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सामाजिक समरसता का संदेश पहुंचाने में सफल रहा कुंभ

सामाजिक समरसता का संदेश पहुंचाने में सफल रहा कुंभ

कुंभ नगर, 28 फरवरी (वार्ता) आध्यात्मिक और सांस्कृतिक समागम कुम्भ देश दुनिया में सामाजिक चेतना, समरसता और स्वच्छता का संदेश पहुंचाने में सफल रहा है। पिछले डेढ़ माह के दौरान गंगा,यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम पर 22 करोड़ से ज्यादा श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगा चुके हैं। यह तादाद दुनिया के कई देशों की आबादी से कहीं अधिक है।

      संगम की रेती पर इस दौरान आस्था का समंदर हिलोरें मारता दिखायी पड़ा। त्रिवेणी के तट पर आस्था रूपी लहरें दुनिया में सामाजिक चेतना, समरसता, भाई चारे, वसुधैव कुटुम्बकम या अतिथि देवो भव और स्वच्छता आदि कई प्रकार के संदेश पहुंचाने में सफल रहीं ।

     उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सभी राज्यों के राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों को कुम्भ में आकर स्नान करने के लिए आमंत्रण भेजा था। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निर्देश पर विदेश मंत्रालय की ओर से दुनिया के सभी देशों को उनके प्रतिनिधयों को तीर्थराज प्रयाग के कुम्भ मेले में आनेे का निमंत्रण भेजा गया था। विश्वस्तर की ब्रांडिंग का सकारात्मक परिणाम रहा कि दो बार बडी संख्या में विदेश मंत्री जनरल वी के सिंह के नेतृत्व में विदेशी मेहमानों का समूह यहां पहुंचा था।

     कुम्भ के संगम में पुण्य के गोते लगाने वालों में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, कई राज्यों के राज्यपाल, मुख्यमंत्री शामिल रहे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो अपनी कैबिनेट और साधु-संतों के साथ पुण्य की डुबकी लगाई। संगम में आस्था की डुबकी और दिव्य-भव्य कुम्भ की याद समेट कर आये प्रवासी भारतीय भी कुम्भ का डंका दुनिया में बजा रहे हैं।

    माॅरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जगन्नाथ भी वाराणसी में प्रवासी भारतीय सम्मेलन से लौटकर परिवार और कैबिनेट के साथ संगम में स्नान किया।

मकर संक्रांति हो या मौनी अमावस्या अथवा बसंत पंचमी का शाही स्नान, संगम पर आस्था का महासागर संगम में समाहित हो गया था। शाही स्नान के बाद भी श्रद्धालुओं की भीड़ में कमी देखने को नहीं मिल रही है। बुजुर्ग हाथ में बुढापे का सहारा लाठी, सिर पर गठरी, कंधे पर कमरी एक दूसरे का हाथ पकड़े खरामा-खरामा संगम की राह पर बढते चले आ रहे हैं।

      कुम्भ मेले में तीन शाही स्नान पर्वो में सबसे बड़े मौनी अमावस्या के मौके पर श्रद्धालुओं के आस्था के समंदर को संगम अपनी बाहों में भरने को आतुर दिखा। मानो सनातन धर्म गरज रहा था। अखाड़ों के संतों के साथ श्रद्धालु डुबकी लगाकर धन्य हुए, अौर धन्य हुआ पवित्र संगम जिसने इससे पहले ऐस विहंगम कुम्भ नहीं देखा। दुनिया के कई छोटे-छोटे जनसंख्या वाले देशों से अधिक लोगों की भीड़ ने यहां एक दिन में स्नान कर रिकार्ड कायम किया। मौनी अमावस्या के पर्व पर पांच करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने स्नान किया था।

      कुम्भ मेले ने दुनिया में स्वच्छता की मिसाल कायम की है। इसकी स्वच्छता पर चतुर्दिक चर्चा हो रही है। बिना किसी की निगाह में आये और बिना प्रशंसा की परवाह किए ईमानदारी से दुनिया के कोने कोने में स्वच्छता की अलख जगाने वाले दो महिलाओं समेत पांच स्वच्छा ग्रहियों का प्रधानमंत्री ने पांव पखार का उनका सम्मान बढ़ाया था।

इस बार अर्द्ध कुम्भ को कुम्भ को सरकार ने दर्जा देकर इसको दिव्य और भव्य बनाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखा। संगम के विस्तीर्ण रेती पर कुम्भ मेले को 3200 हेक्टेअर क्षेत्रफल में बसाकर भी एक मिशाल कायम किया गया है। प्रयागराज के अलावा हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में भी कुम्भ का आयोजन होता है लेकिन जो विस्तार और भव्यता उसे यहां मिलती है, और स्थान पर नहीं। कुम्भ के पांच स्नान माघी पूर्णीमा समाप्त हो गये। अब तक कुम्भ मेले में 22 करोड़ से अधिक श्रद्धालु संगम में आस्था की डुबकी ला चुके हैं।

      कुम्भ में किन्नर अखाड़ा को भी तीर्थराज प्रयाग के कुम्भ में शिविर लगाने का सुनहरा अवसर मिला। यह भी अपने आप में एक मिशाल रहा। संस्कृति और समाज से दूर अस्तित्व के दोराहे पर खड़े किन्नर समाज का धर्म के सबसे बडे मेले में ही राजतिलक हुआ।  कुम्भ मेले के पहला मकर संक्रांति स्नान पर्व पर शंखनाद के साथ जैसे ही किन्नर संगम में स्नान करने उतरे, मनो संस्कृति पर लिखे सदियों पुराने  पन्न पलट गए। संगम के आंचल में वात्सल्य के इन पलों की साक्षी बनी चारें दिशाएं, प्रकृति और ऋचाएं। युगों -युगों से उपेक्षित किन्नरों को धर्म ने मानों मां की तरह बाहें बढ़ाकर अपनी गोद में भर लिया।

      इन्होंने ऐसी देवत्त यात्रा (पेशवाई) निकाली की सभी तेरह अखाड़े दंग रह गये। इनके देवत्त यात्रा के दौरान रास्तों में पैर रखने की जगह नहीं थी। श्रद्धालु इनके पैर चूमने को आतुर हो रहे थे। ऊंट की सवारी कर रही अखाडे की आचार्य महामण्डलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी लाल वस्त्र में सोने से लदी लकझक नजर आ रही थीं। इनके अन्य संत -महात्मा पालकी, घोडा और रथ पर सवार हो श्रद्धालुओं का पैसा चूमकर बदल रहे थे। लोग इसे आर्शीवाद समझकर अपने पर्स आदि में संभाल कर रख रहे थे।

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