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पंचक मुहूर्त में आखिरकार हुआ रावण का अंत

पंचक मुहूर्त में आखिरकार हुआ रावण का अंत

इटावा, 9 अक्टूबर (वार्ता) असत्य पर सच की जीत का पर्व विजयदशमी का शोर देश भर मंगलवार को ही थम गया था लेकिन उत्तर प्रदेश में इटावा के जसवंतनगर की ऐतिहासिक रामलीला मे बुधवार को पंचक मुहुर्त में लंकापति रावण का वध भगवान राम के हाथों हुआ।

जसवंतनगर में हजारो के जनसमुदाय के बीच बुधवार को स्वयं रावण बची खुची राक्षसी सेना के साथ राम से संग्राम के लिए रणभूमि पर उतरा और मारा गया जिसके बाद समूचा मैदान राम के जयघोष से गूंज उठा।

रामलीला समिति के प्रबंधक राजीव गुप्ता ने बताया कि रावण प्रकांड पंडित और बलशाली था। चंद्र सूर्य की नक्षत्रीय दिशाए पंचक मुहूर्त मे आने पर आज यहां दशहरा समारोह हुआ जिसमे रावण का बध हुआ है। इससे पहले कुम्भकर्ण, मेघनाद , अतिकाय और दुर्मुख को युद्ध मैदान में गंवा चुके लंकेश युद्धक्षेत्र में डटा रहा था।

मंगलवार को लक्ष्मण के हाथों अतिकाय और ब्रह्मशक्ति का ज्ञान रखने वाले रावण के बेटे मेघनाद के वध का प्रदर्शन हुआ था। नगर की सड़कों से लेकर रामलीला मैदान तक 9 घण्टे भीषण संग्राम का प्रदर्शन चला था । देर रात मेघनाद और अतिकाय मारे गए थे । सुलोचना सती के विलाप का प्रदर्शन भी हुआ था। आज अपनी बची खुची सेना के अलावा नारायन्तक और अहिरावण के साथ रामदल पर हमला करने नगर की सड़कों पर निकला । रावण सीधा नगर की केला देवी के मंदिर पर पूजा अर्चना करने पहुंचा । वहां से आगे बढ़ता जैन बाजार पहुंचा, तो कैंडा क्लब के द्वारा उसकी पूजा अर्चना और आरती की गई । रावण की जय जयकार के बीच आरती किये जाने बाद उसको माल्यार्पण भी किया गया। रावण दल ने नरसिंह मन्दिर पर राम दल पर हमला बोला। इसके बाद सड़कों पर तीर तलवार , ढाल, बरछी भाला आदि प्राचीन अस्त्रों से दोनों दलों ने रामलीला मैदान तक डेढ़ किलोमीटर रास्ते पर युद्ध प्रदर्शन किया, लोग रोमांचित हो उठे।

प्रसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव भी दशहरा मनाने रामलीला मैदान पंहुंचे। उनका अभिनन्दन रामलीला समिति के अध्यक्ष अजय लम्बरदार और प्रबंधक राजीव गुप्ता बबलू आदि ने किया ।

राम की जय जयकार करते लोगों ने करीब 45 फुट ऊंचे रावण के पुतले पर हमला बोल दिया और पुतले की खपचचे कपड़ा आदि अपने संग बीन ले गए। यहां की रामलीला में रावण को फूंका नही जाता। राम विजय के बाद सीता मिलन और फिर राम दल ने देर रात्रि रामेश्वरम मन्दिर में भगवान शंकर की पूजा अर्चना की। विभीषण को लंका का राजपाट भी भगवान राम ने सौंपा ।

जानकार बताते हैं कि रामलीला की शुरुआत यहां 1855 में हुई थी लेकिन 1857 के ग़दर ने इसको रोका, फिर 1859 से यह लगातार जारी है। यहां रावण, मेघनाथ, कुम्भकरण ताम्बे, पीतल और लोह धातु से निर्मित मुखौटे पहनकर मैदान में लीलाएं करते हैं। शिवजी के त्रिपुंड का टीका भी इनके चेहरे पर लगा होता है। जसवंतनगर के रामलीला मैदान में रावण का लगभग 15 फीट ऊंचा रावण का पुतला नवरात्र की सप्तमी को लग जाता है। दशहरे वाले दिन रावण की पूरे शहर में आरती उतारकर पूजा की जाती है और जलाने की बजाय उसके पुतले को मार-मारकर उसके टुकड़े कर दिए जाते हैं और फिर वहां मौजूद लोग रावण के उन टुकड़ों को उठाकर घर ले जाते हैं। जसवंतनगर में रावण की तेरहवीं भी की जाती है।

एक और खास बात यहां देखने को मिलती है जब लोग पुतले की बांस की खप्पची, कपड़े और उसके अंदर के अन्य सामान नोंच-नोंचकर घर ले जाते हैं। उन लोगों का मानना है कि घर में इन लकड़ियों और सामान को रखने से भूत-प्रेत का प्रकोप नहीं होता।

सं प्रदीप

वार्ता

 

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