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लोकरूचि-गणेशोत्सव अंग्रेज तीन अंतिम इलाहाबाद

नगर के वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित पत्रकार वीरेन्द्र पाठक ने बताया कि भारत से बाहर विदेशों में बसने वाले भारतीयों ने भारतीय संस्कृति की जड़ों को काफी गहराई तक फैलाने का प्रयास किया और इन पर भारतीय देवताओं की पूजा-उपासना का स्पष्ट प्रभाव था जो आज भी है। विदेशों में प्रकाशित पुस्तक ‘‘गणेश-ए-मोनोग्राफ आफ द एलीफेन्ट फेल्ड गॉड’’ में जो तथ्य उजागर किये गये हैं, उससे इस बात का स्पष्ट प्रमाण मिलता है कि विश्व के कई देशों में गणेश प्रतिमाएं बहुत पहले से पहुंच चुकी थी और विदेशियों में भी गणेश के प्रति श्रद्धा और अटूट विश्वास रहा है।
श्री पाठक ने बताया कि उत्सव एवं पर्वो के केंद्र तीर्थराज प्रयाग में गणेशोत्सव की शुरूआत वर्ष 1957 के आसपास दारागंज निवासी अधिवक्ता रामचंद्र गोड़बोले एवं बालाजी पाठक ने इसकी शुरुआत की। पूजा के लिए अलोपीबाग में पंजाबी कालोनी के सामने सेना से पांच हजार वर्ग गज जमीन लीज पर ली गई। धीरे धीरे इसका विस्तार हुआ। उस समय मराठी परिवार अधिक थे किन्तु अब गिनेचुने मराठी परिवार दारागंज, कीडगंज,नैनी, झूंसी चौक, मीरापुर, करेली, सिविल लाइंस और गोविंदपुर आदि मुहल्ले में परिवार रहते हैं, जहां पर विघ्नहर्ता का पण्डाल सजाया जाता है।
गणेश चतुर्थी वैसे तो पूरे देश में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन महाराष्ट्र में इस त्यौहार काे लेकर लोगों में एक अलग किस्म का उत्साह देखा जाता है। 13 सितम्बर गणेश चतुर्थी से शुरू होकर अनन्त चतुर्दशी (अनंत चौदस) तक चलने वाला 10 दिवसीय गणेशोत्सव मनाया जाता है। पूरे दस दिनों तक चलनेवाले इस उत्सव के दौरान भगवान गणेश घर-घर और सार्वजनिक पंडालों में विराजमान होते हैं। भगवान गणेश की मूर्ति को चतुर्दशी को उसे जल में विसर्जित कर दिया जाता है।
दिनेश प्रदीप
वार्ता
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