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वर्ष 1950 में विमल राय अपनी फिल्म दो बीघा जमीन के लिये संगीतकार की तलाश कर रहे थे। वह सलिल के संगीत बनाने के अंदाज से काफी प्रभावित हुये और उन्होंने सलिल से अपनी फिल्म दो बीघा जमीन में संगीत देने की पेशकश की। सलिल ने संगीतकार के रूप में अपना पहला संगीत वर्ष 1952 में प्रदर्शित विमल राय की फिल्म ..दो बीघा जमीन ..के गीत .. आ री आ निंदिया ..के लिये दिया । फिल्म की कामयाबी के बाद सलिल बतौर संगीतकार फिल्मों में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गये ।
फिल्म दो बीघा जमीन की सफलता के बाद इसका बंगला संस्करण ..रिक्शावाला .. बनाया गया । वर्ष 1955 में प्रदर्शित इस फिल्म की कहानी और संगीत निर्देशन सलिल ने ही किया था। फिल्म दो बीघा जमीन की सफलता के बाद सलिल विमल राय के चहेते संगीतकार बन गये और इसके बाद विमल राय की फिल्मों के लिये सलिल ने बेमिसाल संगीत देकर उनकी फिल्मो को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी ।
वर्ष 1960 में प्रदर्शित फिल्म ..काबुलीवाला .. में पार्श्वगायक मन्ना डे की आवाज में सजा यह गीत .. ऐ मेरे प्यारे वतन ऐ मेरे बिछड़े चमन तुझपे दिल कुर्बान .. आज भी श्रोताओं की आंखो को नम कर देता है । सत्तर के दशक में सलिल को मुंबई की चकाचौंध कुछ अजीब सी लगने लगी और वह कोलकाता वापस आ गये। उन्होंने इस बीच कई बंगला गानें लिखे। इनमें सुरेर झरना और तेलेर शीशी श्रोताओं के बीच काफी लोकप्रिय हुये । सलिल के सिने कैरियर में उनकी जोड़ी गीतकार शैलेन्द्र और गुलजार के साथ खूब जमी। सलिल के पसंदीदा पार्श्वगयिकों में लता मंगेश्कर का नाम सबसे पहले आता है। वर्ष 1958 मे विमल राय की फिल्म ..मधुमति .. के लिये सलिल को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।वर्ष 1998 में संगीत के क्षेत्र मे उनके बहूमूल्य योगदान को देखते हुये वह संगीत नाटय अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किये गये ।
सलिल ने अपने चार दशक लंबे सिने कैरियर में लगभग 75 हिन्दी फिल्मों में संगीत दिया । हिन्दी फिल्मों के अलावा उन्होने मलयालम .तमिल .तेलगू .कन्नड़ .गुजराती .आसामी. उडि़या और मराठी फिल्मों के लिये भी संगीत दिया। लगभग चार दशक तक अपने संगीत के जादू से श्रोताओं को भावविभोर करने वाले महान संगीतकार सलिल पांच सितंबर 1995 को इस दुनिया को अलविदा कह गये ।
प्रेम टंडन
वार्ता
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