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लोकरूचि-माघ मेला कल्पवास चार अंतिम प्रयागराज

आचार्य गौतम ने बताया कि महाभारत के एक प्रसंग में मार्कंडेय धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं कि राजन तीर्थराज प्रयाग सब पापों को नाश करने वाला है। जो भी व्यक्ति प्रयाग में एक महीना इंद्रियों को वश में करके स्नान, ध्यान और कल्पवास करता है, उसके लिए स्वर्ग का स्थान सुरक्षित हो जाता है।
कल्पवास वेदकालीन अरण्य संस्कृति की देन है। कल्पवास के नियम हजारों वर्षों से चला आ रहा है। जब इलाहाबाद तीर्थराज प्रयाग कहलाता था और यह आज की तरह विशाल शहर न/न होकर ऋषियों को तपस्थली माना जाता था। यहां गंगा और यमुना के आसण्पास घना जंगल था। इस जंगल में ऋषिण्मुनि ध्यान और तप करते थे। ऋषियों ने गृहस्थों के लिए कल्पवास का विधान रखा।
उन्होंने बताया कि कल्पवास के नियम के अनुसार जब गृहस्थ कल्पवास का संकल्प लेकर आता है, वह पत्तों और घास-फूस की बनी कुटिया में रहता था जिसे उसे पर्ण कुटी कहा जाता था। इस दौरान एकबार ही भोजन किया जाता है और मानसिक रूप से धैर्य, अहिंसा और भक्तिभव का पालन किया जाता है। कल्पवासी सुबह की शुरूआत गंगा स्नान से करते हैं। उसके बाद दिन में संतो की सत्चर्चा किया जाता है, देर रात तक भजन कीर्तन चलता रहता है। करीब दो महीने से अधिक का समय सांसारिक भागदौड़ से दूर तन और मन को नयी स्फूर्ति देने वाला होता है।
पौष पूर्णिमा पर प्रयागराज माघ मेला का गुरूवार को दूसरा बड़ा स्नान पर्व है। हालांकि इस स्नान पर्व से संगम में स्नान करने के साथ त्याग-तपस्या का प्रतीक कल्पवास आरंभ हो रहा है। देशभर के गृहस्थ संगम तट पर तंबुओं में रहकर माह भर भजन-कीर्तन करना शुरू करेंगे। मोक्ष की आस में संतों के सानिध्य में समय व्यतीत करेंगे। सुख-सुविधाओं का त्याग करके दिन में एक बार भोजन और तीन बार गंगा स्नान करके तपस्वी का जीवन व्यतीत करेंगे।
दिनेश विनोद
वार्ता
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