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डाॅ. गंभीर ने कहा कि अमेरिका में सभी शैक्षिक विषयों के मानक पाठ्यक्रम तैयार किये गये हैं। विदेशी भाषा शिक्षण के अंतर्गत पांच सी आते हैं। ये हैं कम्यूनिकेशन, कल्चर, कनेक्शन, कम्पेरिजन और कम्यूनिटीज। इन सबको समेकित किया जाता है। उन्होंने कहा कि अमेरिका में लगभग सौ विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है। वहां हिन्दी सीखने की अलग-अलग रूचियां और वर्ग हैं। वहां भाषा ज्ञान मापने का एक परीक्षण भी किया जाता है।
गयाना, त्रिनिदाद, सूरीनाम, मॉरिशस, फ़िजी और अमरीका के प्रवासी भारतीयों की भाषाओं से संबंधित भाषा-विकास और भाषा-ह्रास के विभिन्न पक्षों पर महत्वपूर्ण काम करने वाले डाॅ. गंभीर ने कहा कि विद्यार्थियों को संस्कृति की छोटी-छोटी बातों को बताना पड़ता है। बोलचाल की भाषा और औपचारिक भाषा अलग-अलग होती है। उन्होंने कहा कि वैश्विक परिप्रेक्ष्य में पारस्परिक विनिमय बढ़ा है।
हिन्दी के जानकार आनंद वर्धन ने कहा कि विदेशों में भाषा अध्यापन के रूप सैद्धांतिक और व्यवहारिक हैं। विद्यार्थियों को पहले संस्कृति का व्यवहारिक ज्ञान देना चाहिये और उसके बाद सैद्धांतिक। यह भी आवश्यक है कि विद्यार्थियों को फिल्मों, कविताओं, गीतों और नाटकों के माध्यम से भाषा का ज्ञान कराना चाहये।
जापान में अध्यापक रहे प्रोफेसर हरजेंद्र चंद्र ने कहा कि विदेशियों को भारतीय संस्कृति के बारे में बताना बहुत सरल नहीं है। उन्हें अर्थ समझाना पड़ता है, इस दृष्टि से नाटकों की सहायता ली जा सकती है।
शिवा. उपाध्याय
वार्ता
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