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मनोरंजन-साधना बाल स्टाइल दो अंतिम मुंबई

बॉलवुड में साधना ने अपने करियर की शुरूआत वर्ष 1960 में प्रदर्शित फिल्म लव इन शिमला से की। फिल्म के सेट पर उन्हें फिल्म के निर्देशक आर.के.नैय्यर से प्रेम हो गया और बाद में उन्होंने उनसे शादी कर ली। वर्ष 1961 में प्रदर्शित फिल्म हम दोनो साधना के करियर की एक और सुपरहिट फिल्म साबित हुई। इस फिल्म में उन्हें देवानंद के साथ काम करने का अवसर मिला। फिल्म में देवानंद ने दोहरी भूमिका निभायी थी।साधना और देवानंद की जोड़ी दर्शकों को बेहद पसंद आयी। इसके बाद साधना ने राज खोसला के निर्देशन में बनी फिल्म एक मुसाफिर एक हसीना में काम करने का अवसर मिला। फिल्म की कहानी एक ऐसे फौजी अफसर की जिंदगी पर आधारित थी जिसकी याददाश्त चली जाती है । फिल्म के निर्माण के समय फिल्म के निर्माता एस.मुखर्जी ने राज खोसला को यह राय दी कि फिल्म की कहानी लैशबैक से शुरू की जाये। एस. मुखर्जी की इस बात से राज खोसला सहमत नही थे।
बाद में वर्ष 1962 में जब फिल्म प्रदर्शित हुईं तो आरंभ में उसे दर्शको का अपेक्षित प्यार नही मिला और राज खोसला के कहने पर एस.मुखर्जी ने फिल्म का संपादन कराया और जब फिल्म को दुबारा प्रदर्शित किया तो फिल्म पर बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई। वर्ष 1963 में साधना की एक और सुपरहिट फिल्म मेरे महबूब प्रदर्शित हुई। वर्ष 1964 में साधना को एक बार फिर से राज खोसला के निर्देशन में बनी फिल्म वह कौन थी .. में काम करने का अवसर मिला। फिल्म के निर्माण के समय मनोज कुमार और अभिनेत्री के रूप में निमी का चयन किया गया था लेकिन राज खोसला ने निमी की जगह साधना का चयन किया।
रहस्य और रोमांच से भरपूर इस फिल्म में साधना की रहस्यमयी मुस्कान के दर्शक दीवाने हो गये। इस फिल्म के लिए साधना को मोना लिसा की तरह मुस्कान के साथ शो डाट कहा गया था। इस फिल्म के लिये साधना सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फिल्म फेयर पुरस्कार के लिये नामांकित की गयी। वर्ष 1965 में प्रदर्शित फिल्म वक्त साधना के करियर की एक और सुपरहिट फिल्म साबित हुईं। इस फिल्म के लिये भी उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फिल्म फेयर पुरस्कार के लिये नामांमित किया गया। वर्ष 1967 में राज खोसला ने एक बार फिर से साधना को लेकर फिल्म ..अनिता .. का निर्माण किया लेकिन यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह नकार दी गयी।
इस बीच साधना बीमार रहने लगी। बीमारी को छिपाने के लिए उन्होंने अपने गले में पट्टी बंधी अक्सर गले में दुपट्टा बांध लेती थी, यही साधना आइकन बन गया था और उस दौर की लड़कियों ने इसे भी फैशन के रूप में लिया था। इन सबके बीच साधना ने राजकुमार, आरजू, मेरा साया, इंतकाम , एक फूल दो माली जैसी कुछ सफल फिल्मों में काम किया। हिंदी सिनेमा में योगदान के लिए, अंतर्राष्ट्रीय भारतीय फ़ल्मि अकादमी (आईफा) द्धारा साधना को 2002 में लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से समानित भी किया गया।अपनी विशिष्ट अदायगी से दर्शकों के दिलों पर खास पहचान बनाने वाली साधना 25 दिसंबर 2015 को दुनिया को अलविदा कह गयी।
प्रेम
वार्ता
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