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रक्षा बंधन का त्यौहार मुंहबोली बहिनों ने शुरू किया

रक्षा बंधन का त्यौहार मुंहबोली बहिनों ने शुरू किया

प्रयागराज ,14 अगस्त (वार्ता) “बहना ने भाई की कलाई से प्यार बाँधा है, प्यार के दो तार से संसार बाँधा है” भले ही ये गाना बहुत पुराना न हो पर भाई की कलाई पर राखी बाँधने का सिलसिला प्राचीन है जिसे मुंह बोली बहिनों ने शुरू किया।

         रक्षाबंधन की परंपरा ही उन बहिनों ने डाली थी जो मुंह बोली थीं। भले ही उन बहिनों ने अपने सुरक्षा के लिए ही इस पर्व की शुरुआत क्यों न की हो लेकिन उसी बदौलत आज भी इस त्योहार की मान्यता बरकरार है। इतिहास इसका गवाह है कि मुंह बोली बहिनों ने रक्षा बंधन की शुरूआत की।

       जीवन की रक्षा का प्रतिबद्धता, आत्मीयता और स्नेह से रिश्तों को मजबूती प्रदान करने वाला रक्षाबंधन पर्व भारतीय समाज में इतनी व्यापकता और गहराई से समाया हुआ है कि इससे सामाजिक महत्त्व, धर्म, पुराण, इतिहास, साहित्य और फिल्में भी इससे अछूते नहीं हैं। यह आत्मीयता और स्नेह के बन्धन से रिश्तों को मज़बूती प्रदान करने का पर्व है।

       वैदिक शोध संस्थान एवं कर्मकाण्ड प्रशिक्षण केन्द्र के पूर्व आचार्य डा आत्माराम गौतम ने बताया कि श्रावण मास के पूर्णिमा दिवस पर मनाया जाने वाला यह पर्व रक्षा की प्रतिबद्धता, आत्मीयता और प्रेम का प्रतीक है। रक्षा का मतलब सुरक्षा और बंधन का मतलब बाध्य है। रक्षा के लिए बांधा गया सूत्र ही रक्षासूत्र या रक्षा बंधन है। इसकी सार्थकता एक

कच्चे धागे की होती है जबकि आज रेशम और अनेक मंहगे रक्षा बंधन प्रचलन में हैं।

       यह रक्षा सूत्र कोई भी किसी को बांध सकता है। पुरोहित अपने यजमान को , पत्नी-पति को, माता-पिता बेटे और बेटी को, बहिन भाई को, गुरू-शिष्य को और बहिन-बहिन को। यह बंधन रक्षा बांधने वाले और बंधवाने वाले दोनों को एक दूसरे की रक्षा के लिए प्रेरित करता है।

 आचार्य गौतम ने बताया कि रक्षा बंधन पर्व की शरूआत कब से हुई इसके बारे में कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है लेकिन यह सदियों पुराना त्यौहार है। भारतीय समाज में यह पर्व बहुत व्यापकता और गहराई से समाया है। इसका सामाजिक महत्ता के साथ ही पौराणिक कथाओं, महाभारत इसके अतिरिक्त ऐतिहासिक एवं साहित्यिक महत्ता को दर्शाते हैं। उन्होने बताया कि सबसे पहले एक पत्नी ने अपने पति की कलाई पर रक्षा का धागा बांधकर उसकी रक्षा की थी।

     आचार्य ने बताया कि भविष्य पुराण में यह स्पष्ट है कि रक्षा का सूत्र बांधने की प्रथा महाराजा इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने की थी। जब देव और दानवों के बीच यद्ध चल रहा था तब इंद्राणी ने देवगरू वृहस्पति द्वारा मंत्रो की शक्ति से अभिमंत्रित कर दिया गया रक्षा सूत्र, चावल और सरसों के दानों को पति इंद्र के दाहिने हाथ में बांधकर उनकी रक्षा और विजय की

कामना की थी जिससे उन्होने असुरों पर विजय प्राप्त किया था। यह संयोग था कि वह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था और उसी दिन से यह रक्षा का धागा बांधने की प्रथा चली आ रही है।

     उन्होंने बताया कि स्कन्द पुराण, पद्मपराण और श्रीमद्भभागवत में वामनावतार नामक कथा में रक्षा बंधन का प्रसंग मिलता है। भगवान विष्णु द्वारा राजा बलि के अभिमान को चकनाचूर कर देने के करण यह त्योहार “बले” नाम से भी जाना जाता है। लगभग छह हजार साल पहले सिंध घाटी सभ्यता से पहले रक्षा बंधन के प्रमाण मिलते हैं। इसके बाद अलग अलग सभ्यता और संस्कृतियों ने रक्षा बंधन को अपनी सुविधा और सहूलियत से अपनाया। बाद में सभ्यता और

समाज के विकास के साथ साथ भाई-बहिन का त्यौहार मनता चला गया।

इतिहास इसका गवाह है, मुग़ल सम्राट हुमायूं और राजपूत रानी कर्णावती की कहानी शुद्ध भाई-बहिन के प्यार का प्रतीक है। राखी सिर्फ धागा नहीं है बल्कि भाई और बहिन के बीच भावनात्मक जुड़ाव है। मध्यकालीन युग में राजपूत एवं मुस्लिमों के बीच संघर्ष चल रहा था। रानी कर्णावती चित्तौड़ के राजा की विधवा थीं। उस दौरान गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से अपनी और अपनी प्रजा की सुरक्षा का कोई रास्ता न/न निकलता देख रानी ने हुमायूँ को राखी भेजी थी।

     हुमायूं इस हिंदू परंपरा को अच्छे से जानता था इसलिए उसके दिल की गहराइयों में रानी कर्णावती का प्यार उतर गया और उसने तुरंत अपने सैनिकों को युद्ध बंद करने का आदेश दिया। हूमायूं ने रानी कर्णावती को अपनी बहिन का दर्जा दिया और उम्रभर रक्षा का वचन दिया और पालन किया।

     दूसरा उदाहरण एलेग्जेंडर और पुरु का माना जाता है। हमेशा विजयी रहने वाला एलेग्जेंडर भारतीय राजा पुरु के आगे टिक न सका। एलेग्जेंडर की पत्नी ने रक्षा बंधन के बारे में सना था। उसने राजा पुरु को राखी भेजी तब  उन्होने युद्ध समाप्ति की घोषणा कर दी। इसके बाद राजा पुरु ने एलेग्जेंडर की पत्नी को बहिन का दर्जा दिया और उसकी राखी की लाज रखी। इस ऐतिहासिक घटना में भाई-बहिन के प्यार को मजबूती प्रदान की ।

       रक्षा बंधन से जुडा एक और दिलचस्प पौराणिक प्रमाण महाभारत में भागवान श्रीकृष्ण का है। श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की जब हत्या की तो उनकी एक उंगली से खून बहने लगा। उस समय द्रोपदी ने अपनी साडी का एक कोना फाडकर

उनकी कलायी से लेकर उंगली में बांध दिया। जिससे खून बहना बन्द हो गया था। तब श्रीकृष्ण ने द्रोपदी की रक्षा का वचन दिया। कौरवों की भरी सभा में दुशासन द्वारा द्रोपदी का चीर हरण होने से लाज बचाकर अपने वचन का मान रखा

और उन्हें बहिन का दर्जा और सम्मान दिया। इनमें सभी मुंह बोली बहिन थी।

     शहर के वरिष्ठ रंगमंच कर्मी और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लेखाविभाग में कार्यरत सुधीर सिन्हा ने बताया कि भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में जन जागरण के लिये भी इस पर्व का सहारा लिया गया। श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बंग-भंग का विरोध करते समय रक्षाबन्धन त्यौहार को बंगाल निवासियों के पारस्परिक भाईचारे तथा एकता का प्रतीक बनाकर इस

त्यौहार का राजनीतिक उपयोग आरम्भ किया।

     उन्होने कहा पचास और अस्सी के दशक तक रक्षा बंधन हिंदी फिल्मों का लोकप्रिय विषय रहा। ‘रक्षाबंधन’ से जडी कई फिल्में बनाई गयीं। राखी, रक्षाबंधन, राखी और हथकडी और राखी और रायफल फिल्मों को निर्माण किया गया।

इनके गीत “ बहना ने भाई की कलाई से प्यार बांधा है, प्यार के दो तार से संसार बांधा है। “भइया मेरे राखी बंधन को निभाना, भैया मेरे छोटी बहिन को न भुलाना” आज भी भाई और बहिन के प्यार को संजीदा बनाते हैं।

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