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भारत


सेना ने दीर्घकालिक रणनीति के तहत व्यापक प्रौद्योगिकी रोड़मैप तैयार किया

नयी दिल्ली 07 अप्रैल (वार्ता) सेना ने युद्ध के निरंतर बदलते परिदृश्यों के बीच अपनी दीर्घकालिक आधुनिकीकरण रणनीति के तहत मानवरहित हवाई प्रणालियों (यूएएस), मानवरहित वायु तटीय प्रणालियों (यूएएलएस) और लोइटरिंग म्यूनिशन्स (एलएम) के भविष्य को रेखांकित करते हुए एक विस्तृत प्रौद्योगिकी रोडमैप तैयार किया है।
सेना उप प्रमुख (क्षमता विकास एवं स्थायित्व) लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर सिंह ने 'भारतीय सेना का मानवरहित हवाई प्रणालियों और लोइटरिंग म्यूनिशन्स के लिए प्रौद्योगिकी रोडमैप' नाम का दस्तावेज़ सोमवार को जारी किया । यह उद्योग, शिक्षा जगत और अनुसंधान एवं विकास संस्थानों को स्पष्ट और क्रियान्वयन योग्य दिशा प्रदान करता है, जिससे वे सेना द्वारा पहचाने गए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में निवेश, समय, ऊर्जा और तकनीकी प्रयासों को केंद्रित कर सकें।
सेना के अनुसार दूरदर्शी रणनीतिक दस्तावेज़ के रूप में तैयार किया गया यह रोडमैप आधुनिक युद्ध की बदलती आवश्यकताओं के साथ स्वदेशी क्षमताओं के समन्वय का लक्ष्य रखता है।
रोडमैप का एक प्रमुख हिस्सा निगरानी प्लेटफार्मों का विस्तार है। सेना अत्यधिक ऊंचाई दीर्घ अवधि (एचएएलई) और मध्यम ऊंचाई दीर्घ अवधि (एमएएलई) ड्रोन, उच्च-ऊंचाई छद्म उपग्रह (एचएपीएस) तथा मध्यम ऊंचाई स्थायी निगरानी प्रणाली (एमएपीएसएस) सहित विभिन्न प्रणालियों को शामिल करने की योजना बना रही है।
इनके साथ ही लंबी, मध्यम और छोटी दूरी की निगरानी के लिए डिज़ाइन किए गए यूएएलएस तथा निरंतर अवलोकन के लिए टेथर्ड ड्रोन भी शामिल होंगे। अधिकारियों के अनुसार, ये क्षमताएं संवेदनशील सीमाओं और संघर्ष क्षेत्रों में वास्तविक समय की खुफिया जानकारी संग्रहण और परिस्थितिजन्य जागरूकता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाएंगी।
रोडमैप में लोइटरिंग म्यूनिशन्स के एक मजबूत भंडार को भी प्राथमिकता दी गई है, जिसमें लंबी, मध्यम और छोटी दूरी के प्रकारों के साथ-साथ बड़े पैमाने पर तैनाती के लिए कम लागत वाले विकल्प शामिल हैं। सेना निगरानी और प्रहार दोनों क्षमताओं वाले स्वार्म ड्रोन तथा सटीक लक्ष्य साधने के लिए प्रथम-व्यक्ति-दृष्टि (एफपीवी) ड्रोन पर भी कार्य कर रही है।
वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, ये प्रणालियां कम क्षति के साथ लचीली प्रहार क्षमताएं प्रदान करने के लिए विकसित की जा रही हैं, जो आधुनिक युद्ध परिस्थितियों के अनुरूप हों।
वायु रक्षा रोडमैप का एक और महत्वपूर्ण क्षेत्र है। सेना ड्रोन-के-विरुद्ध-ड्रोन अवरोधक प्रणालियों, एंटी-स्वार्म संचालन में सक्षम ड्रोन, तथा प्रशिक्षण और छल भूमिका के लिए विमान या हेलीकॉप्टर अनुकरण करने वाले यूएएलएस पर काम कर रही है। इन प्रौद्योगिकियों का उद्देश्य शत्रु ड्रोन और मानवरहित झुंडों से उत्पन्न उभरते खतरों का मुकाबला करना है, जो हाल के वैश्विक संघर्षों में तेजी से प्रमुख हुए हैं।
सेना बहु-क्षेत्रीय अभियानों के लिए विशेष मानवरहित प्लेटफार्मों की एक श्रृंखला भी विकसित कर रही है। इनमें मदर–चाइल्ड ड्रोन विन्यास, हंटर–किलर यूएएलएस, हेलीकॉप्टरों और बख्तरबंद वाहनों के साथ मानव–मानवरहित समन्वय (एमयूएम-टी), तथा निर्देशित और अनिर्देशित हथियारों, यूएलपीजीएम या हथियारयुक्त पेलोड रहित यूएएलएस शामिल हैं।
अन्य प्रणालियों में सर्वेक्षण यूएएलएस, बारूदी सुरंग बिछाने वाले ड्रोन, स्मार्ट माइन के रूप में कार्य करने वाले स्वार्म ड्रोन, यूएएलएस-आधारित जैमर, डेटा-रिले प्लेटफार्म, तथा निकट दूरी के युद्ध और इनडोर टोही के लिए नैनो ड्रोन शामिल हैं।
युद्धक्षेत्र लॉजिस्टिक्स को सुदृढ़ करने के लिए रोडमैप में विशेष लॉजिस्टिक यूएएस/यूएएलएस भी शामिल हैं, जो कठिन भूभाग में आपूर्ति परिवहन करने में सक्षम होंगे, साथ ही लंबी दूरी के लॉजिस्टिक वाहक भी, जो दूरस्थ चौकियों और अग्रिम तैनात सैनिकों को मजबूती देंगे।
इन प्रणालियों से उच्च-गति अभियानों के दौरान सहनशक्ति और गतिशीलता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की अपेक्षा है।
तकनीकी और परिचालन प्राथमिकताओं को स्पष्ट रूप से निर्धारित करके, यह दस्तावेज़ परिचालन आवश्यकताओं और तकनीकी विकास के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु के रूप में कार्य करने का लक्ष्य रखता है, जिससे भारत का ड्रोन पारिस्थितिकी तंत्र एक संरचित और मांग-आधारित तरीके से विकसित हो सके।
यह पहल स्टार्टअप, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) तथा शिक्षा जगत की अधिक भागीदारी को भी प्रोत्साहित करेगी, साथ ही इस महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी में दीर्घकालिक निवेश को बढ़ावा देगी।
संजीव
वार्ता
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