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नज़ीर बनारसी की नजरों से दुनिया जानेगी वाराणसी की ताकत: डॉ0 अहमद

नज़ीर बनारसी की नजरों से दुनिया जानेगी वाराणसी की ताकत: डॉ0 अहमद

वाराणसी, 30 नवंबर (वार्ता) प्रसिद्ध शायर मरहूम नज़ीर बनारसी की नजरों से देश की सांस्कृतिक राजधानी के तौर पर विश्वविख्यात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी को देश-दुनिया को रूबरू कराने का प्रभावशाली अभियान राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद् (एनसीपीयूएल) ने शुरू किया है।


   “ नफ़रत की आग बढ़ने न पाये बुझा के चल, उठ और प्रेम-प्यार की गंगा बहा के चल और हिंदुओं को तो यकीं है कि मुसलमां है ‘नज़ीर’, कुछ मुसलमां हैं जिन्हें शक है कि हिंदू तो नहीं ” जैसे छंदों से दुनिया का दिल जीतने वाले शायर का जन्म 25 नवंबर 1909 को और इंतकाल 23 मार्च 1996 को वाराणसी में हुआ था।

    निदेशक डॉ0 शेख अक़ील अहमद ने शुक्रवार को ‘यूनीवार्ता’ को बताया कि पतित पाविनी गंगा, दीवाली, ईंद एवं मुहर्रम से लेकर राष्ट्र भक्ति के अनगिनत प्रतीकों को अपनी रचनाओं के जरिये आसान शब्दों में उकेरने वाले फकीर शायर मरहूम बनारसी की पारखी नज़रों से देश-दुनिया को रूबरू कराने का अभियान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र से शुरु किया गया है।

      एनसीपीयूएल ने इसकी शुरुआत काशी के हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में ‘नज़ीर बनारसी का जीवन एवं कार्य’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार एवं मुशायरा (28-29 नवंबर) का आयोजन के साथ की है, जिसमें उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के शायर एवं विद्वान एवं बड़ी संख्या में स्कूल, कॉलेज एवं विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं शामिल हुईं।

      डॉ0 अहमद ने कहा कि इस मशहूर शायर ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, रविन्द्र नाथ टैगोर, पंडित मदन मोहन मालवीय, गोस्वामी तुलसी दास, मुंशी प्रेम चंद, सूर्य कांत त्रिपाठी ‘निराला’ ही नहीं, मुसलमानों के त्यौहार ईंद एवं मुहर्रम से लेकर हिंदुओं की भक्ति के प्रमुख प्रतीकों - दीपावली भगवान शिव और कृष्ण की रूबाईयां आसान शब्दों के जरिये अपनी रचनाओं के साथ-साथ रोजाना के व्यवहार से अपने जीवन उतारे में कामयाबी हासिल की। वह जीवन भर सांप्रदायिकता के खिलाफ लेखनी एवं जन आंदोलनों के जरिये लड़ते रहे। परिषद् उनके देशप्रेम, भाईचारा, मोहब्बत के एहसासों को देश-विदेश में पहुंचाकर यहां की वास्तिविक तस्वीर पेश करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी।

प्रख्यात हिंदी लेखक एवं चिंतक प्रो0 काशी नाथ सिंह ने अपने संबोधन में मरहूम बनारसी को गजलों का ‘शेर’ बताते हुए कहा कि उनकी शायरी में गंगा, सूफी, दीवाली, दशहरा, ईद, मुहर्रम से लेकर महात्मा गांधी और मुंशी प्रेमचंद, काली दास सब कुछ हैं।

      श्री सिंह ने कहा, “नज़ीर इस शहर (वाराणसी) यानी ‘गंगा जमुनी’ तहजीब की आत्मा थे। वह लेखनी के अलावा देश के किसी भी हिस्से में सांप्रदायिक दंगे की खबर मिलते ही एहतियातन वाराणसी की सड़कों पर निकलने वालों में शामिल होते थे।”

     शहर-ए-मुफ्ती जनाब बातिन नोमानी ने समापन सत्र को संबोधित करते हुए उन्हें महान देशभक्त बताते हुए कहा, “नज़ीर साहब काशी के गरीबों की जबान के थे। वह सांप्रदायिकता और अंग्रेजों के खिलाफ चल रही लड़ाइयों के अहम प्रतिक थे। कई बार तो वह अपनी जान की चिंता किये अंग्रेजों के कार्यक्रमा में ही उसके खिलाफ तकरीर कर देते थे।”

    डॉ0 अहमद ने बताया कि नज़र ने अपनी लेखनी और जीवन शैली से इंसानियत की एक नजीर पेश की। उनकी रचनाओं और सेमिनार में उन पर आये शोध पत्रों को आम लोगों की समझ आने वाले अंदाज में पेश किया जाएगा, ताकि लोगों इंसानियत को अपना सबसे बड़ा धर्म एवं देशभक्ति मानने वाले मशहूर शायर के शब्द लोगों तक पहुंच सके और देश में अमन एवं तरक्की में इजाफा हो।

     नज़ीर बनारसी के शब्दों में - “ ---हमने तो नमाज़े भी पढ़ी है अक्सर, गंगा तेरे पानी से वजू कर के” और “--अंधेरा मांगने आया था रोशनी की भीक। हम अपना घर न जलाते तो और क्या करते।--”

“---इक रात में सौ बार जला और बुझा हूं, मुफ़लिस का दिया हूं मगर आंधी से लड़ा हूं---”

“---शंकर की जटाओं की तरह साया फिग़न है हर साया-ए-दीवार बनारस की गली में और हर संत के, साधु के, ऋषि और मुनि के, सपने हुए साकार बनारस की गली में तथा मिलता है निगाहों को सुकूं हृदय को आराम, क्या प्रेम है क्या प्यार बनारस की गली---”

 डॉ0 अहमद ने सेमिनार के समापन के अवसर पर कहा कि ‘गंगा-जमुनी’ तहजीब के प्रतीक महान शायर के इन छंदों के जरिये वाराणसी के साथ-साथ उर्दू की वास्तविक ताकत का देश-दुनिया को एहसास कराने के लिए गुलजार एवं शाबाना आज़मी जैसी शीर्ष स्तर की फिल्मी हस्तियां की मदद ली जाएगी। वे जल्द उर्दू के ‘ब्रांड एम्बेसडर’ की भूमिका में नजर आ सकते हैं।

     उन्होंने बताया कि अन्य भाषाओं के साथ-साथ उर्दू के धनी एवं हिन्दी फिल्मी जगत को अपनी कला एवं लेखनी से रौशन करने वाले श्री गुलजर एवं श्रीमती आज़मी से उनकी प्रारंभिक स्तर की बातचीत हो चुकी हुई है। कोशिश कि उन्हें राजी कर अगले दो-तीन महीने में उनकी प्रमुख भूमिकाओं वाली विज्ञपान फिल्मों को अंतिम रुप दे दिया जाए।

     उनका कहना कि भारत की मिट्टी में बसी उर्दू भाषा में प्राचीन साहित्य, धर्म आदि का ऐसा ‘खजाना’ उपलब्ध है और इसके लिए नई पीढ़ी को जोड़ना और बदलते परिवेश में विश्व समुदाय को जोड़ना समय की मांग है। श्री गुलजार एवं श्रीमती आज़मी की पुरानी एवं हाल के वर्षों में फिल्मों में भूमिकाओं से युवा पीढ़ी काफी हद तक अवगत हैं तथा उन्हें उम्मीद है कि दोनों प्रमुख हस्तियों के साथ कुछ अन्य हस्तियां देश-दुनियां में प्रचार-प्रसार के प्रभावशाली अभियान शरीक होगे और उर्दू को आने वाल समय में नयी ऊंचाईयों तक पहुंचाने में कामयाबी मिलेगी।

    डॉ0 अहमद ने बताया कि आने वाले समय में जिला एवं ब्लॉक स्तर पर उर्दू भाषा के लिए जागरूकता अभियान चलाया जाएगा। इसके लिए प्रथम चरण में देशभर में 125 प्रमुख स्थानों पर सेमिनारों का आयोजन किया जाएगा। प्रचार-प्रसार के लिए मोबाईल वैन की संख्या बढ़ायी जाएगी।

     उन्होंने कहा कि राज्यों की उर्दू एकेडमियों की मदद से वहां के स्कूलों में उर्दू को प्राथमिक स्तर से पढ़ाई की व्यवस्था करने के लिए उन्होंने पत्र लिखा है तथा संबंधित मुख्यमंत्रियों से भी इसे लागू करने के लिए आग्रह किया जाएगा। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के जिन स्कूलों में उर्दू की पढाई की व्यवस्था नहीं है, वहां व्यवस्था की जाएगी। अल्पसंख्यक इलाकों के गरीबों के बच्चों के लिए बेहतर तालीम की व्यवस्था के लिए स्थानीय सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों के साथ ठोस प्रयास किये जाएंगे

       उन्होंने कहा कि राज्यों में उर्दू शिक्षकों के खाली पदों को भरने के लिए संबंधित राज्य सरकारों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर आवयश्यक कदम उठाने का अनुरोध किया जाएगा।

      डॉ0 अहमद ने कहा कि वह उन राज्यों में भी उर्दू को पहुंचाना चाहते हैं, जहां उसकी पढ़ाई बिल्कुल भी नहीं होती। इसके लिए वह जल्दी ही गोवा एवं अन्य कई राज्यों का दौरा करेंगे। वह पूर्वोत्तर एवं अन्य राज्यों में भी स्थानीय भाषाओं से तालमेल के जरिये उर्दू की ताकत से लोगों को अवगत कराने का ख्याल रखते हैं।

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