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भारत


बच्चों में निमाेनिया मौत का सबसे बड़ा कारण

नयी दिल्ली,27 नवंबर(वार्ता) देश में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में आज भी निमोनिया मौत का सबसे प्रमुख कारण है और भारत में इस उम्र के बच्चों में इसकी दर 14.3 फीसदी है यानि प्रत्येक चार मिनट में एक बच्चे की मौत हो रही है।
देश में बचपन में होने वाले निमोनिया के खिलाफ प्रभावी प्रयत्नों की शुरुआत के तहत सेव द चिलड्रन की आज यहां जारी “भारत में निमोनिया के परिस्थिति का विश्लेषण” रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है।
रिपोर्ट का विमोचन डॉ. अजय खेरा, आयुक्त, मातृत्व एवं बाल स्वास्थ्य, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा किया गया, जिसमें पांच उच्च भार वाले राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड, राजस्थान का गहराई से मूल्यांकन, चुनौतियों के बारे में पहचान और कार्रवाई करने के लिए आह्वान किया गया है।
इस अवसर पर डॉ.खेरा, आयुक्त, मातृत्व एवं बाल स्वास्थ्य, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने केन्द्र सरकार की योजना लक्ष्य (लेबर रुम क्वालिटी इम्प्रूवमेंट इनिशिएटिव गाइडलाइन) के बारे में बताया कि किस तरह यह जन्म के समय देखभाल की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए केंद्रित है। जिसमें आशा महिला कर्मचारियों को प्रशिक्षित करना और महिलाओं को स्वास्थ्य केंद्रों में एकत्रित करना शामिल है।
डा़ खेरा ने कहा, “स्वास्थ्य प्रणाली में स्वास्थ्य और कल्याण केंद्र नए तौर पर जुड़ा है जो जमीनी तौर पर लोगों तक पहुंचने में मदद करेगा। सरकार ने बचपन में होने वाली मातृत्व से निपटने के लिए वाकई महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है और इस उद्देश्य के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।”
सेव द चिल्ड्रन के डायरेक्टर प्रोग्राम्स अनिंदित रॉय चौधरी ने कहा कि बच्चों में आज भी निमोनिया मौत का सबसे प्रमुख कारण है और भारत में 5 साल के कम उम्र के बच्चों में इसकी दर 14.3 फीसदी है। पूरे विश्व में पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की निमोनिया से होने वाली मौतों में भारत का आंकड़ा 17 फीसदी है। बचपन में होने वाले निमोनिया की समस्या से निपटना सेव द चिल्ड्रन के शताब्दी वर्ष की तीन प्रतिबद्धताओं में से एक है और हम निमोनिया से हाेने वाली मौतों को पूरी तरह रोकने के लिए प्रतिबद्ध है।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्षों से पता चला है कि 1. 5 साल से कम उम्र के बच्चों में अध्ययन किए गए 5 राज्यों में कुल मिलाकर एक्यूट रेस्पिरेटरी इन्फेक्शन (एआरआई) का प्रचलन दर 13.4 फीसदी रहा। बिहार में यह दर सबसे ज्यादा 18.2 फीसदी रही है और उसके बाद उत्तर प्रदेश 15.9 फीसदी, झारखंड 12.8 फीसदी, मध्य प्रदेश 11.6 फीसदी और राजस्थान 8.4 फीसदी का स्थान है।
रिपोर्ट में पाया गया है कि बचपन में होने वाले निमोनिया के लिए घर में वायु प्रदूषण जोखिम का एक महत्वपूर्ण कारक है। जिन घरों में खाना बनाने के लिए एलपीजी का इस्तेमाल होता है वहां यह समस्या नहीं है और ऐसे घरों में एआरआई की संभावना दो फीसदी से भी कम होती है।
इसमें निमोनिया के लक्षणों के बारे में जागरुकता और जल्दी देखभाल पर विशेष ध्यान केंद्रित करने पर भी जोर दिया गया है।
जितेन्द्र
वार्ता
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