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आरक्षित वन भूमि पर अतिक्रमण के मामले में फंसे मुनि चिदानंद

नैनीताल, 27 नवंबर (वार्ता) उत्तराखंड की धर्म नगरी ऋषिकेश के वीरपुर खुर्द गाँव में आरक्षित वन भूमि पर अतिक्रमण के मामले में परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष मुनि चिदानंद बुरी तरह फंस गए हैं।
इस मामले में पहले मुनि चिदानंद के खिलाफ वन विभाग द्वारा मामला दर्ज किया गया और अब मुआवजा वसूलने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। न्यायालय ने सरकार से इस मामले में जवाब पेश करने को कहा है। इस मामले में 4 दिसंबर को सुनवाई होगी।
हरिद्वार निवासी श्रीमती अर्चना शुक्ला की ओर से दायर जनहित याचिका पर कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवि मलिमथ और न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की युगलपीठ में सुनवाई हुई। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया आरक्षित वन भूमि पर से अतिक्रमण पूरी तरह हटा लिया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से हालांकि इसका विरोध किया गया। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को यह भी बताया गया कि मुनि चिदानंद की ओर से 2000 में आरक्षित वन भूमि पर अतिक्रमण किया गया था और 20 साल तक वन भूमि पर अतिक्रमण रहा।
इसलिए आरोपी से इसके बदले में मुआवजा वसूला जाए। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता विवेक शुक्ला ने बताया कि इसके बाद न्यायालय ने सरकार से उसका पक्ष जानने के लिए और जुर्माना के संबंध में सरकार से चार दिसंबर तक जवाब पेश करने को कहा है। इस मामले में चार दिसंबर को सुनवाई होगी।
याचिकाकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया था कि परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष मुनि चिदानंद की ओर से 35 बीघा आरक्षित वन भूमि पर अतिक्रमण किया गया है और अतिक्रमित भूमि पर 52 कमरे, एक बड़ा हॉल और गौशाला का निर्माण किया गया है। सरकार अतिक्रमण के खिलाफ कार्यवाही से बच रही है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि आरक्षित भूमि से पेड़ काटे गये हैं और इससे वन्य जीवों के प्राकृतिक वास पर प्रभाव पड़ा है। याचिकाकर्ता की ओर से उनके खिलाफ मामला दर्ज करने की मांग की गयी। इसके बाद वन विभाग की ओर से आरोपी चिदानंद के खिलाफ वन अधिनियम, 1927 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया।
रवीन्द्र, उप्रेती
वार्ता
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