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लोकरूचि- मेला कल्पवास दो प्रयागराज

वैदिक शोध एवं सांस्कृतिक प्रतिष्ठान कर्मकाण्ड प्रशिक्षण केन्द्र के पूर्व आचार्य डा आत्माराम गौतम ने “यूनीवार्ता”से बताया कि राम चरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने “माघ मकरगत रबि जब होई, तीरथपति आब सब कोई। देव दनुज किन्नर नर श्रेनी, सादर मज्जहि सकल त्रिबेनी” चौपाई की रचना कर इस बात काे प्रमाणित किया है कि त्रेतायुग में भी संगम नगरी में माघ मेला और कल्पवास की परंपरा आ रही है। लेकिन इस बार वैश्विक महामारी कोरोना का कल्पवास पर असर दिखलाई पड़ रहा है।
गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम तट पर संकल्प लेकर निश्चित अवधि तक प्रवास करना कल्पवास कहलाता है। शास्त्रों के अनुसार कल्पवास की न्यूनतम अवधि एक रात्रि, तीन रात्रि, तीन महीना, छह महीना, छह वर्ष, 12 वर्ष या जीवनभर भी कल्पवास किया जा सकता है। संगम तट पर निवास करते हुए कल्पवासी जप, तप, ध्यान, साधना, यज्ञ एवं दान आदि विविध प्रकार के धार्मिक कृत्य करते हैं। कल्पवास का वास्तविक अर्थ है कायाकल्प। यह कायाकल्प शरीर और अन्तःकरण दोनों का होना चाहिए। इसी द्विविध कायाकल्प के लिए पवित्र संगम तट पर जो एक महीने का वास किया जाता है जिसे कल्पवास कहा जाता है।
आचार्य गौतम ने बताया कि प्रतिवर्ष माघ मास मे जब सूर्य मकर राशि मे रहते हैंए तब माघ मेला एवं कल्पवास का आयोजन होता है। महाभारत के अनुसार सौ साल तक बिना अन्न ग्रहण किए तपस्या करने के फल बराबर पुण्य माघ मास में कल्पवास करने से ही प्राप्त हो जाता है।
उन्होंने बताया कि आदिकाल से चली आ रही इस परंपरा के महत्व की चर्चा वेदों से लेकर महाभारत और रामचरित मानस में अलग-अलग नामों से मिलती है। बदलते समय के अनुरूप कल्पवास करने वालों के तौर-तरीके में कुछ बदलाव जरूर आए हैं लेकिन कल्पवास करने वालों की संख्या में कमी नहीं आई है। आज भी श्रद्धालु भयंकर सर्दी में कम से कम संसाधनों की सहायता लेकर संगम में कल्पवास करने पहुंचते हैं।
कल्पवास के पहले शिविर के मुहाने पर तुलसी और शालिग्राम की स्थापना और पूजा आवश्य की जाती है। कल्पवासी अपने घर के बाहर जौ का बीज अवश्य रोपित करता है। कल्पवास समाप्त होने पर तुलसी को गंगा में प्रवाहित कर देते हैं और शेष को अपने साथ ले जाते हैं। कल्पवास के दौरान कल्पवासी को जमीन पर रात्रि विश्राम करना होता है। इस दौरान फलाहार या एक समय निराहार रहने का प्रावधान होता है। कल्पवास करने वाले व्यक्ति को नियम पूर्वक तीन समय गंगा में स्नान और यथासंभव अपने शिविर में भजन-कीर्तन, प्रवचन या गीता पाठ करना चाहिए।
दिनेश विनोद
जारी वार्ता
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