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श्री टंडन ने कहा कि देशी नस्ल की गायों में रोग प्रतिरोधक क्षमता तुलनात्मक रूप से काफी अधिक होती है। ये गायें बिहार और अन्य उत्तर भारतीय राज्यों के ज्यादा तापमान वाले इलाकों के भी अनुकूल होती हैं। इनके रख-रखाव और चिकित्सा पर भी काफी कम खर्च होता है। साथ ही, इन देशी नस्ल की गायों से कम लागत पर दूध का अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि प्रति लीटर दुग्ध-उत्पादन पर कम लागत के कारण यह अल्प आय वाले पशुपालकों की कमजोर आर्थिक स्थिति के लिहाज से भी उपयोगी हैं।
राज्यपाल ने राज्य में उन्नत नस्ल के सांढ़ों को भी ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध कराने पर जोर देते हुए कहा कि आज तो देहाती नस्ल की गायों में भी भ्रूण धारण के क्रम में लिंग निर्धारण की व्यवस्था विकसित करने के लिए व्यापक शोध चल रहे हैं। उन्हाेंने कुलपति को इस पद्धति को विकसित करने के लिए आवश्यक शोध कार्य को गंभीरतापूर्वक संचालित करने को कहा ताकि आज के परिवेश में अधिकतर बछड़ियों की ही पैदाईश सुनिश्चित हो सके।
श्री टंडन ने कहा कि दुग्ध-संग्रहण के कार्य में लगी सहकारी संस्थाओं के सुदृृढ़ीकरण के लिए भी विश्वविद्यालय को आवश्यक परियोजनाएं संचालित करनी चाहिए तथा इनसे सम्बद्ध और अन्य वैसे सभी पशुपालकों को प्रत्येक वर्ष पुरस्कृत और सम्मानित करने का कार्यक्रम बनाना चाहिए, जो देशी नस्ल की गायों या अन्य पशुओं के जरिये अधिक दुग्ध-उत्पादन में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। कुलपति ने राज्यपाल को आश्वस्त किया कि विश्वविद्यालय उनके मार्ग निर्देशों और सुझावों पर तत्परतापूर्वक अमल करेगा।
सूरज रमेश
वार्ता
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