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‘वन राजि’ जनजाति के विलुप्तीकरण को लेकर समाज कल्याण के निदेशक अदालत में तलब

नैनीताल, 13 फरवरी (वार्ता) उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने जंगलों में रहने वाली उत्तराखंड की वन राजि जनजाति के मामले में सुनवाई करते हुए मंगलवार को समाज कल्याण विभाग के निदेशक को आगामी 19 फरवरी को अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने के निर्देश दिये।
उत्तराखंड स्टेट लीगल सर्विस अथॉरिटी की ओर से दायर जनहित याचिका पर मुख्य न्यायाधीश रितु बाहरी और न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी की युगलपीठ में सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि उत्तराखंड वन राजि जनजाति का वजूद खत्म होता जा रहा है।
इस जनजाति की जनसंख्या लगातार घटती जा रही है। पिथौरागढ़ के 10 गांवों में रह रहे इस जनजाति की जनसंख्या सिमट कर लगभग 900 रह गयी है।इन लोगों के पास बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं।इनके खाने, रहने, स्वास्थ्य, शिक्षा के लिये कोई उचित प्रबंध नहीं है। पिथौरागढ़ में के जिस क्षेत्र में इस जनजाति के लोग रहते हैं वहां से डीडीहाट सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र 36 किमी और आंगनबाड़ी केन्द्र तीन किमी दूर है।
इनकी शिशु मृत्यु दर भी काफी है जिससे यह जनजाति विलुप्ति के कगार पर पहुंच गयी है। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि सरकार इनके विकास के लिये कोई ठोस योजना नहीं बना रही है। दूसरी ओर सरकार की ओर से कहा गया कि इन जनजाति के लोगों को सरकार बुनियादी सुविधाएं मुहैया करा रही है।
अदालत ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए समाज कल्याण विभाग के निदेशक को आगामी 19 फरवरी को अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने के निर्देश दिये। अदालत जानना चाहती है कि सरकार वन राजि जनजाति के लोगों को कौन-कौन सी सुविधा मुहैया करा रही है और उनके विकास के लिये क्या योजना है।
रवीन्द्र,आशा
वार्ता
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