाह तंत्र में लाल रक्त कणिकाएँ करीब 120 दिनों तक जिंदा रहती हैं। प्लेटलेट्स खून के जमने में मददगार होते हैं और यह ल्यूकेमिया एवं कैंसर के मरीजों की जिन्दगी में अहम है। इसका 60 फीसदी द्रव्य और40 फीसदी ठोस होता है। द्रव्य यानी प्लाज्मा में 90 प्रतिशत पानी और 10 फीसदी पोषक तत्व, हार्मोन इत्यादि होते हैं। यह भोजन ,दवाओं आदि से काफी जल्दी बन जाता है। लेकिन खून का ठोस हिस्सा, जिसमें आरबीसी, डब्ल्यू बीसी और प्लेटलेट्स होते हैं उसे दोबारा बनने में काफी समय लगता है और यहीं पर स्वेच्छा से रक्तदान करने वालों की अहम भूमिका शुरू होती है। जितना समय एक मरीज को इन तत्वों को वापस पाने में लगता है उसमें उसकी जान जा सकती है। कभी-कभी शरीर इन्हें वापस लाने की स्थिति में भी नहीं रहता। जब तक विज्ञान खून बनाने की तकनीक विकसित नहीं कर लेता तब तक रक्तदान पर टिकी हैं कई जिंदगियां। सिर्फ हम और आप उस व्यक्ति को बचा सकते हैं जिसे खून की जरूरत है।”


                 राम मनोहर लोहिया अस्पताल के डॅा. प्रभात कुमार (एमडी मेडिसिन) ने कहा कि एक यूनिट यानी 350 मिलीलीटर खून तीन लोगों को मौत से बचाता है। स्वेच्छा से रक्तदान करने वाले स्वस्थ व्यक्तियों में एक तरफ जहां ‘फील गुड’ का एहसास हाेता है वहीं दूसरी तरफ यह कदम उनके स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद है। रक्त देने से खून में आयरन की अधिकता घटती है जिससे कोलेस्ट्राॅल का स्तर कम होता है। डॉ. कुमार ने कहा “आयरन युक्त भोजन करने से एक समय के बाद शरीर में इसकी अधिकता हो जाती है। शरीर में जरूरत पूरी हाेने के बाद आयरन दिल की धमनियों, पेनक्रियाज आैर लिवर में जमने लगता है। इससे सिरोसिस, लीवर, पेनक्रियाज ,उच्च रक्तचाप, दिल और कैंसर की बीमारियों की चपेट में आने की आशंका बढ़ जाती है। तय मानकों के तहत हर तीन माह में रक्त दान करने वाले व्यक्तियों को मानसिक सुख-शांति के साथ-साथ अच्छा स्वास्थ्य भी मिलता है। ” उन्होंने कहा कि डब्ल्यूएचओ ने 14 जून को विश्व रक्तदान दिवस घोषित किया है। उच्च आय वाले देशों में प्रति एक हजार पर 33.1 लोग रक्त दान करते हैं जबकि मध्यम आये वाले देश में यह अनुमान प्रति एक हजार पर 11.7 है। ऐसे में इन देशाें में रक्त दान के प्रति जागरुकता बढ़ाने और भ्रांतिया दूर करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा “वक्त और रक्त देकर कोई भी इंसान ‘सुपरमैन’ एवं ‘स्पाइडरमैन’ बनकर तीन लोगों की जान बचा सकता है। एक बार खून देने से एक ग्राम के चौथे हिस्से के बराबर आयरन शरीर से कम हो जाता है। रक्त दान से शरीर में खून का प्रवाह अच्छा रहता है। धुआं, सिगरेट, हाई कोलेस्ट्रॉल डाइट, स्ट्रेस आदि खून को गाढ़ा बना देते हैं। इससे शरीर में खून का प्रवाह असामान्य हो जाता है। खून के गाढ़ा होने से ऑक्सीजन टिश्यू (ऊतकों) तक उचित मात्रा में नहीं पहुंच पाती। मजे की बात यह भी है कि आप अपना खून ब्लड बैंक में सुरक्षित रखवा सकते हैं ताकि कभी आपको खून की जरूरत पड़ गयी तो आपको आसानी से और सुरक्षित रक्त मिल सके । डॉ़ कुमार ने कहा कि ‘प्रोफेशनल डोनर’ का खून सर्वाधिक नुकसानदायक हो सकता है,क्योंकि ऐसे लोग प्राय: हेपेटाइटिस सी एवं बी, सिफिलिस या एचआईवी से संक्रमित होते हैं। हीमोग्लोबिन 12.5 से अधिक वाला कोई भी स्वस्थ्य व्यक्ति जिसकी उम्र 18 से 60 साल के बीच हो और 45 किलोग्राम से अधिक वजन का हो तथा जिसे हेपेटाइटिस बी या सी अथवा एचआईवी जैसी बीमारी न हो, रक्तदान कर सकता है। इसके अलावा रक्तदाता ऐसे होने चाहिए जिन्होंने कम से कम 12 सप्ताह पहले तक रक्त दान नहीं किया हो और पिछले 12 महीने में रक्त लिया भी नहीं हो। श्वास की बीमारी जैसे लगातार खांसी, जुखाम, गला खराब, या लंबे समय से एंटीबायोटिक लेने वाले , अस्थमा में स्टेरॉयड लेने वाले, बड़े ऑपरेशन कराने वाले , एनजाइना, ब्लॉकेज एवं अंत:स्रावी ग्रंथियों के रोगियों से रक्त नहीं लिया जाता। उन्होंने कहा कि मधुमेह में इंसुलिन लेने वाले और किडनी एवं पाचनतंत्र के रोगी भी रक्तनदान नहीं कर सकते। हेपेटाइटिस, एचआईवी एड्स, सिफलिस, तपेदिक आदि के रोगी तो रक्त दान के बारे में सोच भी नहीं सकते। जिन्हें बेहोशी अथवा मिर्गी आती है और पिछले 03 वर्षो में पीलिया हुआ हो, वे इस नेक काम को अंजाम नहीं दे सकते। छह माह की गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएं भी रक्तदान नहीं कर सकतीं। ऐसी स्थितियों से बाहर आने पर रक्तदान संबंधी सभी अनिवार्यताएं पूरा करने के बाद ही वेे इस ‘महायज्ञ’ में शामिल हो सकते हैं।

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