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आधुनिकता की चकाचौंध में गुम होती जा रही कजरी और झूला झूलने की परंपरा

आधुनिकता की चकाचौंध में गुम होती जा रही कजरी और झूला झूलने की परंपरा

इलाहाबाद, 03 अगस्त (वार्ता)बदलते परिवेश में सावन माह में गाई जाने वाली कजरी और झूला झूलने की परंपरा धीरे धीरे गुम होती जा रही है।


      पूर्वी उत्तर प्रदेश में सावन में गांव देहातों में युवतियां व महिलाएं पुराने पेड़ो या कच्चे मकानों के धरनियों पर झूला लगाकर झूला झूलते हुए कजरी गीत गाकर आपस मे हंसी व ठिठोली करती थीं। आधुनिकता की दौड़ में धीरे धीरे यह परंपरा धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है।

     कजरी वह विधा है जिसमें सावन, भादों के प्रेम, वियोग और मिलन का चेहरा सामने आता है। सावन का सौंदर्य और कजरी की धुनों की मिठास वर्षा बहार का जो वर्णन लोक गायन की विधा कजरी में है वह कहीं और नहीं।

         एक दशक पहले तक सावन शुरू होते ही गांवों में पटोहे की शान समझी जाने वाली कजरी गाती युवतियाें की जुगलबन्दी की मिठास सुनने के लिए राहगीर भी कुछ पल ठहर जाते थे लेकिन आधुनिक परंपरा, पाश्चात्य जीवन शैली

का आधिपत्य और मोबाइल के मोहपास के कारण अब धीरे धीरे किताब के पन्नों तक सीमिटती जा रही है।

करीब ढ़ेड़ दशक पहले तक पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों में कजरी की खासी धूम हुआ करती थी, लेकिन अब इसको जानने वाले लोग गिने चुने रह गये हैं। सावन के शुरूआत से ही कजरी के बोल और झूले गांव-गांव की पहचान बन जाते थे।

    “झूला पड़ै कदंब की डाली, झूलैं कृष्ण मुरारी ना” के बोल से शुरू होने वाली कजरी दोपहर से शाम तक झूले पर चलती रहती थी। कजरी के गायन में पुरुष भी पीछे नहीं थे।

     दिन ढ़लने के बाद गांव में कजरी गायन की मंडलियां जुटती थीं। देररात तक महिलाओं का समूह में कजरी का दौर चलता था लेकिन अब प्रकृति के आनंद से दूर घरों में टीवी सीरियल और मोबाइल के इर्द-गिर्द अपने को कैद

कर लिया है।

     कजरी के वर्ण्य-विषय ने जहाँ एक ओर भोजपुरी के सन्त कवि लक्ष्मीसखी, रसिक किशोरी आदि को प्रभावित किया, वहीं अमीर ख़ुसरो, बहादुरशाह ज़फर, सुप्रसिद्ध शायर सैयद अली मुहम्मद 'शाद', हिन्दी के कवि अम्बिकादत्त

व्यास, श्रीधर पाठक, द्विज बलदेव, बदरीनारायण उपाध्याय 'प्रेमधन' आदि भी कजरी के आकर्षण मुक्त नहीं रह सके।

     आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने भी अनेक कजरियों की रचना कर लोक-विधा से हिन्दी साहित्य को सुसज्जित किया। उन्होने कजरी गीतों में प्रेम, श्रृंगार और विरह विषयक को बखूबी से चित्रित किया है।

     ऋतु प्रधान लोक-गायन की शैली कजरी का फ़िल्मों में भी प्रयोग किया गया है। हिन्दी फ़िल्मों में कजरी का मौलिक रूप कम मिलता है, लेकिन 1963 में प्रदर्शित भोजपुरी फ़िल्म 'बिदेसिया' में इस शैली का अत्यन्त मौलिक रूप प्रयोग किया गया। इस कजरी गीत की रचना अपने समय के जाने-माने लोक गीतकार राममूर्ति चतुर्वेदी ने की थी।

आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की कर्मभूमि और संसदीय क्षेत्र के बुजुर्ग हो चुके अपने समय के कजरी गवैया बाबा भगवती दीन बताते हैं कि सावन में पुरूष कजरी गायन मंडली जिले के अन्य हिस्सों

में भी लोगों को अपने गीतों से मंत्रमुग्ध कर देती थी, लेकिन अब यह सब समाप्त हो चुका है। पहले सावन के महीने में कजरी को गाकर उनकी गायन मंडली अच्छा पैसा कमा लेती थी, लेकिन अब कजरी के शौकीन लोग नहीं रहे।

     अब न/न तो कजरी के कलाकार रहे और न ही कद्रदान। जैसे जैसे पुरानी पीढ़ी खत्म होती जा रही कजरी भी दम तोड़ती जा रही है। अब न कोई सिखने वाला है और न ही सीखने वाला। नये लोग इसे हीन भावना से देखते हैं और इसे

सीखने का प्रयास भी नहीं करते। गजरी गीत को बचाने की नितांत आवश्यकता है अन्यथा आने वाले समय में इसके बारे में बताने वाला कोई नहीं मिलेगा।

     उन्होने कहा कि ऐसे में क्या कल्पना किया जा सकता है कि हम अपनी पुरानी परंपरा को बचा सकते हैं। कजरी लोकगीतों की धरोहर है। कुछ वर्षों तक कजरी गाने वाले कलाकार जिले में मौजूद थे, लेकिन अब इनकी संख्या गिनी

चुनी रह गई है। सरकार को लोक कलाओं के संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए, जिससे लोक संस्कृति और परंपराएं जीवित रह सकें।

     बाबा भगवतीदीन ने बताया कि अपने यहां भले ही पारंपरिक लोकगीतों का महत्व कम हो रहा है, लेकिन विदेशों में अब भी इनकी धूम है। भारत के बाहर सूरीनाम, त्रिनिदाद, मारिशस आदि देशों में भारतवंशी पारंपरिक लोेेकगीतों

को अब भी काफी चाव से सुनते हैं। उन्होने पूछा कि जब विदेशों में अपनी पारंपरिक लोकगीतों की लोगों में चाहत है तो यहां क्यों नहीं।

     उन्होंने बताया कि प्रतीक्षा, मिलन और विरह की अविरल सहेली, निर्मल और लज्जा से सजी-धजी नवयौवना की आसमान छूती खुशी, आदिकाल से कवियों की रचनाओं का श्रृंगार कर, उन्हें जीवंत करने वाली लाेकगीतो की रानी ‘कजरी’ वस्तुतः ‘लोकगीतों की रानी’ कजरी सिर्फ गायन भर नहीं है, बल्कि यह सावन के मौसम की सुंदरता और उल्लास का उत्सवधर्मी पर्व है।

बाबा भगवतीदीन ने बताया कि कजरी विरहगीत की प्रतिद्वन्दता है तो ननद-भाैजाई के बीच खट्टे-मीठे स्वाद का मिठास है। वधुये और बालायें हिंडोले पर बैठकर कजरी गाती है, वर्षा ऋतु में यह गीत पपीहा, बादलों तथा पुरवा हवाओं के झोंकों से बहुत प्रिय लगता है।

     आधुनिकता की चकाचौंध में पुरानी परम्पराएं ओझल होती जा रही हैं। कभी कजरी पर्व आने के महीनों पहले से ही पेड़ों की डालियों पर महिलाओं का समूह झूला झूलते हुए कजरी गाता नजर आता था। सावन एवं भादों का महीना

प्रकृति के और नजदीक ले जाता है। झूला झूलने के दौरान गाये जाने वाले मधुर गीत मन को सुकून पहुंचाने वाले होते हैं। समय के साथ गायब होते पेड़ सावन के झूले हमारी प्राचीन विरासत की धरोहर को नष्ट करते जा रहा है।

     'कजरी' की उत्पत्ति कब और कैसे हुई, यह कहना कठिन है, लेकिन यह तो निश्चित है कि मानव को जब स्वर और शब्द मिले, और जब लोक जीवन को प्रकृति का कोमल स्पर्श मिला होगा, उसी समय से लोकगीत हमारे बीच हैं। प्राचीन काल से ही उत्तर प्रदेश का मिर्जापुर माँ विंध्यवासिनी के शक्तिपीठ के रूप में आस्था का केन्द्र रहा है। अधिसंख्य प्राचीन कजरियों में शक्तिस्वरूपा देवी का ही गुणगान मिलता है। कजरी गायन का प्रारम्भ देवी गीत से ही होता है। कुछ कजरी परम्परागत रूप से शक्ति स्वरूपा माँ विंध्यवासिनी के प्रति समर्पित भाव से गायी जाती हैं।

        समाजशास्त्र से परास्नातक करने वाली अनु शर्मा का कहना है कि कजरी गीत का एक प्राचीन उदाहरण तेरहवीं शताब्दी का, आज भी न केवल उपलब्ध है बल्कि गायक कलाकार इसको अपनी प्रस्तुतियों में प्रमुख स्थान देते हैं।

यह कजरी अमीर ख़ुसरो की बहुप्रचलित रचना “अम्मा मेरे बाबा को भेजो जी कि सावन आया...।” भारत में अन्तिम मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फर की एक रचना-“झूला किन डारो रे अमरैयाँ...” भी बेहद प्रचलित है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने ब्रज और भोजपुरी के अलावा संस्कृत में भी कजरी रचना की है।

     उन्होने बताया कि साहित्यकारों द्वारा अपना लिये जाने के कारण कजरी गायन का क्षेत्र भी अत्यन्त व्यापक हो गया। इसी प्रकार उपशास्त्रीय गायक-गायिकाओं ने भी कजरी को अपनाया और इस शैली को रागों का बाना पहना कर

क्षेत्रीयता की सीमा से बाहर निकाल कर राष्ट्रीयता का दर्ज़ा प्रदान किया।

दिनेश भंडारी

वार्ता

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