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बिंद्रा की विरासत जिंदा : अग्रीमा ने साधा रजत, हिमाचल का खोला खाता

राजगीर/पटना 12 मई (वार्ता) बीजिंग ओलंपिक 2008 का वह स्वर्णिम पल, जब अभिनव बिंद्रा ने निशानेबाजी में भारत को पहला व्यक्तिगत स्वर्ण पदक दिलाया था, भले ही अग्रीमा कंवर की आंखों ने तब दुनिया को ठीक से देखा भी न हो लेकिन नियति ने इस क्षण को अग्रीमा के जीवन का एक अमिट हिस्सा बना दिया था।
जैसे-जैसे अग्रीमा बड़ी हुईं और बिंद्रा की उस ऐतिहासिक उपलब्धि से परिचित हुईं, उन्होंने उन्हें अपना आदर्श बना लिया और अब उसी प्रेरणा के सहारे अग्रीमा ने बिहार के खेलो इंडिया यूथ गेम्स 2025 में महिलाओं की स्कीट शूटिंग स्पर्धा में रजत पदक जीतकर हिमाचल प्रदेश के खाते में पहला गौरव जोड़ा है।
उस समय अठारह माह की अबोध बालिका अग्रीमा ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि एक स्वर्ण पदक विजेता की कहानी उनके जीवन को इस कदर प्रभावित करेगी। अग्रीमा बताती हैं, “जब मैंने शूटिंग शुरू की तो मैं अभिनव बिंद्रा के बारे में ज्यादा नहीं जानती थी लेकिन कुछ साल पहले जब मैंने पिस्टल शूटिंग शुरू की तो मेरे पिता, जो भारतीय सेना में कर्नल हैं, ने मुझे बिंद्रा सर की आत्मकथा ‘अ शॉट एट हिस्ट्री’ भेंट की। उन्होंने कहा था कि यह किताब मुझे बहुत कुछ सिखाएगी और सच कहूं तो उनके हर शब्द सही थे।”
अग्रीमा विशेष रूप से एथेंस 2004 ओलंपिक में अभिनव बिंद्रा के पदक चूक जाने की कहानी से गहराई से जुड़ी महसूस करती हैं। उनकी आवाज में उस क्षण की गंभीरता झलकती है जब वह कहती हैं, “यह पढ़ना कि उन्होंने उस असफलता को कैसे स्वीकार किया, किस तरह धैर्य और पूर्णता के लिए अथक प्रयास किया और कैसे उन्होंने शानदार वापसी की, इसने मेरे मन पर एक गहरा प्रभाव डाला। मैंने यह समझा कि असफलताएं भी इस यात्रा का ही एक अभिन्न अंग हैं।”
अभिनव बिंद्रा के प्रति अग्रीमा का यह जुड़ाव सिर्फ एक प्रशंसक का सम्मान नहीं बल्कि एक शिष्य का अपने गुरु के प्रति समर्पण है। वह साझा करती हैं, “जब भी शूटिंग रेंज में कोई दिन अच्छा नहीं गुजरता तो मैं उनकी किताब के पन्ने पलटती हूँ। कुछ पंक्तियां ही मुझे यह याद दिलाने के लिए काफी होती हैं। हर नया दिन एक नया अवसर लेकर आता है। इस सोच ने न केवल मेरी शूटिंग तकनीक को बदला बल्कि मेरे सोचने के तरीके को भी एक नई दिशा दी है।”
अग्रीमा के खून में ही बंदूकें रची बसी हैं। उनके पिता सेना में हैं इसलिए बचपन से ही हथियारों ने उन्हें आकर्षित किया। वह पिस्टल और स्कीट शूटिंग के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहती हैं, “पिस्टल शूटिंग स्थिर और इनडोर होती है जबकि स्कीट शूटिंग बाहरी परिस्थितियों जैसे हवा, बारिश और अप्रत्याशित बदलावों से प्रभावित होती है, जो इसे और भी चुनौतीपूर्ण बनाती है और मुझे यही चुनौती पसंद है।” इस मुश्किल खेल में उन्हें रियो और टोक्यो ओलंपियन मैराज अहमद खान का मार्गदर्शन मिला है।
हिमाचल प्रदेश के ऊना से ताल्लुक रखने वाले अग्रीमा के माता-पिता भले ही जालंधर में जन्मे हों लेकिन अग्रीमा का दिल हमेशा हिमाचल के लिए धड़कता है। यही कारण है कि उन्होंने खेलो इंडिया यूथ गेम्स के दो संस्करणों में अपने गृह राज्य का प्रतिनिधित्व किया है। वह गर्व से कहती हैं, “मैं हमेशा हिमाचल से एक गहरा जुड़ाव महसूस करती हूं। मैंने देखा कि हमारे राज्य का इन आयोजनों में ज्यादा प्रतिनिधित्व नहीं होता इसलिए मुझे लगा कि अब समय आ गया है कि मैं अपनी जड़ों को इस मंच पर लेकर आऊं।”
पिछले साल चेन्नई में आयोजित खेलो इंडिया यूथ गेम्स में अग्रीमा मामूली अंतर से चूक गईं और पांचवें स्थान पर रहीं लेकिन इस बार उन्होंने दबाव को शांत मन से झेला और अपनी अचूक निशानेबाजी के दम पर वह रजत पदक हासिल किया, जिसका वह बेसब्री से इंतजार कर रही थीं। उनकी आवाज में आत्मविश्वास की नई लहर महसूस होती है जब वह कहती हैं, “इस पदक ने मेरे आत्मविश्वास को कई गुना बढ़ा दिया है। अब मुझे पता है कि अगर मैं एक बार यह कर सकती हूं तो मैं इसे दोबारा भी कर सकती हूं। मेरे पिता हमेशा कहते हैं, ‘एक शॉट पर ध्यान दो। ज्यादा मत सोचो। अगली कोशिश पर ध्यान केंद्रित करो।’ और यही तो बिंद्रा सर ने भी किया था।”
अग्रीमा की अगली नजर जूनियर नेशनल टीम में जगह बनाने और आगामी विश्वकप प्रतियोगिताओं में पदक जीतने पर टिकी है लेकिन उनके दिल में एक और हसरत पल रही है अपने आदर्श, अभिनव बिंद्रा से रूबरू मिलने की।
अग्रीमा कहती हैं, “शायद मैं उन्हें देखकर कुछ बोल भी न पाऊं लेकिन मैं उन्हें तहे दिल से धन्यवाद जरूर कहना चाहूंगी। उनकी कहानी ने मुझे हर मुश्किल में आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा दी है और मुझे पूरा विश्वास है कि उन्होंने मेरे जैसे न जाने कितने खिलाड़ियों को प्रेरित किया है।” अग्रीमा की यह रजत गाथा सिर्फ एक पदक की कहानी नहीं है बल्कि एक प्रेरणादायक यात्रा है, जो अभिनव बिंद्रा की विरासत को नई ऊंचाइयों तक ले जाती है।
सूरज शिवा
वार्ता
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