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राजस्थान की सड़के बनीं नंदी शाला - भरत सिंह

राजस्थान की सड़के बनीं नंदी शाला - भरत सिंह

कोटा, 16 सितंबर (वार्ता) राजस्थान में बीकानेर के पास सड़क पर घूमते एक आवारा जानवर को बचाने की कोशिश में वाहन पलटने से भारतीय सेना के एक कर्नल और मेजर की असामयिक मौत के बाद समूचे राजस्थान में सड़कों पर आवारा मवेशियों के बेपरवाह घूमने और उनके कारण सड़क दुर्घटनाओं में निर्दोष लोगों की मौत का मामला एक बार फिर तूल पकड़ रहा है।

इन आवारा मवेशियों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं के मसले पर सदैव मुखर रहने वाले पूर्व कैबिनेट मंत्री और वर्तमान में कोटा जिले की सांगोद विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक भरत सिंह ने एक बार फिर से इस मसले को पुरजोर तरीके से उठाते हुए आवारा मवेशियों पर अंकुश के मामले में प्रशासन और नगर निगम- पालिकाओं की व्यवस्थाओं पर सवालिया निशान खड़ा किया है। उन्होंने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया है कि देश की सीमाओं की रात- दिन निर्बाध रूप से रक्षा करने वाले एक कर्नल और मेजर जैसे योग्य एवं युवा सेना अधिकारियों को किसी आवारा जानवर की वजह से अपनी जान गवानी पड़ी। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण घटना है।

श्री भरत सिंह ने कहा कि पशुपालक दुधारू पालतू मवेशियों सहित अन्य अनुपयोगी मवेशियों जैसे बैल, सांडों को आवारा छोड़ देते हैं। इसकी वजह से आमजन को न केवल परेशानी होती है बल्कि सड़कों पर हादसे भी बढ़ते हैं। इसको ध्यान में रखते हुए आवारा मवेशियों को संरक्षण देकर हादसों को रोकने के लिए राज्य सरकार ने प्रत्येक पंचायत स्तर पर एक-एक नंदी शाला खोलने की घोषणा की थी। इस घोषणा के बावजूद अब तक नंदी शाला तो नहीं खुली, अलबत्ता पूरे राज्य की सड़कें जरूर नंदी शालाए बन गई हैं।

उन्होंने कहा कि ये आवारा मवेशी या तो सड़कों पर घूमते रहते हैं या फिर सड़कों की घेराबंदी करके इस तरह बैठ जाते हैं कि उनकी वजह से आम तौर पर न केवल आवागमन में परेशानी होती बल्कि ये आवारा मवेशी सड़क दुर्घटनाओं की वजह भी बनते हैं, जिसमें कई बार लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। कई लोग तो इन आवारा मवेशियों से उनके वाहन की भिड़ंत के बाद स्थाई अथवा अस्थाई विकलांगता के शिकार हो जाते हैं।

श्री सिंह ने कहा कि राज्य सरकार के नंदी शाला खोलने में विफल रहने पर उस संचित राशि के उपयोग पर भी सवालिया निशान खड़ा होता है जो गौवंश के नाम पर प्राप्त होती है। राज्य सरकार को गौवंश के लिए प्रतिदिन करीब एक करोड़ रुपए की राशि मिलती है और इस मद में राज्य सरकार के संचित कोष में करीब एक हजार करोड़ रुपए की राशि जमा हो चुकी है, लेकिन इतनी बड़ी राशि का अब तक प्रत्येक पंचायत स्तर पर नंदी शाला खोलने में उपयोग नहीं किया गया है।

आमतौर पर होता यह है कि शहरी क्षेत्र के मवेशी पालक सुबह-शाम अपने दुधारू मवेशियों का दूध निकालने के बाद उन्हें अपने घरों या बाड़ों से भगा देते हैं जो दिन -भर रात में शहर की सड़कों पर डेरा डाल देते हैं जो अक्सर सड़क दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों के लोग भी दुधारू मवेशी दूध देना बंद कर देने के बाद उनके लिए अनुपयोगी हो जाते हैं, साथ ही बैल- सांड जैसे महत्वहीन मवेशियों की भीड़ उनके बाड़ों में जमा होने लगती है तो रात के अंधेरे में ये ग्रामीण दुग्धपालक समूह में इन अनुपयोगी मवेशियों को शहरी सीमाओं में धकेल देते हैं जो शहर के लोगों के लिए एक बड़ी मुसीबत बन जाते हैं।

हर शहर की नगरी निकाय संस्थानों में आवारा मवेशियों को पकड़ने और उन्हें कांजी हाउस, गौशालाओं में रखने के लिए कर्मचारियों का बड़ा अमला तैनात है, लेकिन कभी -कभार इक्का-दुक्का काररवाई करने के अलावा ये कर्मचारी आवारा मवेशियों की धरपकड़ में लापरवाही बरतते हैं जिससे ये मवेशी शहरी सीमा में प्रवेश कर जाते हैं, नतीजतन सड़क दुर्घटनायें होती हैं।

श्री भरत सिंह ने इस संदर्भ में राजस्थान के मुख्यमंत्री को पत्र भेजा है जिसमें उन्होंने दो सैन्य अधिकारियों की आकस्मिक मौत का जिक्र करते हुए न केवल आवारा मवेशियों की रोकथाम पर जोर दिया है बल्कि मुख्यमंत्री से अनुरोध किया है कि आवारा मवेशी की वजह से किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उसके परिवार को राज्य सरकार आर्थिक सहायता के रूप में उसी अनुपात में भुगतान करें जिस अनुपात में वन्य जीव के कारण होने वाली मौत पर किया जाता है।

हाड़ा सुनील

वार्ता

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