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संगठन ने कहा कि राज्य में हर वर्ष करीब दो लाख लोग ट्रैकिंग के लिए आते हैं और दो हजार कंपनियां इस कारोबार को संचालित कर रही है। एक कंपनी के पास कम से कम चार कर्मचारी हैं। प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर इस पर करीब दो लाख लोग निर्भर हैं।
एटीओएआई के पूर्व प्रमुख अक्षय कुमार ने कहा कि सामूहिक पर्यटन को बढ़ावा देने वाली कुछ कंपनियों की वजह से उत्तराखंड में पूरी ट्रैकिंग गतिविधि पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। जबकि उद्योग महसूस करता है कि विनियमन और नियंत्रण आवश्यक है। समय की आवश्यकता सभी साहसिक खेलों और जुर्माना न भरने वालों के लिए टिकाऊ नीतियां बनाना है। इन ट्रैकिंग मार्गों और बुग्यूल्स ने कई पीढ़ियों से स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी मजबूत की है। हिमालय और इसके पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यहां अधिकतम विनियमन के साथ संचालन बहाल करने की जरूरत है। उद्योग और राज्य सरकार को ट्रैकिंग गतिविधियों को तत्काल खोलने के लिए हाथ मिलाने की जरूरत है।
संगठन ने कहा कि उत्तराखंड में पर्वतारोहण की लंबी और गर्वित परंपरा रही है तथा माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई की ट्रेनिंग भी यहीं दी जाती है। स्वीकार्य रूप से प्रमुख संस्थान नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग से ऐसे पर्वतारोही निकले हैं जिन्हें न सिर्फ राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त और सम्मानित किया गया है। इन सभी पर्वतारोहियों ने अपने खेल को न केवल अपने राज्य में सीखा है बल्कि राज्य को इस खेल में हुनरमंद बनाया है। बुगयाल में कैम्पिंग किए बिना कोई भी व्यक्ति राज्य में पहाड़ पर नहीं चढ़ सकता। लेकिन यह प्रतिबंध राज्य में पर्वतारोहण को एक खेल के रूप में भी प्रतिबंधित कर देगा।
शेखर अर्चना
वार्ता
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