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समाजवादी आंदोलन के पहले अनुयायी थे कमांडर

समाजवादी आंदोलन के पहले अनुयायी थे कमांडर

इटावा, 24 जून (वार्ता) आजादी की लड़ाई में अपनी जुझारू प्रवृत्ति और हौसले के बूते अंग्रेजी हुकूमत का बखिया उधड़ने वाले अर्जुन सिंह भदौरिया को स्वतंत्रता सेनानियों ने कमांडर की उपाधि से नवाजा। कमांडर ने इसी जज्बे से आजाद भारत में आपातकाल का जमकर विरोध किया। तमाम यातनाओं के बावजूद उन्होने हार नहीं मानी जिससे प्रभावित क्षेत्र की जनता ने सांसद चुन कर उन्हे सर आंखों पर बैठाया।

दुनिया के सबसे बड़ें लोकतंत्र में 25 जून 1975 काले अध्याय के तौर पर दर्ज है जब देश में आपातकाल लागू किया गया था। इस दौरान चंबल घाटी से जुडे उत्तर प्रदेश के इटावा के इस शख्स के बगावती तेवरों से सरकार थर्रा गयी थी। समाजवादी कमांडर के तौर पर शोहरत बटोरने वाले अर्जुन सिंह भदौरिया की चर्चा यहां के बाशिंदे आज भी गर्व से करते है । आपातकाल मे जेल की यातना झेलने वाले कंमाडर को 1977 में यहां की जनता ने सांसद चुना था। कमांडर नाम का यह शख्स ही समाजवादी आंदोलन का पहला और बड़ा अनुयाई बना। चंबल के बीहड़ों में कभी समाजवादी आंदोलन इसी शख्स की बदौलत फला फूला रहा। क

आजादी से पहले समाजवादियों ने यहां लाल सेना का गठन किया था जिसका काम जबरन सरकारी कामकाज बाधित करना था । कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया नौजवानों ने इस दल के नेता के रूप में उभरे । लोहिया,जयप्रकाश नारायण और आचार्य कृपलानी जैसे दिग्गजों ने उनके जज्बे को देख कर के उन्हें कमांडर करना शुरू कर दिया । यह विश्लेषण उनके नाम से ताजिंदगी चिपका रहा ।

10 मई 1910 को बसरेहर के लोहिया गांव में जन्मे अर्जुन सिंह भदौेरिया ने 1942 में अंग्रेजी शासन के खिलाफ बिगुल फूंक दिया। 1942 में उन्होंने सशस्त्र लाल सेना का गठन किया । बिना किसी खून खराबे के अंग्रेजों को नाको चने चबबा दिये । इसी के बाद उन्हें कमांडर कहा जाने लगा । 1957,1962 और 1977 में इटावा से लोकसभा के लिए चुने गए । कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया संसद में भी उनके बोलने का अंदाज बिल्कुल जुदा रहा। 1959 में रक्षा बजट पर सरकार के खिलाफ बोलने पर उन्हें संसद से बाहर उठाकर फेंक दिया गया । लोहिया ने उस वक्त उनका समर्थन किया । पूरे जीवनकाल में लोगों की आवाज उठाने के कारण 52 बार जेल भेजे गए । इसमें आपातकाल का भी शामिल है। आपातकाल में उनकी पत्नी तत्कालीन राज्यसभा सदस्य श्रीमती सरला भदौरिया और पुत्र सुधींद्र भदौरिया अलग-अलग जेलो में रहे । पुलिस के खिलाफ इटावा के बकेवर कस्बे में 1970 के दशक में आंदोलन चलाया था । लोग उसे आज भी बकेवर कांड के नाम से जानते हैं । इटावा में शैक्षिक पिछड़ेपन समस्या आवागमन के लिए पुलों का आभाव जैसी समस्याओं को मुख्यता के साथ कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया उठाते रहे ।

अर्जुन सिंह भदौरिया की एक खासियत यह भी रही है कि चाहे अग्रेंजी हुकूमत रही हो या फिर भारतीय कमांडर कभी झुके नहीं है । लोकतांत्रिक भारत में भी तीन बार सांसद के लिए चुने गए उनकी पत्नी भी राज्यसभा के चुनाव जीती । यह बात अलग है कि 2004 में जब उन्होंने आंखें बंद की तब तक समाजवाद और समाजवादियो ने नई रंगत हासिल कर ली थी ।

जनहित के बडे और अहम मुददे उठाने मे कंमाडर का कोई सानी नही रहा है । 27 फरवरी 2016 को अर्से से उपेक्षित चंबल घाटी मे यात्री रेलगाडी की शुरूआत होते ही उस सपने को पर लग गये जो साल 1958 मे इटावा के सांसद कंमाडर अर्जुन सिंह भदौरिया ने देखा था । 1957 मे पहली बार सांसद बनने के बाद चंबल मे कंमाडर के रूप से लोकप्रिय अर्जुन सिंह भदौरिया ने सदियो से उपेक्षा की शिकार चंबल घाटी मे विकास का पहिया चलाने के इरादे से रेल संचालन का खाका खींचते हुए 1958 मे तत्कालीन रेल मंत्री बाबू जगजीवन राम और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के सामने एक लंबा चौडा मांग पत्र इलाकाई लोगो के हित के मददेनजर रखा था जिस पर उनको रेल संचालन का भरोसा भी दिया गया था । कंमाडर 1957 के बाद 1962 और 1977 मे भी इटावा के सांसद निर्वाचित हुए लेकिन उनकी चंबल घाटी मे रेल संचालन की योजना को किसी भी स्तर पर शुरूआत नही हो सकी लेकिन कंमाडर के चंबल रेल संचालन की योजना को 1986 सिंधिया परिवार के चश्मोचिराग माधव राव सिंधिया ने पूरा करने का बीडा उठाते हुए देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ रखा जिस पर तत्कालिक तौर पर अमल शुरू हो गया ।

श्री भदौरिया के पुत्र सुधींद्र भदौरिया का कहना है कि उनके पिता ने चंबल मे आजादी के आंदोलन के दौरान जो तकलीके देखी थी,उनको दूर करने की दिशा मे सांसद बनने के बाद कई अहम निर्णय लेते हुए उनको दूर करने की दिशा मे काम किया ।

उन्होने बताया कि जब उनके पिता इटावा के सासंद हुआ करते थे तब इटावा का दायरा फिरोजाबाद से लेकर बिल्हौर तक हुआ करता था । वो कहते है उनको आज भी याद है कि चंबल नदी पर पुल का निर्माण नही था तब पीपे के पुल बना हुआ था जब कभी भी चंबल के पार जाना होता था तब पीपे के पुल के ही माध्यम से जाना हुआ करता था ।

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