Sunday, Aug 9 2020 | Time 11:25 Hrs(IST)
image
BREAKING NEWS:
  • एक दिन में रिकॉर्ड 64 हजार से अधिक मामले, 53,879 रोगमुक्त
  • एक दिन में रिकॉर्ड 64 हजार से अधिक मामले, 53,879 रोगमुक्त
  • रक्षा मंत्रालय ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को बढ़ावा देने के लिए 101 वस्तुओं के आयात पर रोक लगायी
  • आदिवासी सांस्कृतिक विरासत संजोकर रखने की जरूरत : राहुल
  • नरेंद्र मोदी को लेकर ट्वीट करने के मामले में विधायक पटवारी के खिलाफ प्राथमिकी
  • आंध्र कोविड सेंटर आग: शाह ने लाेगों की मौत पर जताया शोक
  • आंध्र के कोविड केयर सेंटर में आग लगने से सात मरीजाें की मौत, तीन घायल
  • जगन मोहन ने कोविड केयर सेंटर में आग से लोगों की मौत पर जताया शोक
  • पटना में युवक का शव बरामद
  • पम्बा बांध: जलस्तर 983 05 मीटर पहुंचा,ऑरेंज अलर्ट जारी
  • मोदी ने आंध्र के कोविड केंद्र में आग से लोगों की मौत पर जताया दुख
  • मोदी ने दी बलराम जयंती की शुभकामनाएं
  • आंध्र के कोविड केयर सेंटर में आग लगने से तीन मरीजाें की मौत, कई झुलसे
  • मराठवाड़ा में कोरोना वायरस के रिकॉर्ड 1231 नये मामले
लोकरुचि


संगम की रेती पर संयम, श्रद्धा एवं कायाशोधन का 'कल्पवास' शुरू

संगम की रेती पर संयम, श्रद्धा एवं कायाशोधन का 'कल्पवास' शुरू

इलाहाबाद, 10 जनवरी (वार्ता) “माघ मकर गति रवि जब होई, तीरथ पतिहिं आव सब  कोई, के पुण्य आवाहन के साथ माघ मेले में “पौष पूर्णिमा” के पावन स्नान के  साथ ही संयम, अहिंसा, श्रद्धा एवं कायाशोधन के लिए तीर्थराज प्रयाग में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती की रेती पर कल्पवासियों का एक माह का कल्पवास शुरू हो गया।

      पुराणों और धर्मशास्त्रों में कल्पवास को आत्मा की शुद्धि और आध्यात्मिक  उन्नति के लिए जरूरी बताया गया है। यह मनुष्य के लिए अध्यात्म की राह का एक  पड़ाव है, जिसके जरिए स्वनियंत्रण एवं आत्मशुद्धि का प्रयास किया जाता है।  हर वर्ष श्रद्धालु एक महीने तक संगम गंगा तट पर अल्पाहार, स्नान, ध्यान  एवं दान करके कल्पवास करते हैं।

      वैदिक शोध एवं सांस्कृतिक प्रतिष्ठान कर्मकाण्ड प्रशिक्षण केन्द्र के  आचार्य डा आत्माराम गौतम ने “यूनीवार्ता” से कहा कि तीर्थराज प्रयाग में  प्रतिवर्ष माघ महीने मे विशाल मेला लगता है। इस अवसर पर लाखों श्रद्धालु  यहाँ एक महीने तक संगम तट पर निवास करते हुए जप, तप, ध्यान, साधना, यज्ञ  एवं दान आदि विविध प्रकार के धार्मिक कृत्य करते हैं। इसी को कल्पवास कहा  जाता है।

      कल्पवास का वास्तविक अर्थ है-कायाकल्प। यह कायाकल्प शरीर और अन्तःकरण दोनों का होना चाहिए। इसी  कायाकल्प के लिए पवित्र संगम तट पर जो एक महीने का वास किया जाता है उसे कल्पवास कहा जाता है।


तिवर्ष माघ मास में जब सूर्य मकर राशि में रहते हैं, तब माघ मेला एवं  कल्पवास का आयोजन होता है। मत्स्यपुराण के अनुसार कुम्भ में कल्पवास का  अत्यधिक महत्व माना गया है। गोस्वामी तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' के  'बालकाण्ड' में माघ मेला की महत्ता इस प्रकार बतायी है। “माघ मकर गति रवि  जब होई, तीरथ पतिहिं आव सब कोई, देव दनुज किन्नर नर श्रेनी, सादर मज्जहिं  सकल त्रिवेनी”।

     आदिकाल से चली आ रही इस परंपरा के महत्व की चर्चा  वेदों से लेकर महाभारत और रामचरितमानस में अलग-अलग नामों से मिलती है।  बदलते समय के अनुरूप कल्पवास करने वालों के तौर-तरीके में कुछ बदलाव जरूर  आए हैं लेकिन कल्पवास करने वालों की संख्या में कमी नहीं आई है। आज भी  श्रद्धालु कड़ाके की सर्दी में कम से कम संसाधनों में कल्पवास करते हैं।

      आचार्य गौतम ने कहा कि कल्पवास के पहले शिविर के मुहाने पर तुलसी और  शालिग्राम की स्थापना और पूजा अवश्य की जाती है। कल्पवासी अपने घर के बाहर  जौ का बीज अवश्य रोपित करता है। कल्पवास समाप्त होने पर तुलसी को गंगा में  प्रवाहित कर देते हैं और शेष को अपने साथ ले जाते हैं। कल्पवास के दौरान  कल्पवासी को जमीन पर शयन करना होता है। इस दौरान फलाहार या एक समय निराहार  रहने का प्रावधान होता है। कल्पवास करने वाले व्यक्ति को

नियम पूर्वक तीन समय गंगा में स्नान और यथासंभव अपने शिविर में भजन-कीर्तन, प्रवचन या गीता पाठ करना चाहिए।

मत्सयपुराण  में लिखा है कि कल्पवास का अर्थ संगम तट पर निवास कर वेदाध्ययन और ध्यान  करना चाहिए। माघ माह के दौरान कल्पवास करने वाले को सदाचारी, शांत चित्त  वाला और जितेन्द्रीय होना चाहिए। कल्पवासी को तट पर रहते हुए नित्यप्रति  तप, हाेम और दान करना चाहिए।

समय के साथ कल्पवास के तौर-तरीकों में कुछ बदलाव भी आए हैं। बुजुर्गों के  साथ कल्पवास में मदद करते-करते कई युवा खुद भी कल्पवास करने लगे हैं। कई  विदेशी भी अपने भारतीय गुरुओं के सानिध्य में कल्पवास करने यहां आते हैं।  पहले कल्पवास करने आने वाले गंगा किनारे घास-फूस की कुटिया में रहकर भगवान  का भजन, कीर्तन, हवन आदि करते थे, लेकिन समयानुसार अब कल्पवासी टेंट में  रहकर अपना कल्पवास पूरा करते हैं।

    आचार्य ने कहा कि पौष कल्पवास के लिए वैसे तो उम्र की कोई बाध्यता नहीं है,  लेकिन माना जाता है कि संसारी मोह-माया से मुक्त और जिम्मेदारियों को पूरा  कर चुके व्यक्ति को ही कल्पवास करना चाहिए क्योंकि जिम्मेदारियों से बंधे  व्यक्ति के लिए आत्मनियंत्रण कठिन माना जाता है।

     माघ मेला एक ऐसा धार्मिक आयोजन है, जिसकी पूरी दुनिया में कोई मिसाल नहीं  मिलती। इसके लिए किसी प्रकार का न/न तो प्रचार किया जाता है और न/न ही  आमंत्रण और निमंत्रण देना पड़ता है बावजूद इसके पंचांग की एक निश्चित

तिथि पर लाखों की संख्या में लोग दूर-दराज से पहुंचते हैं।

      प्रयागराज में जब बस्ती नहीं बल्कि आस-पास घोर जंगल था। जंगल में अनेक  ऋषि-मुनि जप तप करते थे। उन लोगों ने ही गृहस्थों को अपने सान्निध्य में  ज्ञानार्जन एवं पुण्यार्जन करने के लिये अल्पकाल के लिए कल्पवास का विधान  बनाया था। इस योजना के अनुसार अनेक धार्मिक गृहस्थ ग्यारह महीने तक अपनी  गृहस्थी की व्यवस्था करने के बाद एक महीने के लिए संगम तट पर ऋषियों  मुनियों के सान्निध्य में जप तप साधना आदि के द्वारा पुण्यार्जन करते थे।  यही परम्परा आज भी कल्पवास के रूप में विद्यमान है।

      महाभारत में कहा गया है कि एक सौ साल तक बिना अन्न ग्रहण किए तपस्या करने  का जो फल है, माघ मास में कल्पवास करने भर से प्राप्त हो जाता है। कल्पवास  की न्यूनतम अवधि एक रात्रि की है। बहुत से श्रद्धालु जीवन भर माघ मास गंगा,  यमुना और सरस्वती के संगम को समर्पित कर देते हैं।

      विधान के अनुसार एक रात्रि, तीन रात्रि, तीन महीना, छह महीना, छह वर्ष, 12  वर्ष या जीवनभर कल्पवास किया जा सकता है। पुराणों में तो यहां तक कहा गया  है कि आकाश तथा स्वर्ग में जो देवता हैं, वे भूमि पर जन्म लेने की इच्छा  रखते हैं। वे चाहते हैं कि दुर्लभ मनुष्य का जन्म पाकर प्रयाग क्षेत्र में  कल्पवास करें।

दिनेश विनोद

वार्ता
More News
अयोध्या में मंदिर के लिये बुधवार को भूमि पूजन तो मथुरा में होगा कृष्ण दर्शन

अयोध्या में मंदिर के लिये बुधवार को भूमि पूजन तो मथुरा में होगा कृष्ण दर्शन

03 Aug 2020 | 9:29 PM

मथुरा 03 अगस्त (वार्ता)-पांच अगस्त को जब मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम की जन्मभूमि अयोध्या में भूमि पूजन के समारोह से गुंजायमान हो रही होगी उसी समय मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मस्थान स्थित केशवदेव मंदिर में भगवान केशवदेव राम रूप में भक्तों को दर्शन दे रहे होंगे।

see more..
रक्षाबंधन पर्व अछूता नही रह सका आधुनिकता के प्रभाव से: डा कुमुद दुबे

रक्षाबंधन पर्व अछूता नही रह सका आधुनिकता के प्रभाव से: डा कुमुद दुबे

03 Aug 2020 | 1:07 PM

प्रयागराज, 03 अगस्त (वार्ता) भारतीय संस्कृति की गौरवमयी परंपरा और भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन भी आधुनिकता के प्रभाव से अछूता नही रहा और परंपरागत राखियों के स्थान ने रेशम के चमकीले एवं चांदी और सोने के जरी युक्त राखियों ने ले लिया है।

see more..
मैनपुरी में ईशन नदी को पुनर्जीवित करने का कार्य शुरू

मैनपुरी में ईशन नदी को पुनर्जीवित करने का कार्य शुरू

02 Aug 2020 | 7:02 PM

मैनपुरी,02 अगस्त (वार्ता) उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में वर्षों से अपने मूल स्वरूप को खो चुकी ईशन नदी को पुनर्जीवित करने का बीड़ा जिलाधिकारी महेन्द्र बहादुर सिंह ने उठाया है।

see more..
पीलीभीत में कैदियों द्वारा बनाई गयी राफेल और मास्क राखी की बाजार में बढ़ी मांग

पीलीभीत में कैदियों द्वारा बनाई गयी राफेल और मास्क राखी की बाजार में बढ़ी मांग

01 Aug 2020 | 7:34 PM

पीलीभीत, 01 अगस्त(वार्ता) उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में रक्षा बंधन पर जेल के बंदियों द्वारा बनाई गयी राफेल और मास्क वाली राखियाें की बाजार में मांग बढ़ गयी है।

see more..
जाएं तो कहां जाएं हर मोड पर रूसवाई: जाफरी

जाएं तो कहां जाएं हर मोड पर रूसवाई: जाफरी

31 Jul 2020 | 8:03 PM

बलरामपुर,31 जुलाई (वार्ता) “आवारा है गलियो में मै और मेरी तन्हाई ” जाएं तो कहां जाएं हर मोड पर रूसवाई” जैसी बेमिशाल शायरी लिखने वाले मशहूर शायर और देश के सबसे बडे साहित्यिक पुरस्कार ज्ञानपीठ से सम्मानित अली सरदार जाफरी ने इन पंक्तियों को लिखते वक्त यह नही सोचा होगा कि उनके इन्तकाल के बाद वह खुद इसकी मिशाल बन जायेगे।

see more..
image