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सरसो की खेती से चंबल बन गई सुनहरी वादी

इटावा , 15 फरवरी (वार्ता) दस्यु गिरोहों के आतंक के चलते दशकों तक वीरान और बंजर रही चंबल घाटी किसानो की लगन मेहनत के बल पर आज सरसों की पीली फसल से सुनहरी वादी की शक्ल अख्तियार करने लगी है।
इटावा के जिला उप कृषि निर्देशक आर.एन. सिंह बताते है कि जिले में 25 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में किसानों ने सरसों की फसल को अपने-अपने खेतों में उगाया है। उम्मीद है कि किसानों को सरसों की फसल से बहुत अधिक फायदा पहुंचेगा।
उन्होंने बताया कि साल 2020-21 में 14764 हेक्टेयर में सरसों की फसल किसानो ने उपजाई जिससे 34.46 फीसदी उत्पादन हुआ वही साल 2021- 22 में 21341 हेक्टेयर क्षेत्र में किसानों ने सरसों की फसल बोई जिससे किसानों को 41.122 फीसदी उत्पादन हुआ। 2022 और 23 में 25473 हेक्टेयर में सरसों की फसल बोई गई जिससे किसानों को 44.83 फीसदी उत्पादन हासिल हुआ है जबकि साल 2023 -24 में 25975 हेक्टेयर इलाके में सरसो की फसल बोई गई जिससे किसानों को 45.797 फीसदी सरसों फसल की उम्मीद जताई जा रही है।
घाटी और उसके आसपास से सटे भिंड, मुरैना और श्योपुर जिले को व्याप्त पीली क्रांति ने यहां की धरती पर लगे डकैती के कलंक को काफी हद तक धो दिया है। चंबल घाटी मे कुल उपजाऊ भूमि से तीन लाख अस्सी हजार हैक्टेयर रकबा भूमि इस वर्ष सरसों का उत्पादन लिया जा रहा है।
चंबल घाटी का हर खेत इस समय बंसती रंग से रंगा पुता नजर आ रहा है। एक वो भी समय था जब चंबल मे डाकुओ की बंदूको से निकलने वाली गोलियो ने इलाके के खेतो को बंजर कर दिया था अगर कोई किसान अपने खेतो मे फसल करने की भी कोशिश करता था उसे डाकुओ का दल उजाड कर दिया करता था लेकिन आज डाकू है ही नही इसलिए खेतो मे सरसो ही सरसो नजर आ रही है।
जिले की चकरनगर तहसील मे भी किसानो ने बडे स्तर पर सरसो की फसल को उगा रखा है । रामसजीवन बताते है कि हम लोग अपने खेतो मे सरसो की फसल को इसलिए उगा रहे क्यो कि सरसो मे बहुत अधिक लागत नही आ रही है और फायदा भी बहुत अधिक हो रहा है इसी कारण सरसो की फसल को पैदा किया जा रहा है।
इस प्रकार लाखों क्विंटल पीले सोने के उत्पादन की उम्मीदों से लालायित होकर किसान और सरकार बेहद खुश हैं। सरसों के बेशुमार उत्पादन से चंबल के किसान की गृहस्थी का सालभर का गुजारा चलता है। जाड़ों के मौसम में एक पखवाड़ा ऐसा आता था जब चंबल और क्वारी नदी के आसपास के क्षेत्र सोंहा के पीले फूलों से ढंक जाते थे । दूर से देखने पर मालूम होता था जैसे सोना पानी बनकर नदी में बह रहा हो। ट्यूबवेल नहरों के मार्फत माकूल सिंचाई का इंतजाम हो जाने से सोंहा की जगह आहिस्ता-आहिस्ता सरसों ने ले ली । पीले सोने के उत्पादन को देखें तो मुरैना जिले में हरियाणा से भी अच्छी पैदावार है।
सरसों के औसत उत्पादन की बात करें तो चंबल संभाग में 17 से 18 क्विंटल प्रति हैक्टेयर पैदावार होती है। चंबल संभाग में इस बार सरसों के अच्छे उत्पादन की उम्मीद बन रही है। सरसो के कारोबार से जुडे सिंडौस गांव के सज्जन सिंह राजावत का कहना है कि चंबल मे सरसो की फसल की पैदावार बढने के मुख्य कारण यह है कि चंबल इलाके मे फसल के लिए पानी उस तरह से उपलब्ध नही हो पाता है जिस ढंग से दूसरे इलाको मे होता है इस लिहाज से इलाके के लोगो को रूझान सरसो की फसल की ओर बढता चल गया है क्यो कि सरसो की फसल करने पर उस हिसाब से पानी की जरूरत नही पडती है।
सं प्रदीप
वार्ता
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