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पांच बार जीत दर्ज करा चुकी कांग्रेस और भाकपा घोसी में लड़ रहे अस्तित्व की लड़ाई

पांच बार जीत दर्ज करा चुकी कांग्रेस और भाकपा घोसी में लड़ रहे अस्तित्व की लड़ाई

मऊ, 04 मई (वार्ता)उत्तर प्रदेश की घोसी लोकसभा सीट पर आजादी के बाद पांच बार जीत दर्ज करने वाली काग्रेंस तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(भाजपा) पिछले दो दशक से जीत तो दूर, दोनाें दल मुख्य लड़ाई में भी शामिल नही हो सके।

देश आजाद होने के बाद 1952 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अलगू राय शास्त्री को अपना उम्मीदवार बनाया और चुनाव को जीतकर वे घोसी सीट से पहले सांसद बने। इसके बाद 1957 में उमराव सिहं काग्रेंस केटिकट पर जीत दर्ज की। 1962 में भाकपा से जय बहादुर सिहं, 1967 और 71 में भाकपा से झारखंडे राय ने लगातार दो बार सांसद बने। लेकिन 1977 में शिवराम राय जनता पार्टी ने झारखंडे राय को हैट्रिक लगाने से रोक दिया। हालांकि उसके अगले ही चुनाव 1980 में फिर से झारखंडे राय भाकपा से तीसरी बार सांसद बने। 1984 के चुनाव में राजकुमार राय काग्रेंस से सांसद बने।

अब आया 1989 जब घोसी में शुरू हुआ कल्पनाथ युग, जब लगातार 1989 व 91 में कल्पनाथ राय काग्रेंस से चुनाव जीतकर सांसद बने। वही 1996 में निर्दल तो 1998 में समता पार्टी के बैनर तले सांसद बनकर लगातार चार बार सांसद बनने का रिकॉर्ड अपने नाम किया। यह चुनाव कल्पनाथ राय के जीवन का अंतिम चुनाव साबित हुआ जब अचानक 1999 में हार्ट अटैक से उनके निधन की सूचना आई और पूरा जिला अवाक सा रह गया। कल्पनाथ राय के निधन के बाद जिले में एक सूनापन आ गया। इसके बाद दोनों दल इस सीट पर कोई जीत दर्ज नही कर पाये।

कांग्रेस पार्टी के बड़े चेहरे कहे जाने वाले कल्पनाथ राय के निधन के बाद 1999 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने उनकी धर्मपत्नी सुधा राय को प्रत्याशी बनाया। सहानुभूति लहर के बावजूद उनको मुंह की खानी पड़ी। बहुजन समाज पार्टी से बालकृष्ण चौहान चुनाव जीतकर अपनी पार्टी का पहली बार खाता खोला। उसके बाद 2004 में चन्द्रदेव राजभर समाजवादी पार्टी, 2009 में दारा सिहं चौंहान बसपा और 2014 के चुनाव में हरिनारायण राजभर भाजपा से चुनावी जंग को पहली बार फतह किया। लेकिन 1984 में भाकपा और 1996 में काग्रेंस ने चुनाव हारा तो फिर अपनी जमीन को अभी तक तलाश रहे है।

इस बार 2019 के लोकसभा चुनाव में भी जमीन वापस मिलती हुई नही दिख रही है। गठबंधन और भाजपा की लङाई मानी जा रही है। काग्रेंस प्रत्याशी और बसपा बागी पूर्व सांसद बालकृष्ण चौंहान और भाकपा से पार्टी के ही राष्ट्रीय महासचिव अतुल कुमार अंजान अपनी पार्टियों के खोये हुए अस्तित्व को वापस लौंटाने की लङाई लङ रहे है। लेकिन इसका परिणाम अगामी 23 मई को ही मिल पायेगा।

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