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बहुसंस्कृति की दुनिया में हर जुबान एक खजाना

बहुसंस्कृति की दुनिया में हर जुबान एक खजाना

गोस्वामी तुलसीदास नगर (मॉरिशस) 19 अगस्त (वार्ता) विश्व हिन्दी सम्मेलन में विश्व के विभिन्न हिस्से से आये हिन्दी के विद्वानों का मत है कि हिन्दी खतरे में नहीं है और बहुसंस्कृति की दुनिया में हर जुबान एक खजाना है।

सम्मेलन में ‘हिन्दी शिक्षण में भारतीय संस्कृति’ विषय पर आयोजित सत्र में स्वीडन से आये हैंस वेसलर वेज ने कहा, “आज हम बहुसंस्कृति की दुनिया में रहते हैं, जहां हर जुबान एक खजाना है। अलग-अलग भाषाओं की अलग-अलग संस्कृति होती है। जैसे-जैसे हम लोगों की जुबान को समझते हैं वैसे-वैसे उनकी संस्कृति को भी जानने लगते हैं।” उन्होंने कहा कि जर्मनी और फ्रांस में मूल निवासी भी हिन्दी सीखते हैं। हिन्दी खतरे में नहीं है। धीरे-धीरे ही सही अब विश्व के हर हिस्से में हिन्दी बोलने वालों की संख्या बढ़ रही है।

पेंसिलवानिया विश्वविद्यालय, कार्नेल विश्वविद्यालय और विस्कांसिन विश्वविद्यालय में अध्ययन-अध्यापन के साथ अमरीकन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज के भाषा-विभाग के लंबे समय तक अध्यक्ष रहे डॉ. सुरेन्द्र गंभीर ने कहा कि शास्त्रीय मूल्य शाश्वत होते हैं। विदेशी विद्यार्थी के मन में तमाम जिज्ञासाएं होती हैं और वह उनके बारे में जानना चाहता है। उन्होंने कहा कि संसार की भाषाओं का अनेक प्रकार से वर्गीकरण किया गया है। प्रथम वर्ग में अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मनी, चीनी, जापानी, अरबी, हिब्रू है जबकि द्वितीय वर्ग में हिन्दी, भोजपुरी, अवधी आदि भाषाएं है। बड़ी और छोटी दोनों भाषाओं में संस्कृति सुरक्षित है।

शिवा. उपाध्याय

जारी (वार्ता)

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