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श्रीमती स्वराज ने कहा, “हिंदी भाषा बेहद उदार है। हिन्दीभाषी लोग भाषा की स्तुतियों पर ध्यान नहीं देते और गलत बोलने वालों को भी इसे बोलने की इजाजत देते हैं जबकि अन्य भाषा के साथ ऐसा नहीं है। यदि आप गलत बोलते हैं तो लोग आपको साफ कह देंगे कि आप उस भाषा में नहीं बोल सकते हैं तो न बोलें।” उन्होंने कहा कि भाषा की शुद्धता जरूरी है लेकिन शुद्धता का अर्थ क्लिष्ठ भाषा नहीं होनी चाहिए। हिन्दी भाषियों को चाहिए कि वे क्लिष्ठ भाषा की हठधर्मिता को छोड़, सरल और सहज भाषा को अपनायें, इससे हिंदी का विस्तार होगा।
विदेश मंत्री ने कहा कि डॉ. नरेंद्र कोहली की बात उन्हें अच्छी लगी कि कोई भी भाषा या शब्द तब तक कठिन लगता है जब तक हम उससे अपरिचित होते हैं। जैसे-जैसे हम शब्द या भाषा से परिचित होते हैं तो वह सरल लगने लगता है।
पत्रकारों ने जब श्रीमती स्वराज को बताया कि मॉरीशस में युवा पीढ़ी हिंदी से दूर हो रही है। इस पर उन्होंने कहा कि मॉरीशस भी भारत का छोटा भाई है और यहां के लोगों को भी लगता है कि हिंदी पढ़ने से रोजगार नहीं मिलता। लेकिन, धीरे-धीरे यह भ्रम टूट रहा है। हिंदी बोलने और पढ़ने वाले लोगों की संख्या बड़ी होने के कारण अंग्रेजी की तुलना में सिर्फ मीडिया के क्षेत्र में ही क्षेत्रीय भाषाओं के अखबार, पत्र-पत्रिकाओं, टीवी चैनलों में रोजगार ज्यादा मिल रहे हैं जबकि अंग्रेजी मीडिया में रोजगार के अवसर कम हैं।
श्रीमती स्वराज ने कहा कि चीन, जापान, जर्मनी और रूस ने अंग्रेजी के बजाय अपनी भाषा को अधिक महत्व दिया। वहां के लोग अंग्रेजी नहीं जानते लेकिन इसके कारण उन्हें ऊंचाइयां छूने से कोई नहीं रोक सका। यह साबित करता है कि अपनी भाषा के बल पर भी मुकाम हासिल की जा सकती है।
शिवा. उपाध्याय
वार्ता
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