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विशिष्ट अदायगी से दर्शकों को दीवाना बनाया साधना ने

विशिष्ट अदायगी से दर्शकों को दीवाना बनाया साधना ने

“ जन्मदिवस 02 सितंबर के अवसर पर ”

मुंबई 01 सितंबर (वार्ता) बॉलीवुड में साधना को एक ऐसी अभिनेत्री के तौर पर शुमार किया जाता है जिन्होने साथ और सत्तर के दशकमें अपनी विशिष्ट अदायगी से सिनेप्रेमियों को अपना दीवाना बनाया ।

अपने बालों की स्टाइल की वजह से भी साधना प्रसिद्ध थी। उनके बालों की कट स्टाइल साधना कट के नाम से जानी जाती है।

साधना का जन्म दो सितंबर 1941 को करांची पाकिस्तान तब सिंध ब्रिटिश इंडिया में हुआ था। माता-पिता की एकमात्र संतान होने के कारण साधना का बचपन बड़े प्यार के साथ व्यतीत हुआ था। 1947 में भारत के बंटवारे के बाद उनका परिवार कराची छोड़कर मुंबई आ गया था। इस समय साधना की आयु मात्र छ: साल थी। साधना का नाम उनके पिता ने अपने समय की पसंदीदा अभिनेत्री साधना बोस के नाम पर रखा था।

साधना जब स्कूल की छात्रा थीं और नृत्य सीखने के लिए एक डांस स्कूल में जाती थीं, तभी एक दिन एक नृत्य-निर्देशक उस डांस स्कूल में आए। उन्होंने बताया कि राजकपूर को अपनी फ़िल्म के एक ग्रुप-डांस के लिए कुछ ऐसी छात्राओं की ज़रूरत है, जो फ़िल्म के ग्रुप डांस में काम कर सकें। साधना की डांस टीचर ने कुछ लड़कियों से नृत्य करवाया और जिन लड़कियों को चुना गया, उनमें से साधना भी एक थीं। इससे साधना बहुत खुश थीं, क्योंकि उन्हें फ़िल्म में काम करने का मौका मिल रहा था। राजकपूर की वह फ़िल्म थी- श्री 420। डांस सीन की शूटिंग से पहले रिहर्सल हुई। वह गाना था- रमैया वस्ता वइया..। साधना शूटिंग में रोज़ शामिल होती थीं। नृत्य-निर्देशक जब जैसा कहते साधना वैसा ही करतीं। शूटिंग कई दिनों तक चली। लंच-चाय तो मिलते ही थे, साथ ही चलते समय नगद मेहनताना भी मिलता था।

वर्ष 1955 में राज कपूर की फ़िल्म श्री 420 के गीत ईचक दाना बीचक दाना में साधना को कोरस लड़की की भूमिका मिली थी। वर्ष 1958 में साधना को सिंधी फ़िल्म अबाणा में काम करने का मौक़ा मिला जिसमें उन्होंने अभिनेत्री

शीला रमानी की छोटी बहन की भूमिका निभाई थी और इस फ़िल्म के लिए इन्हें एक रुपए की टोकन राशि का भुगतान किया गया था। इसके बाद साधना ने वर्ष 1958 में प्रदर्शित सिंधी फिल्म अबाना में काम किया। बॉलीवुड में साधना ने अपने करियर की शुरूआत वर्ष 1960 में प्रदर्शित फिल्म लव इन शिमला से की। इस फ़िल्म के निर्देशक थे आर.के.

नैयर, और उन्होंने ही साधना को नया लुक दिया साधना कट। दरअसल साधना का माथा बहुत चौड़ा था उसे कवर किया गया बालों से, उस स्टाइल का नाम ही पड़ गया साधना कट । फिल्म के सेट पर उन्हें फिल्म के निर्देशक आर.के.नैय्यर से

प्रेम हो गया और बाद में उन्होंने उनसे शादी कर ली।

        वर्ष 1961 में प्रदर्शित फिल्म हमदोनो साधना के करियर की एक और सुपरहिट फिल्म साबित हुयी । इस फिल्म में उन्हें देवानंद के साथ काम करने का अवसर मिला। फिल्म में देवानंद ने दोहरी भूमिका निभायी थी। साधना और देवानंद की जोड़ी दर्शकों को बेहद पसंद आयी। इसके बाद साधना ने राज खोसला के निर्देशन में बनी फिल्म एक मुसाफिर एक हसीना में काम करने का अवसर मिला । फिल्म की कहानी एक ऐसे फौजी अफसर की जिंदगी पर आधारित थी जिसकी

याददाश्त चली जाती है । फिल्म के निर्माण के समय फिल्म के निर्माता एस.मुखर्जी ने राज खोसला को यह राय दी कि फिल्म की कहानी फ्लैशबैक से शुरू की जाये ।

एस. मुखर्जी की इस बात से राज खोसला सहमत नही थे । बाद में वर्ष 1962 में जब फिल्म प्रदर्शित हुयी तो आरंभ में उसे दर्शको का अपेक्षित प्यार नही मिला और राज खोसला के कहने पर एस.मुखर्जी ने फिल्म का संपादन कराया और जब फिल्म को दुबारा प्रदर्शित किया तो फिल्म पर बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुयी । वर्ष 1963 में साधना की एक और सुपरहिट फिल्म मेरे महबूब प्रदर्शित हुयी। वर्ष 1964 में साधना को एक बार फिर से राज खोसला के निर्देशन में बनी फिल्म .वह कौन थी .. में काम करने का अवसर मिला। फिल्म के निर्माण के समय मनोज कुमार और अभिनेत्री के रूप में निम्मी का चयन किया गया था लेकिन राज खोसला ने निम्मी की जगह साधना का चयन किया। रहस्य और रोमांच से भरपूर इस फिल्म में साधना की रहस्यमयी मुस्कान के दर्शक दीवाने हो गये। इस फ़िल्म के लिए साधना को मोना लिसा की तरह मुस्कान के साथ शो डाट कहा गया था। इस फिल्म के लिये साधना सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फिल्म फेयर पुरस्कार के लिये नामांकित की गयी।

वर्ष 1965 में प्रदर्शित फिल्म वक्त साधना के करियर की एक और सुपरहिट फिल्म साबित हुयी। इस फिल्म के लिये भी उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फिल्म फेयर पुरस्कार के लिये नामांमित किया गया। वर्ष 1967 में राज खोसला ने एक बार फिर से साधना को लेकर फिल्म ..अनिता .. का निर्माण किया लेकिन यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह नकार दी गयी। इस बीच साधना बीमार रहने लगी । बीमारी को छिपाने के लिए उन्होंने अपने गले में पट्टी बंधी अक्सर गले में दुपट्टा बांध लेती थी, यही साधना आइकन बन गया था और उस दौर की लड़कियों ने इसे भी फैशन के रूप में लिया था। इन सबके बीच साधना ने राजकुमार.आरजू.मेरा साया.इंतकाम . एक फूल दो माली जैसी कुछ सफल फिल्मों में काम किया। हिंदी सिनेमा में योगदान के लिए, अंतर्राष्ट्रीय भारतीय फ़िल्म अकादमी (आईफा) द्वारा साधना को 2002 में

लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है। अपनी विशिष्ट अदायगी से दर्शकों के दिलों पर खास पहचान बनाने वाली साधना 25 दिसंबर 2015 को दुनिया को अलविदा कहा गयी।

वार्ता

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