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एल्युमिनियम विनिर्माताओं के घटिया स्क्रैप पर शुल्क बढ़ाने की पुरजोर अपील

नई दिल्ली, 9 जुलाई (वार्ता) देश में एल्युमिनियम उद्योग के शीर्ष निकाय एल्युमिनियम एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एएआई) ने देश को आयातित निम्न गुणवत्ता वाले एल्युमिनियम स्क्रैप (कबाड़) का गोदाम बनने से रोके जाने के लिए तत्काल नीतिगत कदम उठाने और घटिया स्क्रैप के आयात पर शुल्क बढ़ने की मांग की है।
संगठन का कहना है कि एल्युमिनियम जैसे महत्वपूर्ण उद्योग को विदेशों से घटिया माल की डंपिंग के आगे असुरक्षित छोड़ना ठीक नहीं होगा।
वित्त मंत्रालय और खान मंत्रालय को प्रस्तुत ज्ञापन में एएआई ने ऐसा संतुलित समाधान अपनाने की मांग की है, जिससे वास्तविक और गुणवत्तापूर्ण रीसाइक्लिंग गतिविधियों को बढ़ावा मिले, साथ ही निम्न गुणवत्ता वाले एल्युमिनियम स्क्रैप की डंपिंग पर भी रोक लगाई जा सके। एएआई ने इसके लिए तत्काल राजकोषीय (कर संबंधी) कदम उठाने की अपील करते हुए कहा है कि एल्युमिनियम स्क्रैप पर 2.5 प्रतिशत की दर से मूल सीमाशुल्क (बीसीडी) तब तक जारी रखी जाए, जब तक सरकार लंबित बीआईएस स्क्रैप गुणवत्ता मानक जारी नहीं करती और ग्रेड के अनुसार एचएसएन कोड लागू नहीं करती। संगठन का कहना है कि इससे उच्च और निम्न गुणवत्ता वाले स्क्रैप के बीच अंतर किया जा सकेगा।
एएआई की मांग है कि बीआईएस के स्क्रैप गुणवत्ता मानक को बिना किसी और देरी के अधिसूचित किया जाए। वैश्विक देशों की तरह एचएस 7602 के तहत एल्युमिनियम स्क्रैप के लिए ग्रेड के अनुसार एचएसएन कोड लागू किए जाएं। मानक और एचएसएन कोड लागू होने के बाद ग्रेड 3 से ग्रेड 7 तक के निम्न गुणवत्ता वाले स्क्रैप पर आयात शुल्क बढ़ाकर 7.5 प्रतिशत किया जाए। एएआई ने एक संतुलित समाधान का सुझाव दिया है। इसके तहत, जब तक ये सुरक्षा उपाय लागू नहीं हो जाते, तब तक एल्युमिनियम स्क्रैप (एचएस 7602) पर 2.5 प्रतिशत आयात शुल्क को यथावत रखा जाए। साथ ही, आयात पर निर्भरता कम करने और सर्कुलर इकोनॉमी के लक्ष्य को बढ़ावा देने के लिए देश में स्क्रैप संग्रह और रीसाइक्लिंग की मजबूत व्यवस्था विकसित की जाए।
एएआई ने कहा है कि दुनिया के कई देश अपने एल्युमिनियम उद्योग को मजबूत बनाने के लिए सीमाशुल्क दर के चैप्टर 76 के तहत एल्युमिनियम उत्पादों पर 15 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक शुल्क और अन्य गैर-शुल्क प्रतिबंध लागू कर रहे हैं। साथ ही, वे 90 प्रतिशत से कम एल्युमिनियम वाले निम्न गुणवत्ता के स्क्रैप का निर्यात बढ़ा रहे हैं, जबकि उच्च गुणवत्ता वाले स्क्रैप को अपने देश में ही सुरक्षित रख रहे हैं।
एएआई के अनुसार, अमेरिका ने सेक्शन 232 के तहत शुल्क बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया है। वहीं, यूरोपीय संघ (ईयू) सीबीएएम और अन्य सुरक्षा उपायों को आगे बढ़ा रहा है। मलेशिया और चीन जैसे देश भी केवल उच्च गुणवत्ता वाले एल्युमिनियम स्क्रैप के आयात की अनुमति देते हैं।
एएआई का कहना है कि इन नीतियों के कारण वैश्विक स्तर पर एल्युमिनियम की अधिकता और निम्न गुणवत्ता वाले एल्युमिनियम स्क्रैप की भारत में डंपिंग बढ़ रही है। इसके विपरीत, भारत में स्क्रैप की गुणवत्ता के लिए अधिसूचित मानकों की अनुपस्थिति देश को निम्न गुणवत्ता वाले वैश्विक स्क्रैप के खुले बाजार में बदलने का जोखिम पैदा कर रही है।
संगठन का कहना है कि एल्युमिनियम अब केवल एक सामान्य धातु नहीं, बल्कि भविष्य के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक सामग्री बन चुका है। इसका उपयोग बिजली, परिवहन, बुनियादी ढांचा, रक्षा, एयरोस्पेस, पैकेजिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, बर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में किया जाता है। एसोसिएशन के अनुसार, यदि निम्न गुणवत्ता वाले एल्युमिनियम स्क्रैप का आयात बिना पर्याप्त नियंत्रण के जारी रहा, तो इसका व्यापक आर्थिक प्रभाव पड़ सकता है। इससे उत्पादों की गुणवत्ता, उपभोक्ताओं की सुरक्षा, विनिर्माण क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और भारत की एल्युमिनियम वैल्यू चेन की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
अपने ज्ञापन में एएआई ने " एल्युमीनियम और एल्युमीनियम अलॉय स्क्रैप - डिलीवरी की ज़रूरतें और शर्तें तुरंत जारी करने की मांग की है। एसोसिएशन के अनुसार, इस मानक पर नीति आयोग, भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस), जेएनएआरडीडीसी, खान मंत्रालय, प्राथमिक एल्युमिनियम उत्पादकों और रीसाइक्लर्स के साथ विस्तृत विचार-विमर्श पहले ही पूरा हो चुका है। इसके बावजूद यह मसौदा दो वर्षों से अधिक समय से लंबित है।
एएआई ने चेतावनी दी है कि वित्त वर्ष 2025-26 में चैप्टर 76 के तहत एल्युमिनियम का आयात 34,79,000 टन वार्षिक के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जिससे 88,434 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा व्यय हुआ। इनमें केवल एल्युमिनियम स्क्रैप का आयात 20,28,000 टन रहा जिस पर 40,203 करोड़ की विदेशी मुद्रा खर्च हुई। एसोसिएशन का कहना है कि यह स्थिति भारत के आत्मनिर्भरता के लक्ष्य के लिए चुनौती बन सकती है।
संगठन के बयान के अनुसार पिछले एक दशक में देश के एल्युमिनियम उद्योग ने लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया है और अब वेदांता, हिंडाल्को और नाल्को द्वारा 3 लाख करोड़ से अधिक के नए निवेश की तैयारी की जा रही है। इन निवेशों से वित्त वर्ष 2033 तक देश की प्राथमिक एल्युमिनियम उत्पादन क्षमता लगभग 9 मिलियन टन प्रतिवर्ष तक पहुंचने और एक लाख से अधिक रोजगार सृजित होने की उम्मीद है।
मनोहर, मधुकांत
वार्ता
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