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उच्च न्यायालय ने सीमा पार से गोलाबारी मुआवजा मामले में नोटिस जारी किया

उच्च न्यायालय ने सीमा पार से गोलाबारी मुआवजा मामले में नोटिस जारी किया

श्रीनगर, 28 फरवरी (वार्ता) जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने हाल ही में सीमा पार गोलाबारी मुआवजा मामले में केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार को नोटिस जारी किया है।

बारामूला के उरी सेक्टर में नियंत्रण रेखा के पास स्थित सिकोकोट गांव के निवासी फयाज अहमद अवान ने अपने वकील नवीद बुख्तियार के माध्यम से उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सीमा पार से गोलाबारी में अपनी संपत्ति गंवाने वाले पीड़ितों को पहले से ही लागू नीति में शामिल करने की मांग की है।

फरवरी 2021 में नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम से पहले, दशकों से सिकोकोट गांव लगातार तीव्र गोलाबारी और हताहत का शिकार होता रहा।

याचिकाकर्ता ने अदालत को जानकारी दी कि वह एक दलित परिवार से आता है। वर्ष 2018 में 23 - 24 फरवरी की दरमियानी रात को दुश्मन देश की ओर से नियंत्रण रेखा पर अंधाधुंध गोलाबारी की गई, जिसमें उसकी दो मंजिला मकान पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया।उस दिन से याचिकाकर्ता के साथ-साथ उनका परिवार स्थानीय पंचायत घर में रह रहा है और मुआवजे और राहत प्राप्त करने के लिए इधर-उधर भटक रहा है।

याचिकाकर्ता ने कहा कि सरकारी एजेंसी द्वारा कुल 13,20,000 रुपये के नुकसान का आकलन किया गया लेकिन बारामूला के उपायुक्त ने एक लाख रुपये का मुआवजा मंजूर किया जिसे उसने लेने से मना कर दिया।

याचिकाकर्ता ने संपत्ति के नुकसान के मुआवजे को 'भारतीय क्षेत्र में आतंकवादी/सांप्रदायिक/वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) हिंसा और सीमा पार से गोलीबारी और खदान/आईईडी विस्फोटों के पीड़ितों के परिवारों की सहायता के लिए केंद्रीय योजना, 2019' से बाहर रखने को चुनौती दी है।

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि सरकार द्वारा पीड़ितों का वर्गीकरण, सीमा पार गोलाबारी में अपनी जान गंवाने या दिव्यांग होने वालों के मुआवजे को सीमित करना, आश्रय के मौलिक अधिकार का हनन करता है।

वकील ने कहा, “इस तरह के वर्गीकरण के पीछे कोई तर्क नहीं है जहां सीमा पार गोलीबारी के पीड़ित को भगवान की दया पर छोड़ दिया गया है और अन्य को कवर किया गया है। दुश्मन देश के कृत्य से याचिकाकर्ता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है जो जीवन का अधिकार है, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि जीवन के अधिकार का मतलब केवल पशु जैसा जीवन नहीं है, बल्कि गरिमा के साथ जीवन और आवास और आश्रय के अधिकार को जीवन के अधिकार का आंतरिक हिस्सा माना गया है।”

फैसले का हवाला देते हुए, याचिकाकर्ता ने बल देकर कहा कि आवास और आश्रय के अधिकार को जीवन के अधिकार का एक अभिन्न अंग माना गया है।

याचिकाकर्ता ने प्रतिवादियों को 13,00,000 रुपये का मुआवजा देने का निर्देश देने की मांग की है। याचिका दायर होने के बाद न्यायमूर्ति विनोद चटर्जी कौल ने सात फरवरी को अधिकारियों को नोटिस जारी किया और उन्हें चार सप्ताह के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया।

मामले की अगली सुनवाई 15 मार्च को होगी।

अभय,आशा

वार्ता

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