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मनोरंजन » जानीमानी हस्तियों का जन्म दिन


नसीरूद्दीन ने समानांतर फिल्मों को नया आयाम दिया

नसीरूद्दीन ने समानांतर फिल्मों को नया आयाम दिया

.. जन्मदिवस 20 जुलाई के अवसर पर .
मुंबई 19 जुलाई (वार्ता) बॉलीवुड में नसीरूदीन शाह ऐसे धु्रवतारे की तरह है जिन्होंने अपने सशक्त अभिनय से समानांतर सिनेमा के साथ-साथ व्यावसायिक सिनेमा में भी दर्शको के बीच अपनी खास पहचान बनायी।

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में 20 जुलाई 1950 को जन्म नसीरूद्दीन ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अजमेर और नैनीताल से पूरी की।
इसके बाद उन्होंने अपनी स्नातक की पढ़ाई अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पूरी की।
वर्ष 1971 में अभिनेता बनने का सपना लिये उन्होंने दिल्ली नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा स्कूल में दाखिला ले लिया।
वर्ष 1975 में नसीरउद्दीन की मुलाकात जाने माने निर्माता.निर्देशक श्याम बेनेगल से हुयी।
श्याम बेनेगल उन दिनों अपनी फिल्म ‘निशांत’ बनाने की तैयारी में थे।
श्याम बेनेगल ने नसीरूद्दीन में एक उभरता हुआ सितारा दिखाई दिया और अपनी फिल्म में काम करने का अवसर दे दिया।

वर्ष 1976 नसीरूद्दीन के सिने कैरियर में अहम पड़ाव साबित हुआ।
इस वर्ष उनकी भूमिका और मंथन जैसी सफल फिल्म प्रदर्शित हुयी।
दुग्ध क्रांति पर बनी फिल्म ‘मंथन’ में नसीरूद्दीन के अभिनय ने नये रंग दर्शको को देखने को मिले।
इस फिल्म के निर्माण के लिये गुजरात के लगभग पांच लाख किसानों ने अपनी प्रति दिन की मिलने वाली मजदूरी में से दो-दो.. रुपये फिल्म निर्माताओं को दिये और बाद में जब यह फिल्म प्रदर्शित हुयी तो यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुयी।

    वर्ष 1977 में अपने मित्र बैंजमिन गिलानी और टॉम आल्टर के साथ मिलकर नसीरूद्दीन ने मोटेले प्रोडक्शन नामक एक थियेटर ग्रुप की स्थापना की जिसके बैनर तले सैमुयल बैकेट के निर्देशन में पहला नाटक ‘वेटिंग फार गोडोट’ पृथ्वी थियेटर में दर्शको के बीच दिखाया गया।
वर्ष 1979 मे प्रदर्शित फिल्म ‘स्पर्श’ मे नसीरूद्दीन के अभिनय का नया आयाम दर्शकों को देखने को मिला।
इस फिल्म में अंधे व्यक्ति की भूमिका निभाना किसी भी अभिनेता के लिये बहुत बड़ी चुनौती थी।
चेहरे के भाव से दर्शको को सब कुछ बता देना नसीरूद्दीन की अभिनय प्रतिभा का ऐसा उदाहरण था जिसे शायद ही कोई अभिनेता दोहरा पाये।
इस फिल्म में उनके लाजवाब अभिनय के लिये उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया।

वर्ष 1980 में प्रदर्शित फिल्म ‘आक्रोश’ नसीरूद्दीन के सिने करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में एक है।
गोविन्द निहलानी निर्देशित इस फिल्म में नसीरूद्दीन एक ऐसे वकील के किरदार में दिखाई दिये जो समाज और राजनीति की परवाह किये बिना एक बेकसूर व्यक्ति को फांसी के फंदे से बचाना चाहता है।
हालांकि इसके लिये उसे काफी दिक्कत का सामना करना पड़ता है।
वर्ष 1983 में नसीरूद्दीन को सई परांजपे की फिल्म ‘कथा’ में काम करने का अवसर मिला।
फिल्म की कहानी में कछुये और खरगोश के बीच दौड की लड़ाई को आधुनिक तरीके से दिखाया गया था।
फिल्म में फारूख शेख ने खरगोश की भूमिका में दिखाई दिये जबकि नसीरूद्दीन शाह कछुये की भूमिका में थे।

वर्ष 1983 में नसीर के सिने कैरियर की एक और सुपरहिट फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ प्रदर्शित हुयी।
कुंदन शाह निर्देशित इस फिल्म में नसीरूद्दीन के अभिनय का नया रंग देखने को मिला।
इस फिल्म से पहले उनके बारे में यह धारणा थी कि वह केवल संजीदा भूमिकाएं निभाने में ही सक्षम है लेकिन इस फिल्म उन्होंने अपने जबरदस्त हास्य अभिनय से दर्शको को मंत्रमुग्ध कर दिया ।
वर्ष 1985 में नसीरूद्दीन शाह के सिने करियर की एक और महत्वपूर्ण फिल्म ‘मिर्च मसाला’ प्रदर्शित हुयी ।
सौराष्ट्र की आजादी के पूर्व की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म मिर्च मसाला ने निर्देशक केतन मेहता को अंतराष्ट्रीय ख्याति दिलाई थी।
यह फिल्म सामंतवादी व्यवस्था के बीच पिसती औरत की संघर्ष की कहानी बयां करती है।

    अस्सी के दशक के आखिरी वर्षो में नसीरूद्दीन ने व्यावसायिक सिनेमा की ओर भी अपना रूख कर लिया।
इस दौरान उन्हें हीरो हीरा लाल,मालामाल,जलवा, त्रिदेव जैसी फिल्मों में काम करने का अवसर मिला जिसकी सफलता के बाद नसीरूद्दीन को व्यावसायिक सिनेमा में भी स्थापित कर दिया।
नब्बे के दशक में नसीर ने दर्शको की पसंद को देखते हुये छोटे पर्दे का भी रूख किया और वर्ष 1988 में गुलजार निर्देशित धारावाहिक मिर्जा गालिब में अभिनय किया।
इसके अलावा वर्ष 1989 में भारत एक खोज धारावाहिक में उन्होंने मराठा राजा शिवाजी की भूमिका को जीवंत कर दर्शको का भरपूर मनोरंजन किया।

अभिनय में एकरूपता से बचने और स्वयं को चरित्र अभिनेता के रूप मे भी स्थापित करने के लिये नब्बे के दशक में उन्होंने स्वयं को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया।
इस क्रम में 1994 में प्रदर्शित फिल्म ‘मोहरा’ में वह खलनायक का चरित्र निभाने से भी नहीं हिचके।
इस फिल्म में भी उन्होंने दर्शकों का मन मोहे रखा।
इसके बाद उन्होंने टक्कर, हिम्मत, चाहत, राजकुमार, सरफरोश और कृष जैसी फिल्मों में खलनायक की भूमिका निभाकर दर्शको का भरपूर मनोरंजन किया।

नसीरूद्दीन के सिने करियर में उनकी जोड़ी स्मिता पाटिल के साथ काफी पसंद की गयी।
नसीरूद्दीन अबतक तीन बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किये जा चुके हैं।
इन सबके साथ ही नसीरूद्दीन शाह तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किये गये है।
फिल्म के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुये वह भारत सरकार की ओर से पदमश्री और पदमभूषण पुरस्कार से भी सम्मानित किये जा चुके हैं।
नसीरूद्दीन ने तीन दशक लंबे सिने करियर में अबतक लगभग 200 फिल्मों में अभिनय किया है।
नसीरउद्दीन आज भी उसी जोशोखरोश के साथ फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय हैं।

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स्मिता पाटिल ने समानांतर फिल्मों को नया आयाम दिया

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समानांतर सिनेमा को पहचान दिलायी श्याम बेनेगल ने

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..जन्मदिवस 14 दिसंबर के अवसर पर..
मुंबई 14 दिसंबर (वार्ता) भारतीय सिनेमा जगत में श्याम बेनेगल का नाम एक ऐसे फिल्मकार के रूप में शुमार किया जाता है जिन्होंने न सिर्फ सामानांतर सिनेमा को पहचान दिलायी बल्कि स्मिता पाटिल, शबाना आजमी और नसीरउद्दीन साह समेत कई सितारों को स्थापित किया।

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