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सुरेंद्र-मोनिका ने कायम की कृषि में मिसाल, अनेक लोगों को दे रहे रोजगार

सुरेंद्र-मोनिका ने कायम की कृषि में मिसाल, अनेक लोगों को दे रहे रोजगार

हिसार, 28 जुलाई(वार्ता) देश में एक ओर जहां कर्ज और खेती में घाटे को लेकर किसानों के आत्महत्या करने की खबरें आती है वहीं दूसरी हरियाणा के हिसार जिले के बालसमंद गांव के दम्पति सुरेंद्र और मोनिका जैसे प्रगतिशील किसान कृषि और बागवानी से न केवल लाखों कमा रहे हैं बल्कि इन्होंने 100 से ज्यादा लोगों को रोजगार भी दिया है।

ये दोनों उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद कभी नौकरी के पीछे नहीं भागे बल्कि अपनी पुश्तैनी जमीन में बागवानी, मछली पालन, गोबर गैस प्लांट और वर्मी कंपोस्ट शुरू कर आज न केवल दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गए हैं। बागवानी में नए प्रयोगों के चलते इन्हें अनेक बार सरकार और स्थानीय प्रशासन सम्मानित कर चुका है। अपनी जागरूकता के चलते ये सरकारी योजनाओं का भी भरपूर लाभ उठाते हैं।

स्नातक तक शिक्षित सुरेंद्र सिंह ने पढ़ाई के बाद कभी नौकरी करने का नहीं बल्कि अपनी पारिवारिक जमीन पर नए प्रयोग करके दूसरों को रोजगार देने का ख्वाब देखा। अंग्रेजी में एमए की शिक्षा प्राप्त उनकी पत्नी मोनिका ने भी इस निर्णय में उनका साथ देकर राह आसान कर दी। सुरेंद्र के पास 45 एकड़ जमीन है जिस पर इन्होंने बागवानी की शुरूआत की। इन्हें बहुत पहले इस बात का आभास हो गया था कि गेहूं-धान की परम्परागत खेती के बजाय असली भविष्य इसी आधुनिक खेती में है।

सुरेंद्र और मोनिका ने 2010 में अपनी कुछ जमीन पर माल्टा के पौधे लगाए। पौधे बड़े होने तक तो आमदनी नहीं हो सकी लेकिन इन पर अच्छी मात्रा में फल लगे और इनकी बिक्री शुरू हुई तो पिछली सारी कमी दूर हो गई। फिर तो इन्होंने धीरे-धीरे अपने 40 एकड़ खेत में किन्नू और मौसमी के पौधे भी लगा दिए। अब ये पांच एकड़ क्षेत्र में अमरूद और आड़ू का बाग लगाने की तैयारी कर रहे हैं। जब बाग में पौधे छोटे होते हैं तो ये उस जमीन पर मूंग, चना और ग्वार जैसी फसलें भी लेकर अपना खर्च निकाल लेते हैं।

सुरेंद्र और मोनिका ने बताया कि बागवानी विभाग के अधिकारियों की सलाह और योजनाओं से प्रेरित होकर उन्होंने परम्परागत खेती की जगह बागवानी शुरू की थी। इसमें उन्हाेंने सब्सिडी पर सरकार की टपका सिंचाई, वाटर टैंक तथा स्प्रिंकलर योजनाओं का का भी लाभ उठाया और इस तरह बागवानी करना बन गया मुनाफे का सौदा। उन्होंने कहा कि पौधों की देखभाल आदि के लिए भी 20 हजार रुपये प्रति एकड़ तक की सहायता सरकार उपलब्ध कराती है। उन्होंने अब सरकारी सहायता से अपने खेत में पक्का वाटर टैंक बनाया है।

उन्होंने बताया कि बागवानी से उन्हें अब सालाना 20 लाख रुपये तक की आमदनी हो रही है और जब सभी पौधे फल देने लगेंगे तो आमदनी और बढ़ेगी। उनका कहना है कि यदि किसान सूझबूझ से काम करें तो बागवानी में कम से कम पानी की खपत कर दो लाख प्रति एकड़ तक की आमदनी कर सकता है।

दम्पति का कहना है कि वह अपने खेत में पैदा होने वाले फल गांव से 25 किलोमीटर दूर हिसार की मंडी में सप्लाई करते है। उनका कहना है कि हिसार में फलों की इतनी मांग है कि उन्हें इनकी बिक्री के लिए कहीं और जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती है। उन्होंने बताया कि यदि किसानों का समूह बनाकर काम किया जाए तो फलों को दिल्ली-एनसीआर के बाजार में बेच कर अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। अब वह किसानों का समूह बनाकर इस दिशा में काम करने की योजना बना रहे हैं।

दोनों अब फलों की बढ़ती पैदावार के मद्देनज़र कोल्ड स्टोर का निर्माण कर रहे हैं इससे फलों को नष्ट होने से बचाया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि वे अपने खेत में वैक्स जूस संयंत्र भी लगाने पर विचार कर रहे हैं जहां वह अपने फलों से ही नहीं बल्कि दूसरे किसानों के फलों से भी जूस बना सकेंगे जिसकी बाजार में भारी मांग है और इसे फलों की बजाय लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता है।

दम्पति ने गांव के लगभग 100 लोग को बागवानी के माध्यम से रोजगार दिया है और भविष्य की योजनाएं अगर कामयाब रहती हैं तो और अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा।

सुरेंद्र को हरियाणा बागवानी विभाग की ओर से जिले के सर्वश्रेष्ठ प्रगतिशील किसान का पुरस्कार मिल चुका है। वह राज्य के अन्य हिस्सों में बागवानी से सम्बंधित गोष्ठियों, कार्यशालाओं और मेलों में भी सक्रिय रुप से भागीदारी करते हैं।

रमेश1722

वार्ता

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