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छात्रसंघ राजनीति से छात्रों का चाहे भला न हुआ हो लेकिन छात्र नेताओ ने अपनी पहचान अवश्य बनाई

इलाहाबाद, 01 सितम्बर (वार्ता) पूरब के आक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय( इविवि)में छात्रसंघ चुनाव राजनीति से छात्रों का चाहे भला नहीं हुआ लेकिन जीतने वालों ने अपनी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान अवश्य बनाई।
छात्र राजनीति के सहारे सक्रिय राजनीति में भाग्य आजमाने और छात्रों की हर परेशानी में खड़े रहने का दावा करने का वाले सूरमाओं ने चुनावी रणभूमि में भले ही ताल ठोक दी हो लेकिन चुनावी शोर में छात्रहित मुद्दों के साथ अन्य मुद्दे दब गये हैं। हालांकि आज की छात्र राजनीति से छात्रों का भला भले ही न/न हो, लेकिन चुनाव जीतने वाले जरूर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने में कामयाब होते हैं। विश्वविद्यालय छात्रसंघ का चुनाव पांच सितम्बर को होगा।
इविवि देश का एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय है, जिसे प्रशासनिक और राजनीतिक क्षेत्रों में सफल छात्र देने की नर्सरी कहा जाये तो कोई अतिशियोक्त नहीं होगा। इसके अलावा इस शिक्षा के मंदिर ने देश को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उप मुख्यमंत्री, नामचीन साहित्यकार, वैज्ञानिक, न्यायविद दिये हैं जिन्होंने अपनी मर्यादित आचरण और उत्तम शिक्षा से सर्वदा इसका सम्मान किया, लेकिन आज शिक्षा का मंदिर शिक्षा से दूर राजनीति का अखाड़ा बन गया है।
इविवि ने डा राजेन्द्र प्रसाद, मोतीलाल नेहरू , गोविन्द वल्लभ पन्त, शंकर दयाल शर्मा, गुलजारी लाल नन्दा , विश्वनाथ प्रताप सिंह , चन्द्रशेखर सिंह ,सूर्य बहादुर थापा (नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री), नारायण दत्त तिवारी , हेमवती नन्दन बहुगुणा , मुरली मनोहर जोशी , शान्ति भूषण जैसे राजनेता और महादेवी वर्मा , हरिवंश राय बच्चन , धर्मवीर भारती , भगवती चरण वर्मा , आचार्य नरेन्द्र देव , चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' जैसे लेखक एवम् शिक्षाविद् तो मोहम्मद हिदायतउल्ला, कमल नारायण सिंह, वी एन खरे और जे एस वर्मा जैसे न्यायप्रिय न्यायाधीश दिए हैं।
विश्वविद्यालय के चीफ प्राक्टर राम सेवक दूबे ने बताया कि छात्र प्रत्याशियों को लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का पालन करना होगा। उन्होंने बताया कि इसका उल्लंघन करने वाले प्रत्याशियों के विरूद्ध कार्रवाई की जाएगी और उनका नामांकन रद्द भी हो सकता है।
दिनेश तेज
वार्ता
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