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पेंशन की पेशकश ठुकरा चंबल के इस वीर ने दिखाया था अग्रेंजो को ‘ठेंगा’

पेंशन की पेशकश ठुकरा चंबल के इस वीर ने दिखाया था अग्रेंजो को ‘ठेंगा’

इटावा, 13 अगस्त (वार्ता) आजादी के आंदोलन के दौरान चंबल इलाके के राजाओं ने भी अपने साहस वीरता का पराक्रम दिखाने में कोई कमी नही रखी थी ।

इन्ही में से एक भरेह राजवंश के राजा निरंजन सिंह जूदेव थे। वर्ष 1857 के गदर के दौरान अंग्रजो की ओर से 200 रुपए की प्रतिमाह पेंशन देने की पेशकश की गई लेकिन आज़ादी के मतवाले इस राजा ने अग्रेंजो की इस खैरात को स्वीकारने से इंकार कर दिया। जिसके नतीजे में जंग शुरू हो गयी।

इटावा के के के पीजी कालेज में इतिहास विभाग के हेड डा़ शैलेन्द्र शर्मा के अनुसार साल 1857 से लेकर के 1860 तक राजा निरंजन सिंह जूदेव अंग्रेजों के दांत खट्टे करते रहे। मशक्कत के बाद महायोद्धा को अंग्रेजी हुकूमत में गिरफ्तार कर काला पानी की सजा सुनाई और किले को तोपों से उड़ा दिया ।

श्री शर्मा ने बताया कि दुनिया पर हुकूमत करने वाले ब्रिटिश हुक्मरानों के खिलाफ क्रांति में अग्रणीय भूमिका निभाने वाले चम्बल इलाके की भरेह रियासत के ध्वस्त किले का एक-एक टुकड़ा 1857 के प्रथम स्वत्रंता आंदोलन की दास्तां सुना रहा है।

इटावा के हज़ार साल पुस्तक के हवाले से इतिहासकार ने बताया कि वक्त की मार और सरकारी उपेक्षा के कारण नष्ट हो चुके इस राष्ट्रीय धरोहर ने 1857 की प्रथम स्वत्रंता क्रांति के दौरान अहम भूमिका निभाई थी। बाद में अंग्रेजो नें तोपों से इस किले को ध्वस्त कर दिया था। इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय धरोहर को आजाद भारत में भी पुरात्तव विभाग ने अपने कब्जे में नहीं लिया है।


श्री शर्मा ने बताया कि इस किले का ऐतिहासिक महत्व इस बात से भी बढ़ जाता है कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और 1857 की क्रांति की प्रमुख नायिका भी यहां एक दिन रुकी थीं। इस पुराने किले की बुलंदियों का अब कोई चश्मदीद गवाह मौजूद नहीं है। इसके बावजूद किले का जर्रा-जर्रा अभी भी यह दास्तां बयां कर रहा है कि उसने भी अंग्रेजों की तोपों का सामना किया है।

उन्होंने बताया कि चकरनगर से 11 किलो मीटर की दूरी पर रियासत भरेह थी। जहां राजा रुप सिंह का शासन था। अभिलेख बताते हैं कि 1857 की क्रांति में हिस्सा लेने वाले अधिकांश नबाव व राजा अपने अधिकारों की रक्षा की लड़ाई लड़ रहे थे लेकिन इतिहास का एकमात्र क्रांतिकारी राजा रुप सिंह ऐसा सिपाही था, जिसने अपने सभी राजसी वैभव को दाव पर लगा कर मेहनतकश मजदूरों के हक के लिए अंग्रेजों से लोहा लिया।

आज़ादी के इतिहास का यह पहलू बीहड़ी इलाके में यमुना नदी के किनारे समेटे हुए है, जहाँ मौजूद अवशेष अपनी कहानी बयां करते हैं। यहाँ राजा निरंजन सिंह जूदेव का किला होने के साथ ही बंदरगाह हुआ करता था 1857 से पहले यही से जलमार्ग के जरिये व्यापार होता था। राजा के सैनिक नारियल बाल्मीक ने इसी जगह पर दो अंग्रेजो को मार गिराया था।

इसके बाद ही अंग्रेजों ने किले की तोप से उड़ा दिया चकरनगर खेड़ा की बस्ती भी तोपों से उड़ा दी गई। राजा निरंजन सिंह जूदेव ने सीमित संसाधनों के बावजूद हार नहीं मानी और तीन वर्ष तक जंगल में छुपकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपने वफादारों के साथ लोहा लेते रहे।


इतिहासकार ने कहा कि वर्ष 1960 में अंग्रेजी बाजा राजा निरंजन सिंह जूदेव के बीच जबरदस्त भिड़ंत अंग्रेजों ने राजा को पकड़ लिया और काला पानी की सजा दी।

1857 में मेरठ स्थित सैनिक छावनी में अंग्रेजी हकूमत के खिलाफ उठी बगावत की आग को तेज करने तथा हकूमत का नामोनिशान मिटाने के लिए विद्रोह की चिंगारी में भरेह के राजा रुप सिंह ने घी का काम किया।

भरेह के राजा रूप सिंह ने 1857 की क्रांति में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने अंग्रेजों की बढ़ती गतिविधियों पर सिकरौली के राव हरेंद्र सिंह व चकरनगर रियासत के राजा निरंजन सिंह से मिलकर इटावा में अंग्रेजों के वफादार कुंवर जोरसिंह और सरकारी अधिकारियों को हटाने की मुहिम छेड़ दी थी। दोनों ही राजाओं ने झांसी की रानी को समर्थन देकर अंग्रेजों को खुली चुनौती दी।

राजा भरेह कुंवर रूप सिंह ने शेरगढ़ घाट पर नावों का पुल बनवाया। इस कार्य में निरंजन सिंह सहित क्रांतिकारी जमीदारों ने उनका साथ दिया। झांसी के क्रांतिकारियों ने शेरगढ़ घाट से यमुना नदी पार कर 24 जून 1857 को औरैया तहसील को लूटा। कई बार अंग्रेजी सिपाहियों से भरेह व चकरनगर के राजाओं के बीच लड़ाई हुई। अगस्त 1857 के आखिरी सप्ताह में अंग्रेजी फौज 18 पाउंड की तोपें लेकर व्यापारियों की नावों से यमुना नदी के रास्ते भरेह पहुंची और राजा के किले पर हमला किया।


श्री शर्मा ने बताया कि राजा रूप सिंह पहले ही अंग्रेजी सरकार के मंसूबों को भांप चुके थे। उन्होंने किला पहले ही खाली कर दिया था। 5 सितंबर को अंग्रेजी फौज ने भरेह के किले को तहस नहस कर दिया। 6 सितंबर को अंग्रेजी फौज ने भरेह से चकरनगर तक कच्ची सड़क बनाकर चकरनगर किले पर हमलाकर उसे अपने कब्जे में लिया। अंग्रेजों ने चकरनगर में एक स्थाई फौज छावनी बनाई।

इस दौरान राजा निरंजन सिंह को रोकने के लिए सहसों में फौजी चौकी स्थापित कराई गई। 1857 की क्रांति ने जिले में यह दर्शा दिया कि देश की स्वतंत्रता के लिए सभी तैयार हैं। 1858 में अंग्रेजों का पुन: राज्य हो गया। अंग्रेजों ने सारी रियासत जब्त कर प्रतापनेर के राजा जोर सिंह को सौंप दी थी।

आजादी के 70 साल बाद भी भरेह का ऐतिहासिक किला बदहाल है। वही दुर्भाग्य का विषय यह हैं कि आजादी के बाद इस महान स्वतंत्रा सैनानी राजा रुप सिंह के नाम से कोई स्मारक भी नही बनाया गया। आने वाले समय के लोगो को भरेह रियासत के राजा रुप सिंह के जंगे आजादी के महत्व के विषय में कोई जानकारी ही नही हैं वो इस बात से बिल्कुल अनभिज्ञ हैं। 1857 स्वत्रंत्रता संग्राम की जब बात आती हैं तो भरेह रियासत के योगदान को भुला दिया जाता हैं।

कालेश्वर महापंचायत के अध्यक्ष बापूसहेल सिंह परिहार बताते है कि राजा निरंजन सिंह जूदेव की वीरता का जितना बखान किया जाए वह कम है । उन्होंने भरेह रियासत के राजा रूप सिंह जूदेव से मिलकर आज़ादी के दरम्यान अंग्रेजो से खूनी जंग लड़ी थीं ।

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