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सीधी लोकसभा सीट की डगर कांग्रेस के लिए टेढ़ी

सीधी लोकसभा सीट की डगर कांग्रेस के लिए टेढ़ी

सीधी 14 मार्च (वार्ता) मध्यप्रदेश की लोकसभा की महत्वपूर्ण सीटों में से एक सीधी में कभी किसी एक दल का लगातार दबदबा नहीं रहा लेकिन पिछले दाे चुनावों से भारतीय जनता पार्टी ने जीत हासिल कर अपनी स्थिति मजबूत की है और कांग्रेस को वापसी करने के लिए कड़ी मशक्कत करनी होगी।

इस सीट पर हुये अब तक के चुनावों पर नजर डाली जाये तो यहां मुख्य मुकाबला कांग्रेस-भाजपा के बीच रहा है। यह सीट 1952 से 1977 तक अनारक्षित रही सीट पर पहली जीत का सेहरा जहां सोसलिस्ट पार्टी के सिर बंधा वहीं दो उपचुनावों सहित सात चुनावों में तीन बार कांग्रेस को जीत मिली जबकि एक एक बार निर्दलीय, भारतीय लोक दल और जनता पार्टी के प्रत्याशी के सिर जीत का सेहरा बंधा था। वर्ष 1980 से 2007 तक यह सीट अनुसूचित जनजाति के लिये आरक्षित हुई। इस दौरान इस सीट पर एक उप चुनाव सहित हुये नौ चुनावों में कांग्रेस-भाजपा ने चार-चार बार जीत दर्ज की। जबकि एक चुनाव कांग्रेस (तिवारी) ने जीती।

वर्ष 2009 में पुन: अनारक्षित हुई सीधी लोकसभा सीट में भाजपा ने जीत दर्ज की और 2014 में अपनी जीत को बरकारार रखते हुये एक लाख से अधिक अंतर से विजय हासिल की। सीधी संसदीय सीट अन्तर्गत आने वाली आठ विधानसभाओं में से सात में भाजपा का और एक में कांग्रेस का कब्जा है । ऐसे में 2019 का सीधी लोकसभा चुनाव जीतना कांग्रेस के लिए टेढ़ी डगर होती दिखाई दे रही है । आठ विधानसभा सीटें सीधी, चुरहट, सिहावल, धौहनी, देवसर, चितरंगी, सिंगरौली और ब्यौहारी है ।

देश की राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह का अपने गृह जिले की सीधी सीट पर 1980 से 1996 के दौरान काफी प्रभाव रहा है। उनके प्रभाव के चलते इस दौरान हुये पांच चुनावों कांग्रेस को तीन बार अौर एक बार उनकी नई पार्टी कांग्रेस (तिवारी) को जीत मिली।

सीधी विधानसभा सीट से लगातार पांच बार जीत हासिल करने वाले प्रदेश के पूर्व मंत्री इंद्रजीत कुमार पटेल को कांग्रेस ने 2009 में यहां चुनाव मैदान में उतारा था। उन्हें भाजपा प्रत्याशी गोविन्द मिश्रा से करीब 45 हजार से अधिक अंतर से हार का सामना करना पड़ा। वहीं 2014 के चुनाव में पुन: कांग्रेस प्रत्याशी रहे इन्द्रजीत कुमार को रीति रजनीश पाठक से एक लाख से अधिक अंतर से हार का सामना करना पड़ा।

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