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प्रकृति प्रेमी संतालों का महान पर्व सोहराय परवान पर

प्रकृति प्रेमी संतालों का महान पर्व सोहराय परवान पर

दुमका 12 जनवरी (वार्ता) झारखंड में संतालपगरना की मनोरम वादियों में प्रकृति प्रेमी सतांल समुदाय में प्रगाढ़ रिश्ते का प्रतीक तथा ढोल-मांदर की थाप पर थिरकने का पर्व सोहराय पूरे परवान पर है।

पांच दिनों तक चलने वाले इस महान पर्व से संतालपरगना का पूरा वन प्रांतर मदिरा की चुस्कियों के साथ परम्परागत परिधानों में लिपटी, पुष्प जड़ित वनदेवी कन्याओं के आकर्षक गीत-नृत्य में झूम रहा है। परम्परागत रीति-रिवाज के साथ शुरू संतालों का महान पर्व सोहराय या बंदना 14 जनवरी मकर संक्रांति तक चलेगा। संतालपरगना के अलावा बिहार, ओडिशा, नेपाल और अन्य देशों में रहने वाले लगभग तीन करोड़ संताल समुदाय के लोग अलग-अलग तिथि को यह पर्व मनाते हैं।

दिसोम मांझी थान आर जाहेर थान समिति के तत्वावधान में यहां जाहेर थान में सात जनवरी को पूर्ण विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की गयी और दिसोम मांझी दिगम्बर मरांडी ने दिसोम सोहराय शुरू होने की घोषणा की। इस मौके पर झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसद शिबू सोरेन और पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सहित काफी संख्या में संताल समाज के प्रबुद्ध लोग शामिल हुए। प्रदेश के हर गांव में यह पूर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है।

दुमका जिला मुख्यालय स्थित दिसोम मांझी थान में आयोजित पूजा-अर्चना में शिरकत करने वाले लोगों ने अपने अराध्य देव से राज्य और समाज की सुख-समृद्धि एवं खुशहाली की कामना की। विश्वविद्यालय परिसर के साथ गांव-गांव में आयोजित सोहराय पर्व की धूम मची है।

दिगम्बर मरांडी ने बताया कि संताल समुदाय द्वारा सोहराय एवं अन्य पर्व-त्योहारों के संदर्भ में बने परंपरागत गीतों के आधार पर इस पर्व को हाथी के समान विशाल माना जाता हैं। संताल समुदाय के लोग अपनी परम्परा और संस्कृति को अभी तक अक्षुण्ण बनाये रखने में सफल रहे हैं।

श्री मरांडी ने बताया कि पहाड़ों, जंगलो और नदियों की निर्मल धारा के बीच सीधा-सादा जीवन यापन करने वाले संताल समुदाय का प्रकृति से गहरा रिश्ता रहा हैं। इस कारण इस समुदाय के प्रमुख पर्व त्योहार भी प्रकृति पूजा एवं अराधना पर आधारित हैं। इस समुदाय की महिलाएं पर्व की घोषणा के पूर्व अपने घर-द्वार की साफ-सफाई कर उसे पवित्र कर लेती हैं। पर्व के मौके पर सभी भाई अपनी बहन को पूरे परिवार के साथ मायका आने के लिए आमंत्रित करते हैं और सभी बहनों की इच्छा रहती है कि वह भी अपने भाइयों के आमंत्रण पर अवश्य मायके जायें।

संताली संस्कृति के जानकार बताते हैं कि क्षेत्र के ग्राम प्रधान द्वारा तिथि तय कर अपने गावं में पर्व शुरू होने की घोषणा की जाती है। हालांकि, जंगली इलाकों में जीवन यापन करने वाले प्रकृति प्रेमी संताल समाज के लोग धनकटनी के बाद अपने गांव, समाज और परिवार के साथ मवेशियों, पशु-पक्षियों की सुख-समृद्धि के लिए पारंम्परिक रीति रिवाजों के अनुरूप अपने अराध्य देव की अराधना करते हैं।

इस पर्व में समुदाय के सभी बच्चे, बूढ़े, महिला और पुरुष आपसी मतभेदों को भुलाकर नृत्य-संगीत की दरिया में पांच दिनों तक गोता लगाते हैं। इस त्योहार में समुदाय के लोग नृत्य संगीत के साथ परम्परागत रूप से अपने अराध्य देव को बलि प्रदान करने के साथ मदिरा भी अर्पित करते हैं। इसके बाद वे स्वयं भी मदिरा ग्रहण कर त्योहार का आंनद लेते हैं। संताली भाषा में इस पर्व के प्रथम दिन को ‘उम’, गोड़ पूजा। दूसरे दिन को ‘बोंगा’ माहा। तीसरे दिन को ‘खुंटौव’ माहा। चौथे दिन को ‘जाले’ और पांचवे दिन को ‘सकरात’ या हाकोकाटकम कहा जाता है।

पर्व में पांच दिनों तक क्रमश: ग्राम प्रधान, पराणिक, नायकी, कुड़म नायकी, गोड़ाईत अहम भूमिका निभाते हैं। पर्व में प्रत्येक गांव के देवस्थल जाहेर थान में पूजा अर्चना कर अपने गांव-समाज के साथ पशु-पक्षियों की सुख-समृद्धि, खुशहाली और स्वस्थ्य रहने की कामना की जाती है। लोग अपने सामर्थ्य के मुताबिक मुर्गा, मुर्गी, बकरा बलि के रूप में अपने अराध्य देव को अर्पित करते हैं।

इस पर्व में ‘गाय जगाव’ किया जाता है और इस दिन लोग मुख्य रूप से खान-पान करते हैं। गाय जगाव करने वाले सभी घरों के सामने खूटे से गाय बांध दी जाती है। लोग अपने बैलों की सींग में धान की बाली का गुच्छा, चावल और मिठाई बांध देते हैं तथा ढोल, मांदर तथा तुरहि बजाकर उसे उत्तेजित करते हैं। इसी क्रम में गांव का कोई युवक या अन्य व्यक्ति उत्तेजित बैल की सींग से धान की बाली का गुच्छा एवं मिठाई लेने का प्रयास करता है। इस प्रयास में जो व्यक्ति सफल होता है उसे गांव का इस वर्ष का सबसे भाग्यशाली व्यक्ति माना जाता है और उसे पुरस्कृत किया जाता है।

इस पर्व में लोगों के लिए बेजहा शिकार करने का खेल मुख्य आकर्षण होता है। लोग अपने गांव के आस-पास के तालाबों में मछली मारकर स्वयं लाते हैं और पर्व में आनेवाले अपने हित-कुटुम्बों के साथ मिलकर खाते हैं। मकर संक्रांति के दिन प्रत्येक गांवों में तीरंदाजी प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता हैं। इस प्रतियोगिता में जो युवक निशानेबाजी में सफल होता है उसे गांव की ओर से पुरस्कृत किया जाता हैं।

दिसोम मांझी श्री मरांडी बताते है कि भाई-बहनों के अटूट रिश्ते का प्रतीक समझे जानेवाले इस पर्व के संबंध में कई पौराणिक कथाएं और किंदवंतियां प्रचलित हैं। इनमें सबसे अधिक एक राजा और रानी की कहनी काफी लोकप्रिय है। बताते हैं कि शिकार देश में एक राजा और रानी थे। रानी को किसी कारी नागिन हाड़वाहा नाम के नाग से प्रेम था। राजा शिकार के लिए हर दिन जंगल जाते थे लेकिन रानी राजा को कायरा नाला जंगल की ओर जाने से रोकती थी। इसके बावजूद एक दिन अचानक राजा उस जंगल की ओर चला गया। एक दिन कोई शिकार नहीं मिलने पर राजा ने एक काले नाग का शिकार कर लिया और सिर काट कर घर ले आया। राजा घर आया तो रानी ने आज किये गये शिकार के संबंध में जानकारी ली तो राजा ने बताया कि आज एक काले नाग का शिकार किया है जिसका सिर वह लेकर आया है।



राजा से शिकार वाली बात जानकार रानी नाराज हो गयीं और उन्होंने राजा से छुपकर नाग के सिर को राजभवन के समीप जमीन में दफन कर दिया। जहां एक कारी नागिन हड़वाहा पौधा उत्पन्न हुआ। रानी ने राजा से उस पौधे के नाम को लेकर शर्त रखी कि जो उस पौधे का नाम नहीं बता पायेगा उसे मौत की सजा दी जायेगी। राजा उस पौधे का नाम बताने में असमर्थ थे। रानी ने पूर्व शर्त के अनुसार, राजा के (मृत्यु दंड ) मौत के तिथि की घोषणा कर दी। इसकी सूचना पूरे राज्य में भेज दी गई। राजा ने अपनी बड़ी बहन मारांग दैय को भी यह सूचना भेजी।

इस सूचना से व्याकुल मारांग दैय अपने परिवार के साथ भाई की रक्षा के लिए मायके को निकल पड़ीं। रात हो जाने के कारण राजा की बड़ी बहन अपने परिवार के साथ एक पेड़ के नीचे रुक गयीं। उसी पेड़ पर एक गिद्ध भी अपने मासूम बच्चों के साथ घोसला बनाकर रहता था। घोसले में गिद्ध का बच्चा भूख से व्याकुल था। वह अपनी मां से कुछ खाना देने की जिद करने लगा। इस पर गिद्ध ने अपने बच्चों को बताया कि अगले दिन एक राजा को मौत की सजा सुनायी जानी है। अगले दिन सभी को खूब भोजन देंगे।

गिद्ध के बच्चों ने राजा को मौत की सजा दिये जाने का कारण जानना चाहा तो गिद्ध ने बच्चों को इसका कारण बताने के साथ बाग में लगे पौधे का नाम भी कारी नागिन हाड़वाहा बता दिया। गिद्ध की अपने बच्चों के साथ हुई बातचीत को पेड़ के नीचे रुकी राजा की बहन जान गयी। इसके बाद राजा की बहन अहले सुबह अपने भाई की रक्षा के लिए निकल पड़ी और मायके पहुंच कर अपने भाई को बाग में लगे पौधे का नाम बता दिया। इस पर राजा ने रानी को बाग के पौधे का नाम बता दिया। अब पासा पलट गया और राजा ने तीर से रानी का सिर अलग कर दिया।

इस कारण सोहराय पर्व के मौके पर बैजहा यानी शिकार का आयोजन किया जाता है और सभी भाई अपनी बहन को पूरे परिवार के साथ मायका आने का निमंत्रण देते हैं। बहन भी अपने परिवार के साथ अपने मायका में इस पर्व के आयोजन में अवश्य शामिल होती हैं। इस पर्व में बैजहा के दिन केला के पौधे के उपरी भाग में चावल का पीट्ठा बांधकर निशाना लगाया जाता है। बैजहा के दौरान केले के पौधे में लगे चावल के पीट्ठा पर जो व्यक्ति निशाना लगाने में सफल होता है उसे गांव का सबसे भाग्यशाली माना जाता है।

इसमें सफल व्यक्ति को गांव के लोग कंधे पर उठाकर ग्राम प्रधान के पास ले जाते हैं। इस दौरान लोग अपने-अपने घरों में हड़िया पांचय, मूढ़ी का सेवन करते हैं। यह पर्व मकर संक्रांति के दिन सम्पन्न हो जाता है।

वार्ता

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