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महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (वर्धा) से पीएचडी कर चुके बुडापेस्ट (हंगरी) के पीटर शागी ने कहा कि हिंदी सीखने के बाद वह अब अपने देश के एल्ते विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस विश्वविद्यालय में करीब 30 छात्र स्थानीय हैं और वे भारतीय मूल के नहीं हैं। वे हिंदी और भारतीय अध्ययन की पढ़ाई कर रहे हैं।
श्री शागी ने कहा कि उनके देश के युवाओं में भी भारत और उसकी संस्कृति को जानने की रूचि काफी बढ़ी है। उन्होंने कहा कि हिंदी सीखकर ही हम भारत को अच्छी तरह से जान सकते हैं।
इंडोनेशिया के रहने वाले और विश्व रामायण सम्मेलन के समन्वयक रहे धर्मयश ने कहा कि हिंदी भारत की सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी एक भाषा है। इसे युवाओं को सिखाना चाहिए नहीं तो आधुनिकता के दौर में नयी पीढ़ी अपनी सभ्यता और संस्कृति से दूर हो जाएगी। तीस से अधिक पुस्तक लिख चुके धर्मयश भारतीय ग्रंथ गीता, रामायण और रामचरितमानस का इंडोनेशियाई भाषा बहासा में अनुवाद कर चुके हैं। इनके द्वारा अनुवादित गीता के छह संस्करण अबतक प्रकाशित हो चुके हैं। इनके पंचतंत्र एवं हितोपदेश के अनुवाद को सर्वाधिक बिकने वाली पुस्तक के सम्मान से नवाजा जा चुका है। उन्होंने कहा कि हिंदी के साथ ही भारत की मूल भाषा संस्कृत सीखने का ही परिणाम है कि उन्होंने यह उपलब्धियां हासिल की हैं।
शिवा सूरज
वार्ता
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