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खत्म हो रहे झूले, बिसार दी गई कजरी

खत्म हो रहे झूले, बिसार दी गई कजरी

इलाहाबाद, 16 अगस्त (वार्ता) प्रतीक्षा, मिलन और विरह की अविरल सहेली, निर्मल और लज्जा से सजी-धजी नवयौवना की आसमान छूती खुशी, आदिकाल से कवियों की रचनाओं का श्रृंगार कर उन्हें जीवंत करने वाली लाेकगीतो की रानी ‘कजरी’ आधुनिक परंपरा की चकाचौंध में बिसरा दी गयी है।

सावन शुरू होते ही पेड़ों की डाल पर पड़ने वाले झूले और महिलाओं द्वारा गाई जाने वाली कजरी अब आधुनिक परंपरा और जीवन शैली में विलुप्त सी हो गई है। एक दशक पहले तक सावन शुरू होते ही गांवों में कजरी की जो जुगलबंदी होती थी, वह अब कहीं नजर नहीं आती है। घर की महिलाएं और युवतियां भी कजरी गाते हुए झूले पर नजर आती थीं, लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं है।

सावन के शुरूआत से ही कजरी के बोल और झूले गांव-गांव की पहचान बन जाते थे। “झूला पड़ै कदंब की डाली, झूलैं कृष्ण मुरारी ना” के बोल से शुरू होने वाली कजरी दोपहर से शाम तक झूले पर चलती रहती थी। कजरी के गायन में पुरुष भी पीछे नही थे। दिन ढलने के बाद गांव में कजरी गायन की मंडलियां जुटती थीं। देर रात तक कजरी का दौर चलता था। पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों में कजरी की खासी धूम हुआ करती थी, लेकिन अब इसको जानने वाले लोग गिने चुने रह गये हैं। शिक्षिका बिनोदनी पाण्डेय ने बताया कि समय के साथ पेड़ गायब होते गये और बहुमंजिला इमारतों के बनने से घर के आंगन का अस्तित्व लगभग समाप्त हाे गया। ऐसे में सावन के झूले और कजरी गीत भी इतिहास बनकर हमारी परंपरा से गायब हो रहे हैं। आधुनिकता की दौड़ में प्रकृति के संग झूला झूलने की बात अब दिखायी नहीं देती। प्रकृति के साथ जीने की परंपरा थमी जा रही है और झूला झूलने का दौर भी अब समाप्त हो रहा है।

श्रीमती पाण्डेय ने बताया कि हिंदी महीने की प्रत्येक माह की अपनी खुशबू है। सावन एवं भादों का महीना प्रकृति के और नजदीक ले जाता है। झूला झूलने के दौरान गाये जाने वाले मधुर गीत मन को सुकून पहुंचाने वाले होते हैं। आधुनिक समय में पुरूष, महिला, किशोर, किशोरियां और बच्चे वीडियो, कम्प्यूटर और मोबाइल के मोह में कैद हो गये हैं, जिसके चलते लोक गायन उपेक्षित हो गया है।

संगम स्नान करने पहुंची प्रतापगढ़ के गौरा निवासिनी शिक्षिका ने बताया कि अब न/न तो कजरी के कलाकार रहे और न ही कद्रदान। जैसे जैसे पुरानी पीढ़ी खत्म होती जा रही कजरी भी दम तोड़ती जा रही है। अब न कोई सिखने वाला है और न ही सीखने वाला। नये लोग इसे हीन भावना से देखते हैं और इसे सीखने का प्रयास भी नहीं करते। अब तो नयी कोशोरियां फिल्मी गीतों के अलावा कजरी क्या है यह भी नहीं जानती।

उन्होने बताया कि अपने यहां भले ही पारंपरिक लोकगीतों का महत्व कम हो रहा है, लेकिन विदेशों में अब भी इनकी धूम है। भारत के बाहर सूरीनाम, त्रिनिदाद, मारिशस आदि देशों में भारतवंशी पारंपरिक लोेेकगीतों को अब भी काफी चाव से सुनते हैं। उन्होने पूछा कि जब विदेशों में अपनी पारंपरिक लोकगीतों की लोगों में चाहत है तो यहां क्यों नहीं। प्रतीक्षा, मिलन और विरह की अविरल सहेली, निर्मल और लज्जा से सजी-धजी नवयौवना की आसमान छूती खुशी, आदिकाल से कवियों की रचनाओं का श्रृंगार कर, उन्हें जीवंत करने वाली लाेकगीतो की रानी ‘कजरी’ वस्तुतः ‘लोकगीतों की रानी’ कजरी सिर्फ गायन भर नहीं है, बल्कि यह सावन के मौसम की सुंदरता और उल्लास का उत्सवधर्मी पर्व है।

उन्होंने बताया कि चरक संहिता में तो यौवन की संरक्षा एवं सुरक्षा हेतु वसंत के बाद सावन महीने को ही सर्वश्रेष्ठ बताया है। कजरी पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रसिद्ध लोकगीत है। इसे सावन के महीने में गाया जाता है। यह अर्ध-शास्त्रीय गायन की विधा के रूप में भी विकसित हुआ। कुछ विद्वान कजरी की उत्पत्ति मिर्जापुर को बताते है और ससुराल बनारस।

कजरी विरहगीत की प्रतिद्वन्दता भी होती है, वधुये और बालायें हिंडोले पर बैठकर कजरी गाती है, वर्षा ऋतु में यह गीत दिल को छूने वाला होता है।

शिक्षिका का कहना है कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने भी अनेक कजरियों की रचना कर लोक-विधा से हिन्दी साहित्य को सुसज्जित किया। साहित्य के अलावा इस लोकगीत की शैली ने शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में भी अपनी आमद दर्ज कराई। उन्नीसवीं शताब्दी में उपशास्त्रीय शैली के रूप में ठुमरी की विकास यात्रा के साथ-साथ कजरी भी इससे जुड़ गई।

साहित्यकारों द्वारा अपना लिये जाने के कारण कजरी गायन का क्षेत्र भी अत्यन्त व्यापक हो गया। इसी प्रकार उपशास्त्रीय गायक-गायिकाओं ने भी कजरी को अपनाया और इस शैली को रागों का बाना पहना कर क्षेत्रीयता की सीमा से बाहर निकाल कर राष्ट्रीयता का दर्ज़ा प्रदान किया। शास्त्रीय वादक कलाकारों ने कजरी को सम्मान के साथ अपने साजों पर स्थान दिया, विशेषतः सुषिर वाद्य के कलाकारों ने। सुषिर वाद्यों- शहनाई, बाँसुरी आदि पर कजरी की धुनों का वादन अत्यन्त मधुर अनुभूति देता है। 'भारतरत्न' सम्मान से अलंकृत उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँन की शहनाई पर कजरी की मिठास का वर्णन नहीं किया जा सकता। थरवई क्षेत्र के नदियानी निवासी कजरी गायक 65 वर्षीय रामजतन बताते हैं कि 'कजरी' की उत्पत्ति कब और कैसे हुई, यह कहना कठिन है, परन्तु यह तो निश्चित है कि मानव को जब स्वर और शब्द मिले, और जब लोक जीवन को प्रकृति का कोमल स्पर्श मिला होगा, उसी समय से लोकगीत हमारे बीच हैं। अधिकतर कजरियों में श्रृंगार रस की प्रधानता होती है। कुछ कजरी परम्परागत रूप से शक्ति स्वरूपा माँ विंध्यवासिनी के प्रति समर्पित भाव से गायी जाती हैं। भाई-बहन के प्रेम विषयक कजरी भी सावन में बेहद प्रचलित है। परन्तु अधिकतर कजरी ननद-भाभी के सम्बन्धों पर केन्द्रित होती हैं। ननद-भाभी के बीच का सम्बन्ध कभी कटुतापूर्ण होता है तो कभी अत्यन्त मधुर भी होता है।

प्राचीन काल से ही उत्तर प्रदेश का मिर्जापुर माँ विंध्यवासिनी के शक्तिपीठ के रूप में आस्था का केन्द्र रहा है। अधिसंख्य प्राचीन कजरियों में शक्तिस्वरूपा देवी का ही गुणगान मिलता है। कजरी गायन का प्रारम्भ देवी गीत से ही होता है। सावन में पुरूष कजरी गायन मंडली जिले के अन्य हिस्सों में भी लोगों को अपने गीतों से मंत्रमुग्ध कर देती थी, लेकिन अब यह सब समाप्त हो चुका है। पहले सावन के महीने में कजरी को गाकर उनकी गायन मंडली अच्छा पैसा कमा लेती थी, लेकिन अब कजरी के शौकीन लोग नहीं रहे। इसके सहारे बैठने से दाल रोटी नहीं चल सकती। आजकल श्री रामजतन परिजनों का दो जून के रोअी का जुगाड़ करने में व्यस्त रहते हैं।

उन्होंने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे में क्या कल्पना किया जा सकता है कि हम अपनी पुरानी परंपरा को बचा सकते हैं। कजरी लोकगीतों की धरोहर है। कुछ वर्षों तक कजरी गाने वाले कलाकार जिले में मौजूद थे, लेकिन अब इनकी संख्या गिनी चुनी रह गई है। सरकार को लोक कलाओं के संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए, जिससे लोक संस्कृति और परंपराएं जीवित रह सकें।

 

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