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जख्मी और बेसहारा पशुओं की मदर टेरेसा हैं झांसी की निर्मला वर्मा

जख्मी और बेसहारा पशुओं की मदर टेरेसा हैं झांसी की निर्मला वर्मा

झांसी 04 सितम्बर (वार्ता) “ मदर टेरेसा” एक ऐसा नाम जिसके सामने में आते ही  असीम ममता और मानव सेवा की भावना से परिपूर्ण एक ऐसी महिला की छवि जहन में उभरती है जिसने नि:स्वार्थ भाव से अपना पूरा जीवन लोगों की मदद में गुजार दिया। कुछ इसी तरह की भावना उत्तर प्रदेश की वीरांगना नगरी झांसी में रहने वाली निर्मला वर्मा के काम को देखकर आती है जो गली-गली घूमने वाले जख्मी और बेसहारा जानवरों की नि:स्वार्थ भाव और पूरी लगन से वैसे ही सेवा करती हैं जैसे मदर टेरेसा इंसानों की करतीं थी।

                      श्रीमती वर्मा ने यहां अपने आवास पर यूनीवार्ता से बुधवार को एक खास बातचीत में बताया कि बेसहारा और मुसीबत के मारे जानवरों की सेवा की यह भावना उन्हें उनके पिता से विरासत में मिली है। उनके पिता किसान थे जो अपने व्यस्त जीवन के बीच निरीह जानवरों की मदद का समय निकाल लेते थे और पूरे मनोभाव से उनकी सेवा करते थे। उनके पिता के इन प्रयासों से अनगिनत मरणासन्न जानवरों को नया जीवन मिला। जिस समय श्रीमती वर्मा के पिता यह काम करते थे वह भी उनके साथ माैजूद रहती थीं और उनकी मदद करती थीं ,इस तरह पशुप्रेम और सेवा की भावना आनुवांशिक गुणों की तरह पिता से बेटी मे पहुंच गये।

                     इस काम को करते हुए और जारी रखने में श्रीमती वर्मा के जीवन में बहुत सारी कठिनाइयां आयीं लेकिन कोई भी परेशानी ऐसी नहीं आयी कि जिसने उनका पशुप्रेम और सेवा की भावना पर कुछ भी असर डाला हो। उन्होंने बताया कि परेशानियों से घबराने की बजाएं ऐसी परिस्थथितयों ने उन्हें और मजबूत बना दिया। शादी के बाद उनके पति आर सी वर्मा ने भी उन्हें कभी ऐसा करने से नहीं रोका बल्कि हर संभव उनके काम में मदद की। वह जब भी किसी निरीह जानवर को मुसीबत में देखती हैं तो बिना किसी तरह के सोच विचार के वह उसका इलाज करने और उसकी सेवा में जुट जाती हैं।

                      बड़ी बात यह है कि 25 से 30 साल से इसी तरह काम कर रहीं निर्मला ने न तो कोई गैर सरकारी संगठन बनाकर जानवरों की मदद के लिए पैसा दूसरे लोगों से मांगा और न ही किसी दूसरे तरीके से कोई आर्थिक मदद हासिल की। अपने इस काम को ईशवर द्वारा उन्हें दिया गया बहुत बड़ा पुरूस्कार और दायित्व समझते हुए  उनका मानना है कि ईश्वर ने जानवरों के प्रति ऐसी ममतामयी सोच उन्हें दी है और उसने ही उन्हें इस खास काम के लिए चुना है, इसलिए वह अपने बल पर ही सेवा का यह काम करतीं हैं। 

                       इसके एवज में वह न तो किसी पुरस्कार की और न ही किसी तरह की आर्थिक मदद की चाहती हैं। उनका मानना है कि किसी और के पैसे से इन जानवरों की मदद करें तो हमारा क्या फायदा। मेरे पास जितना है और ईश्वर मुझे ज्यादा से ज्यादा देता है जिसके कारण किसी निरीह जानवर की मदद करते समय मुझे पैसे की तंगी से कभी दोचार नहीं होना पडा।

श्रीमती वर्मा का कहना है कि जब भी वह  किसी घायल जानवर कुत्ता हो, गाय ,भैस ,सांड , बिल्ली या किसी भी अन्य को देखती हैं तो उन्हें लगता है कि ईश्वर ने उनकी मदद के लिए मुझे भेजा है , ईश्वर ने यह जिम्मेदारी हर किसी को नहीं दी है। यह असीम कृपा केवल मुझे हासिल हुई है और मुझे यह काम अकेले ही करना है। इसके बाद वह कुछ नहीं सोचती बल्कि तन मन धन से जानवर विशेष की सेवा में लग जाती है। श्रीमती वर्मा की यह भावना उन्हे मदर टेरेसा से भी ऊंचा दर्जा देती है क्योंकि इस भाव से वह केवल अपने पैसे से ही घायल जानवरों के इलाज की पूरी व्यवस्था करती हैं, खुद उनके लिए भोजन बनाती और करातीं हैं, उसके रहने का पूरा इंतजाम करतीं हैं बिना किसी सहयोग के और बिना इस भावना के कोई उनके काम को सराहे, समाचार पत्रों या टीवी पर उनके काम को पहचान मिले वह पूरी तरह नि:स्वार्थ भाव से  अपने काम में लगी हैं।

                     पशुप्रेम और उनके प्रति समर्पण की भावना श्रीमती वर्मा में इतनी बलवती है कि इसके कारण वह बाहर रह रहे अपने बच्चों तक से मिलने नहीं जा पातीं हैं और न ही स्थानीय स्तर पर किसी से मिलने बाहर निकल पातीं हैं क्योंकि जो असहाय जानवर उनके घर में शरण पायें हैं उनकी सेवा उनके पीछे से कौन इतने मनोयोग से कर पायेगा जितने मनोयोग से वह करती हैं और यही एहसास उन्हें सब से दूर लेकिन जरूरतमंद जानवरों के करीब बनाये रखता है लेकिन वह इसे किसी तरह का बंधन नहीं मानती हैं।

                     श्रीमती वर्मा ने बताया कि जब उनके खुद के बच्चे भी छोटे थे तब भी वह यह काम अपने पति और परिवार की मदद से ऐसे ही करतीं थी। उन्होंने इस काम को जारी रखने के लिए काफी संघर्ष किया और घर मे जख्मी जानवरों के होने या उनके इलाज के दौरान किसी तरह की बीमारी उनके बच्चों को होने जैसी सोच उनके जहन में ही कभी नहीं आयी बल्कि उनके बच्चे भी ऐसे ही जानवरों के बीच खेलते कूदते बडे हुए। दो बार तो ऐसे ही दो कुत्तों ने उनके घर में घुसे सांपों से उनके परिवार की रक्षा की।

                    उन्होंने अपने इस काम को जारी रख पाने का श्रेय अपने पति और परिवार को दिया। उनके अंदर तो पशुप्रेम हद तक था लेकिन उनके पति और परिजनों ने उनकी इस भावना को न सिर्फ समझा बल्कि पूरा समर्थन भी दिया जिसके कारण वह आज तक और जब तक जीवित हैं तब तक इस काम को ऐसे ही नि:स्वार्थ भाव से करने के लिए दृढसंकल्पित हैं। 

सोनिया

वार्ता

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