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गाजीपुर के जखनिया क्षेत्र में पर्यटन की अपार संभावना

गाजीपुर के जखनिया क्षेत्र में पर्यटन की अपार संभावना

गाजीपुर,26 सितम्बर (वार्ता) उत्तर प्रदेश के गाजीपुर स्थित जखनिया तहसील क्षेत्र में पर्यटन के विकास की अपार संभावनाएं हैं ।

इस क्षेत्र में सैकड़ों वर्ष प्राचीन सिद्धपीठ हथियाराम मठ, सिद्धपीठ भुड़कुड़ा मठ विश्वविख्यात संतों की तपोस्थली, महाभारत कालीन ऐतिहासिक टड़वा भवानी मंदिर, राष्ट्रीय किसान चिंतक स्वामी सहजानंद सरस्वती की जन्मस्थली के साथ ही सेना के सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित परमवीर चक्र विजेता शहीद वीर अब्दुल हमीद व सेना के दूसरे सर्वोच्च सम्मान महावीर चक्र विजेता रामउग्रह पांडेय की जन्म स्थली रही है।

सिद्धपीठ भुड़कुड़ा मठ के महंत शत्रुघ्न दास जी महाराज का कहना है कि इस सिद्धपीठ के संतों के प्रकाश से अध्यात्म जगत प्रकाशमान है। लेकिन स्थानीय शासन प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के उपेक्षात्मक व्यवहार से सिद्धपीठ के केंद्र अनजान पड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि जखनिया क्षेत्र अपने को उपेक्षित महसूस कर कर रहा है।

उन्होंने बताया कि इसके साथ ही शादियाबाद स्थित ऐतिहासिक मलिक मरदान साहब की मजार इत्यादि विद्यमान हैं। खास बात यह कि वाराणसी सारनाथ से कुशीनगर लुंबिनी तक के लिए जाने वाले बौद्ध यात्रियों व पर्यटकों को मार्ग के मध्य में ही पड़ने वाले क्षेत्र में रोकने की जरा भी कवायद नहीं की जा सकी है।ज्ञात हो कि तहसील क्षेत्र के पश्चिम आजमगढ़ की सीमा पर बेसों नदी के समीप ग्राम हुसैनपुर मुरथान स्थित टड़वा भवानी मंदिर पुरातत्व कालीन धर्म एवं संस्कृति की महत्वपूर्ण धरोहर है। इसके संबंध में महाभारत कालीन एक रोचक प्रसंग बहुत प्रचलित है कि देवी देवकी की सात संतानों में से एक है, जिसका कंस ने अपनी मृत्यु के भय से वध का प्रयास किया था।

महंत शत्रुघ्न दास ने बताया कि इलाके में देश की प्रसिद्ध मठों में से एक सिद्धपीठ श्री हथियाराम मठ स्थित है। इस मठ की परंपरा लगभग 700 वर्ष प्राचीन है। इस पीठ पर आसीन होने वाले यदि सन्यासी कहे जाते हैं। इनकी गुरु परंपरा दत्तात्रेय, सुकदेव, शंकराचार्य से प्रारंभ होती है। मठ में स्थापित वृद्धम्बिका देवी (बुढ़िया माई) की चौरी श्रद्धा एवं विश्वास का केंद्र है। जिनका उल्लेख दुर्गा सप्तशती में भी वर्णित है। अध्यात्म जगत में विदित किवदंतियों के अनुसार मोक्ष प्रदायिनी माता गंगा द्वारा प्रदत्त कटोरा भी इस सिद्धपीठ के पास ही मौजूद है। जहां देश के कोने-कोने से लोग वर्ष पर्यंत दर्शन पूजन को आते रहते हैं।

उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में अध्यात्म जगत की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि लगभग 400 वर्ष प्राचीन सतनामी संत परंपरा के संतों भीखा साहब, गुलाल साहब इत्यादि के प्रमुख साधना केंद्र भुड़कुड़ा मठ की जीवंतता व महत्ता आज भी विद्यमान हैं।

श्री दास ने बताया कि तहसील मुख्यालय से 12 किलोमीटर दूर दक्षिण स्थित शादियाबाद स्थित सैयद मलिक मरदान साहब की मजार हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक है। जनश्रुतियों के मुताबिक लगभग 950 वर्ष पूर्व गजनी से अमन व शांति का पैगाम देने के लिए अपने मरहूम मलिक बहरी, मलिक कबीर, मलिक फिरोज इत्यादि के साथ विभिन्न प्रांतों से होते हुए शादियाबाद पहुंचे यहां मलिक मरदान रुक गए। गौरतलब है कि आज तक इस मजार के रोजे में लगे खंभों की कोई गिनती नहीं कर सका।

महंत शत्रुघ्न दास ने बताया कि इलाके में मौनी बाबा धाम की समाधि स्थली कनुवान के समीप ही ब्रिटिश कालीन 20 फीट ऊंचा स्तूप। क्षेत्र के जलालाबाद स्थित 50 फीट ऊंचा मुगल कालीन ऐतिहासिक कोट स्थित है। इसके संबंध में कहा जाता है कि मुगल बादशाह द्वारा इस कोट परिसर में राजमहल भी बनवाया गया था। लगभग 75000 वर्ग मीटर में फैले इस कोट का प्रमाण आज भी मौजूद हैं। वहीं राष्ट्रीय चिंतक नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती, परमवीर चक्र विजेता शहीद अब्दुल हमीद, महावीर चक्र विजेता शहीद राम उग्रह पांडेय की जन्म स्थली विकास की बाट जोह रहे हैं। कुल मिलाकर जखनियां तहसील क्षेत्र में पर्यटन की अपार संभावनाएं विद्यमान हैं। खास बात यह है कि केंद्र सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा धार्मिक क्षेत्रों का सर्वांगीण विकास योजना के बावजूद क्षेत्र में विकास की किरण नहीं दिख सकी है। जिससे जखनिया क्षेत्र अपने को उपेक्षित महसूस करता है।

गौरतलब हो कि 400 वर्ष प्राचीन सिद्धपीठ भुड़कुड़ा मठ के संबंध में विश्वविख्यात आचार्य रजनीश जी द्वारा तीन पुस्तकें लिखी गई। वहीं पूर्व प्राचार्य डॉक्टर इंद्रदेव सिंह द्वारा लिखित यहां की संत परंपरा के शोध ग्रंथ का प्रकाशन बीएचयू वाराणसी द्वारा किया गया। यदि यहां की संत साहित्य को लेकर अध्ययन किया जाए तो उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग एवं हिंदी भाषा संस्थान को यहां से बहुत सामग्री प्राप्त हो सकती है।

700 वर्ष प्राचीन सिद्धपीठ हथियाराम मठ के पीठाधीश्वर व जूना अखाड़े के वरिष्ठ महामंडलेश्वर स्वामी भवानीनंदन यति जी महाराज ने कहा कि सिद्धपीठ स्थित वृद्धम्बिका देवी (बुढ़िया माई) की चौरी शक्ति प्रदाता है ,जिनका उल्लेख दुर्गा सप्तशती में है। इनकी शक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि असाध्य रोग लगा लकवा जैसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त लोग भी यहां से दर्शन पूजन कर पूर्ण स्वस्थ हो जाते हैं। इसके साथ ही समूचे अध्यात्म जगत में इस सिद्धपीठ का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। गौरतलब हो कि सिद्धपीठ हथियाराम मठ की शाखाएं वाराणसी, इंदौर, हल्द्वानी, हरिद्वार सहित देश के कोने कोने में फैली हुई है। वर्तमान में जूना अखाड़े द्वारा इस सिद्धपीठ से सम्बंधित आधा दर्जन सन्त सन्यासियों को महामंडलेश्वर उपाधि दी गई हैं।

तमाम ऐतिहासिक धार्मिक व सामाजिक महत्त्व सहेजें होने के बावजूद जखनिया क्षेत्र की बदहाली का आलम यह है कि सिद्धपीठों से होकर जखनियां तहसील होते हुए जिला मुख्यालय गाजीपुर जाने वाले मार्ग की स्थिति बहुत ही दयनीय है। इन बदहाल मार्ग की वास्तविक स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि इस मार्ग पर चलने वाली एकमात्र उत्तर प्रदेश परिवहन सेवा की रोडवेज बस को विभाग ने 2 वर्ष पूर्व चलाने से मना कर दिया। जिसको लेकर परिवहन निगम का स्पष्ट कहना है कि मार्ग इतनी जर्जर है उस पर निगम की बस चलना संभव नहीं है। ऐसे में पर्यटन विभाग की नजर पड़े तो जखनिया क्षेत्र प्रदेश ही नहीं बल्कि देश के नक्शे पर अपनी पहचान स्थापित कर सकता है।

700 वर्ष प्राचीन सिद्धपीठ हथियाराम मठ, 400 वर्ष प्राचीन सतनामी परंपरा का सिद्धपीठ भुड़कुड़ा मठ, महाभारत कालीन तड़वा भवानी मंदिर, राष्ट्रीय किसान चिंतक स्वामी सहजानंद सरस्वती जन्मस्थली, परमवीर चक्र शहीद वीर अब्दुल हमीद जन्मस्थली व महावीर चक्र विजेता शहीद राम उग्रह पांडेय की जन्मस्थली स्थित है। इसके साथ ही शादियाबाद स्थित मलिक मरदान साहब मजार, जलालाबाद स्थित 75000 वर्ग मीटर में फैले मुगलकालीन कोट के अवशेष, व कनुवान मौनी बाबा मठ के पास ब्रिटिश कालीन स्तूप मौजूद है। खास बात यह कि इन सभी प्रमुख धार्मिक और पौराणिक स्थलों की दूरी जखनियां तहसील मुख्यालय से अधिकतम 10 से 12 किलोमीटर की दूरी पर है।

सं त्यागी

वार्ता

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