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पंजाब, हरियाणा, हिमाचल में पिछली स्थिति बनाये रखने की चुनौती

पंजाब, हरियाणा, हिमाचल में पिछली स्थिति बनाये रखने की चुनौती

चंडीगढ़, 14 मार्च (वार्ता) भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी सहयोगी शिरोमणि अकाली दल के साथ मिलकर पिछले चुनाव में हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और केंद्र शासित चंडीगढ़ की 28 सीटों में से 14 सीटें जीती थीं लेकिन पांच वर्ष में बदले राजनीतिक परिदृश्य इन सीटों को बचाये रखना उसके लिये बड़ी चुनौती होगी।

मोदी लहर में भाजपा ने को हरियाणा की सात, हिमाचल प्रदेश की चार, पंजाब की भाजपा-शिअद को मिलाकर छह है और चंडीगढ़ की एक सीट मिली थी। हरियाणा के कुरुक्षेत्र के सांसद राजकुमार सैनी अपनी पार्टी बना चुके हैं। अकाली दल के दो सांसद पार्टी छोड़ चुके हैं और गुरदासपुर सीट उपचुनाव में भाजपा गंवा चुकी है।

पंजाब में 2017 में विधानसभा चुनाव जीत कर कांग्रेस ने अकाली दल-भाजपा गठबंधन की 10 साल पुरानी सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया। भाजपा सांसद और फिल्म स्टार विनोद खन्ना के निधन के बाद हुए गुरदासपुर उपचुनाव में कांग्रेस ने भाजपा से यह सीट छीन ली तथा पार्टी प्रदेशाध्यक्ष सुनील जाखड़ चुनाव जीते। झटके भाजपा के सहयोगी अकाली दल को भी लगे और उसके दो सांसदों रंजीत सिंह ब्रहमपुरा (खडूर साहिब) तथा शेर सिंह घुबाया (फिरोजपुर) ने पार्टी का दामन छोड़ दिया है। खडूर साहिब से अकाली दल बीबी जागीर कौर को प्रत्याशी घोषित कर चुका है और श्री घुबाया कांग्रेस में जा चुके हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता व राज्यसभा सदस्य सुखदेव सिंह ढींढसा भी पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे चुके हैं। कुछ अन्य वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की कार्यशैली के कारण पार्टी छोड़ी है और अकाली दल (टकसाली) बनाया है जिसमें पूर्व सांसद रतन सिंह अजनाला, सेवा सिंह सेखों शामिल हैं।

पंजाब में पिछले कुछ सालों में तीसरी ताकत बनकर उभरी आम आदमी पार्टी (आप) की भी हालत खराब है। इसके पटियाला से सांसद धर्मवीर गांधी पार्टी छोड़ चुके हैं। फतेहगढ़ साहिब से सांसद हरिंदर खालसा को भी पार्टी निलंबित कर चुकी है। बागी विधायक और विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे सुखपाल सिंह खेहरा का गुट भी पार्टी से बाहर हो चुका है। श्री खेहरा ने अपनी पार्टी पंजाब एकता पार्टी बनाई है तथा कुछ और स्थानीय दलों के साथ मिलकर पंजाब डेमोक्रेटिक अलायंस बना लिया है। पीडीए ने ही सबसे पहले प्रत्याशियों की घोषणा भी की है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार आप के लिए भी अपना पिछला प्रदर्शन दोहराना मुश्किल होगा। पंजाब में यह परिपाटी भी रही है कि जो पार्टी प्रदेश की सत्ता में हाेती है लोकसभा चुनावों में उसे फायदा मिलता है, इसलिये कांग्रेस आश्वस्त लग रही है और उसने आप से गठबंधन की संभावनाओं को बार-बार नकारा है।

विश्लेषकों के अनुसार हरियाणा में स्थिति थोड़ी भाजपा के पक्ष में दिख रही है क्योंकि यहां विपक्ष बिखरा हुआ है। विरोधी पार्टियां न सिर्फ-दूसरे से लड़ रही हैं बल्कि ‘गुटबाजी‘ की भी शिकार हैं। जींद विधानसभा सीट पर हाल में हुए उपचुनाव के नतीजों ने दिखा दिया है कि विपक्ष की खिचड़ी का स्वाद बिगड़ने का कारण ‘कई रसोइयों‘ का होना है। कांग्रेस जो मनोहर लाल खट्टर सरकार बनने से पहले प्रदेश में दस साल शासन कर चुकी है, गुटबाजी की शिकार है। इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) में फूट पड़ चुकी है और हिसार से सांसद दुष्यंत चौटाला नई पार्टी जननायक जनता पार्टी बना चुके हैं। आम आदमी पार्टी (आप) यहां कांग्रेस से गठबंधन के लिए इच्छुक है पर अभी तक तस्वीर स्पष्ट नहीं है। भाजपा सांसद राजकुमार सैनी अपनी अलग पार्टी लोकतांत्रिक सुरक्षा पार्टी बना चुके हैं और बहुजन समाज पार्टी से गठजोड़ कर चुके हैं। बसपा कुछ समय पहले तक इनेलो के साथ थी लेकिन चौटाला परिवार और पार्टी में फूट के बाद उसने इनेलो का दामन छोड़कर लोसुपा का दामन थाम लिया। गुटबाजी भाजपा में भी है जो उसे अपनी सीटें बढ़ाने से तो कम से कम रोक ही सकती है। केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह से लेकर प्रदेश के मंत्रियों के एक गुट और मुख्यमंत्री के गुट के बीच भी अनबन की खबरें उड़ती रही हैं।

हिमाचल प्रदेश में भाजपा पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता में वापसी कर चुकी है और यहां पार्टी की स्थानीय इकाई ने वर्तमान चारों सांसदों काे ही लोकसभा प्रत्याशी बनाने की सिफारिश की है। यहां पिछले करीब सवा साल में भाजपा सरकार के प्रदर्शन का असर लोकसभा चुनावों पर पड़ सकता है और भाजपा को अपना पिछला प्रदर्शन दोहराना आसान नहीं है।

चंडीगढ़ में भाजपा ने पिछले चुनाव में यह सीट कांग्रेस से छीनी थी और किरण खेर सांसद बनी थीं। यहां से भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रह चुके हरमोहन धवन पार्टी छोड़कर आप के प्रत्याशी घोषित किये जा चुके हैं। कांग्रेस का अभी तय नहीं है कि यहां से वह पूर्व सांसद पवन बंसल पर ही दांव लगायेगी या कोई और प्रत्याशी लायेगी। पिछली बार हालांकि गुल पनाग (आप) ने कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया था।

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