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कशीदा शैली हुरमुचो के संरक्षण की जरुरत

जैसलमेर 12 अक्टूबर (वार्ता) भारत की प्राचीन और पारम्परिक सिंध कशीदा शैली हरमुचो की आज के मशीनी युग में भी अपनी अलग पहचान बना रखी है, लेकिन इसके संरक्षण के लिए इसे बढ़ावा देने एवं नई पीढ़ी में जागरुकता लाने की जरुरत है।
कशीदाकारी भारत का पुराना और बेहद खूबसूरत हुनर है। बेहद कम साधनों और नाममात्र की लागत के साथ शुरु किये जा सकने वाली इस कला के कद्रदान कम नहीं हैं लेकिन आधुनिक जमाने में हर काम के लिए मशीनरी के उपयोग के कारण नई पीढ़ी को भी इसके प्रति आकर्षित करने के लिए उन्हें जागरुक करने की आवश्यकता है ताकि यह पारम्परिक शैली को जीवित रखा जा सके।
रंग बिरंगे धागों और महीन सी दिखाई देने वाली सुई की मदद से कल्पनालोक का ऎसा संसार कपड़े पर उभर आता है कि देखने वाले दांतों तले अंगुलियां दबा लें। लखनऊ की चिकनकारी, पश्चिम बंगाल के कांथा और गुजरात की कच्छी कढ़ाई का जादू हुनर के शौकीनों के सिर चढ़कर बोलता है। इन सबके बीच सिंध शैली की कशीदाकारी हरमुचो ने जैसलमेर की हस्तशिल्प कला को एक अलग पहचान दी है।
तेज रफ्तार जिन्दगी में हर काम मशीनों से होने लगा है लेकिन सिंधी कशीदाकारों की कारीगरी हरमुचो किसी अजूबे से कम नज़र नहीं आती। बारीक काम और चटख रंगों का अनूठा संयोजन सामान्य से वस्त्र को भी आकर्षक और खास बना देता है। हालांकि वक्त की गर्द इस कारीगरी पर भी जमने लगी है। ऐसे में नई पीढ़ी को इस हुनर की बारीकियां सिखाने के लिये स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण कार्यक्रमों के जरिये इसके सरंक्षण की आवश्यकता है।
स्थानीय सिंधी मुस्लिम महिलाए आज भी हरमुचो कला के कद्रदानों को सुई-धागे से रचे जाने वाले अनोखे संसार के दर्शन करा रही हैं। हुरमुचो सिंधी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है कपड़े पर धागों को गूंथ कर सज्जा करना।
हुरमुचो भारत की प्राचीन और पारम्परिक कशीदा शैलियों में से एक है। अविभाजित भारत के सिंध प्रांत में प्रचलित होने के कारण इसे सिंधी कढ़ाई भी कहते हैं। सिंध प्रांत की खैरपुर रियासत और उसके आस-पास के क्षेत्र हरमुचो के जानकारों के गढ़ हुआ करते थे। यह कशीदा प्रमुख रूप से कृषक समुदायों की महिलाएं फसल कटाई के उपरान्त खाली समय में अपने वस्त्रों की सज्जा के लिये करती थीं। आजादी के साथ हुए बंटवारे में सिंध प्रांत पाकिस्तान में चला गया किंतु वह कशीदा अब भी भारत के उन हिस्सों में प्रचलित है, जो सिंध प्रान्त के सीमावर्ती क्षेत्र हैं।
पंजाब के मलैर कोटला क्षेत्र, राजस्थान के जैसलमेर ,बाड़मेर ,बीकानेर और श्री गंगानगर, गुजरात के कच्छ, महाराष्ट्र के उल्हासनगर तथा मध्य प्रदेश के ग्वालियर में यह कशीदा आज भी प्रचलन में है। जैसलमेर के मुस्लिम बहुल गांवों में आज भी महिलाए हरमुचो शैली की कशीदाकारी बड़े शौक से करती हैं। लेकिन अब इस शैली के सरंक्षण जरुरत है।
हुरमुचो कशीदा को आधुनिक भारत में बचाए रखने का श्रेय सिंधी समुदाय की वैवाहिक परंपराओं को जाता है। सिंधियों में विवाह के समय वर के सिर पर एक सफेद कपड़ा जिसे बोराणी कहते है, को सात रंगो द्वारा सिंधी कशीदे से अलंकृत किया जाता है। आज भी यह परम्परा विद्यमान है। सिंधी कशीदे की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें डिजाइन का न तो कपड़े पर पहले कोई रेखांकन किया जाता है और न ही कोई ट्रेसिंग ही की जाती है। डिजाइन पूर्णतः ज्यामितीय आकारों पर आधारित और सरल होते हैं। जिन्हें एक ही प्रकार के टांके से बनाया जाता है जिसे हुरमुचो टांका कहते हैं।
पारम्परिक रूप से हुरमुचो कशीदा वस्त्रों की बजाय घर की सजावट और दैनिक उपयोग में आने वाले कपड़ों में अधिक किया जाता था। चादरों, गिलाफों, रूमाल, बच्चों के बिछौने, थालपोश, थैले आदि इस कशीदे से सजाए जाते थे। बाद में बच्चों के कपड़े, ओढ़नियों आदि पर भी हरमुचो ने नई जान भरना शुरु कर दिया और आजकल सभी प्रकार के वस्त्रों पर यह कशीदा किया जाने लगा है।
भाटी जोरा
वार्ता
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