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रोशनी से सराबोर विक्टोरिया हॉल अब बनेगा इटावा की विशेष पहचान

रोशनी से सराबोर विक्टोरिया हॉल अब बनेगा इटावा की विशेष पहचान

इटावा , 27 जनवरी(वार्ता)यमुनानदी के तट पर बसे उत्तर प्रदेश के इटावा शहर की पहचान ऐतिहासिक विक्टोरिया हॉल को गणतंत्र दिवस की शाम तिरंगी रोशनी से जगमगा दिया गया।

हर शाम यह ऐतिहासिक धरोहर इसी तरह से इटावा वासियो के साथ साथ अन्य लोगो को आंनद का अनूभूति प्रदान करता रहेगा ।

इटावा की जिलाधिकारी श्रीमती सेल्वा कुमारी के निर्देश पर उपजिलाधिकारी सिद्वार्थ ने इटावा महोत्सव कमेटी के सहयोग से इस ऐतिहासिक इमारत का रखरखाव करने का अहम फैसला लिया है। गणतंत्र दिवस के दिन पूरा लिया गया ।

देश की गुलामी के दौरान अंग्रेजों द्वारा बनबाई गई इमारत विक्टोरिया हॉल लंबे समय से उपेक्षित था। गणतंत्र दिवस की संध्या पर तिरंगे के रंग में सराबोर किया गया है। उपजिलाधिकारी सिद्वार्थ ने रविवार को यहॉ बताया कि विक्टोरिया हॉल तिरंगी रोशनी में शान से देश की आज़ादी का एहसास कराती प्रतीत हो रही है। कभी यह ऐतिहासिक इमारत उपेक्षित पड़ा था। इस अहम इमारत की बदहाली को देख कर इसके जीर्णाेद्धार का बीड़ा उठाया गया।

उन्होंने बताया कि जिलाधिकारी ने इस ऐतिहासिक धरोहर को सजाने सवारने के निर्देश दिये। नुमाइश कमेटी के सहयोग से नगरपालिका के अधिशासी अधिकारी अनिल कुमार के प्रयास से कुछ ही समय मे निखर कर खिलखिलाती यह इमारत दिखने लगी। जिलाधिकारी ने विशेष रुचि लेकर इस इमारत का जीर्णाेद्धार कराया गया। अब यह इमारत प्रत्येक शाम तिरंगी रोशनी से जगमग रहेगी। इसको बेहतर रूप प्रदान करने के लिये आगे भी प्रयास जारी रहेंगे।

इटावा के साई मंदिर के प्रबंधक संतोष वर्मा बताते है कि पक्का तालाब से निकलने वाले लोग नए रंग में रंगी विक्टोरिया इमारत देख कर प्रफुल्लित मन से प्रशासन की तारीफ करते नज़र आ रहे थे।

उन्होंने बताया कि पक्का तालाब नगर में मध्य में स्थित वो जगह है जहॉ लोग सुबह की सैर को जाते है और शाम को तालाब के इर्दगिर्द स्थित मंदिरों में पूजा अर्चना कर मन की शांति के लिये प्रार्थना करते है। उन्ही मंदिरों के बीच स्तिथ विक्टोरिया हॉल अपने अंदर इटावा का गौरवशाली इतिहास छुपाए हुए है। आज़ादी की जंग में अपना योगदान देने वाले इटावा के अमर स्वतंत्रता सेनानी इस इमारत को तिरंगे में देख कर अपने आप में गौरान्वित हो रहे होंगे।

इटावा के के.के.कालेज के इतिहास विभाग के प्रमुख डा.शैलेंद्र शर्मा ने बताया कि विक्टोरिया हाल का नये रूप मे लाने का कार्य किया जाना बेहद ही सराहनीय है। लाईटिंग के बाद नये रूप मे दिखायी दे रहा है। इस इमारत से ऐतिहासिक महत्व बना हुआ है। ए.यू.हयूम के दौर में इसका निर्माण हुआ था। यही से आजादी का बिगुल फूंका गया अब एक बार फिर से यहॉ पर आजादी की यादे लोगो की आवाजाही के बाद उनके मन मे ताजा हो जायेगी । महारानी विक्टोरिया के नाम पर जिले के रजवाड़ा व धनाढ्य घरानों ने शहर के पक्का तालाब के किनारे विक्टोरिया मेमोरियल हॉल का निर्माण कराया। जब ब्रिटिश सरकार ने रजवाड़ों को भारत दौरे पर आ रहीं इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया को खुश करने की सलाह दी। पक्का तालाब के किनारे न सिर्फ आजादी की लड़ाई के रूप में बल्कि कुछ अन्य स्मृतियों के साथ इसे संजोया गया है। 15 अगस्त 1957 को अंग्रेजी हुकूमत की यादों को मिटाने के लिए विक्टोरिया मेमोरियल हॉल का नाम बदलकर कमला नेहरू हॉल रखा गया और पक्के तालाब के बीचों-बीच अशोक स्तम्भ स्थापित कर दिया गया। यह निशानी थी कि भारत अब आजाद है।

ब्रिटिश क्राउन महारानी विक्टोरिया जब 19वीं शताब्दी के दूसरे दशक में भारत दौरे पर आयीं तो उन्हें खुश करने के लिए कलकत्ता, दिल्ली, मद्रास, सूरत व गोवा में विक्टोरिया मेमोरियल हॉल की स्थापना की गई। अन्य शहरों में भी इस प्रकार के मेमोरियल बनाए गए। जिन्हें वकिंगम पैलेस के रूप में डिजाइन किया गया था। हालांकि मुगल, मराठा और सामान्तों के असर वाले इटावा में मेमोरियल हॉल का स्वरूप एक अलग स्थापत्य कला के रूप में नजर आया। मंदिर और बुर्ज शैली के साथ ही हॉल का मुख्य भवन चर्चनुमा बनाया गया। मुख्य भवन के बाहर बने पौटिकों पर जलनिकासी के लिए सिंह मुख की स्थापना की गई। जो इसकी शौर्यता को बढ़ावा देती है। पास ही बना प्राचीन पक्का तालाब भी इसके प्रतिविम्ब को पानी में उतारकर आईना दिखाता है।

आजाद भारत को विरासत में मिले इस ऐतिहासिक भवन का वर्ष 1989 में तत्कालीन जिलाधिकारी राजीव खेर द्वारा नुमाइश के फंड से जीर्णाेद्धार कराया गया था । जमीदारों के सहयोग से पहली बार यहीं विक्टोरिया हॉल में इटावा प्रदर्शनी लगाई गई थी जो सात साल तक प्रत्येक वर्ष लगी।

इसी विक्टोरिया हॉल से जार्च पंचम के खिलाफ मुखर बिगुल फूंकने वाले कृष्णलाल जैन के नाती और राष्ट्रीय स्वतंत्रता सेनानी परिवार के प्रदेश महासचिव आकाशदीप जैन बताते है कि विक्टोरिया हाल का उनके लिए खासा महत्व इसलिए भी है क्यो कि उनके बाबा उनके कृष्णलाल जैन ने मात्र दस साल उम्र मे जार्ज पंचम की जुबली पर अंग्रेजी में गाई जा रही प्रार्थना पर पत्थर मार कर पंचम की तस्वीर को तोड डाला,पकडे जाने पर उनको दस बेंत की सजा दी गई ।

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