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फर्जी कार्डियोलॉजिस्ट प्रकरण : आरोपी चिकित्सक के खिलाफ चालान, अपोलो प्रबंधन को क्लीन चिट; परिजनों ने सीबीआई जांच की मांग उठाई

बिलासपुर, 09 जुलाई (वार्ता) छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित फर्जी कार्डियोलॉजिस्ट प्रकरण में पुलिस ने मुख्य आरोपी डॉ. नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव उर्फ नरेन्द्र जॉन कैम के खिलाफ न्यायालय में चार्जशीट प्रस्तुत कर दी है। वहीं, अपोलो अस्पताल प्रबंधन एवं चयन प्रक्रिया की जांच में आपराधिक षड्यंत्र अथवा जानबूझकर की गई लापरवाही के पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर उनके पक्ष में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की गई है। इस बीच, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद शुक्ल के परिजनों ने जांच पर सवाल उठाते हुए पूरे मामले की सीबीआई से जांच कराने की मांग की है।
पुलिस जांच के अनुसार आरोपी ने स्वयं को एमबीबीएस, एमआरसीपी तथा इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी विशेषज्ञ बताकर बिलासपुर स्थित अपोलो अस्पताल में कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में कार्य किया। पूछताछ के दौरान उसने कई मरीजों की एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी करने की बात स्वीकार की, लेकिन अपनी विशेषज्ञता से संबंधित वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका।
जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि आरोपी ने कथित रूप से "नरेन्द्र जॉन कैम" नाम से आधार कार्ड, पैन कार्ड और अन्य पहचान दस्तावेज तैयार कराए थे। इस संबंध में छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल, उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज, दमोह पुलिस, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) तथा अपोलो अस्पताल सहित विभिन्न संस्थानों से दस्तावेज जुटाए गए, लेकिन उसके शैक्षणिक एवं व्यावसायिक दावों की पुष्टि नहीं हो सकी।
पुलिस जांच में आरोपी के कार्यकाल के दौरान उपचार कराने वाले लगभग 27 मरीजों की मृत्यु का उल्लेख सामने आया। हालांकि, पर्याप्त मेडिकल रिकॉर्ड और औपचारिक शिकायतों के अभाव में इन मौतों को कानूनी रूप से सीधे आरोपी की कथित फर्जी विशेषज्ञता से जोड़ने के लिए पर्याप्त आधार नहीं मिला। इस मामले में केवल दो शिकायतें दर्ज कराई गई थीं।
पुलिस ने फर्जी दस्तावेज तैयार करने, कूटरचना, धोखाधड़ी तथा फर्जी तरीके से विशेषज्ञ चिकित्सक बनकर इलाज करने के आरोपों में पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद 27 जून 2025 को आरोपी के विरुद्ध न्यायालय में चार्जशीट दाखिल की।
पुलिस ने अस्पताल प्रबंधन और चयन समिति की भूमिका की भी अलग से जांच की। जांच में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला जिससे यह सिद्ध हो सके कि आरोपी की नियुक्ति जानबूझकर अथवा किसी आपराधिक षड्यंत्र के तहत की गई थी। इसके आधार पर संबंधित पक्षों के विरुद्ध क्लोजर रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत की गई है।
यह मामला वर्ष 2006 से जुड़ा है। आरोप है कि डॉ. नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव उर्फ एन जॉन केम ने फर्जी डिग्री के आधार पर अपोलो अस्पताल में मरीजों का उपचार किया। मामला तब फिर चर्चा में आया जब मध्यप्रदेश के दमोह में उसकी गिरफ्तारी हुई। इसके बाद पूर्व विधानसभा अध्यक्ष स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद शुक्ल के पुत्र प्रो. प्रदीप शुक्ल ने सरकंडा थाने में शिकायत दर्ज कराई कि उनके पिता का उपचार भी इसी चिकित्सक ने किया था।
अपोलो अस्पताल के रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2002 से 2006 के बीच राजेंद्र प्रसाद शुक्ल का 13 बार उपचार हुआ। आरोपी चिकित्सक की नियुक्ति एक जून 2006 को अस्पताल में हुई। इसके बाद 21 जुलाई 2006 को शुक्ल अस्पताल में भर्ती हुए तथा दो अगस्त 2006 को आरोपी चिकित्सक ने उनकी एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी की। प्रक्रिया के कुछ घंटे बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई और 18 दिन वेंटिलेटर पर रहने के बाद 20 अगस्त 2006 को उनका निधन हो गया। लगभग 19 वर्ष बाद अप्रैल 2025 में परिजनों को जानकारी मिली कि उनका उपचार करने वाला चिकित्सक फर्जी डिग्री के मामले में गिरफ्तार हुआ है। इसके बाद शिकायत दर्ज होने पर एफआईआर हुई और पुलिस ने मामले की जांच शुरू की।
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह ने कहा, "जांच सिर्फ आरोपी डॉक्टर तक सीमित नहीं रखी गई, बल्कि यह भी परखा गया कि उसकी नियुक्ति किन परिस्थितियों में हुई, उसके दस्तावेजों का सत्यापन कैसे हुआ और क्या अस्पताल प्रबंधन या चयन समिति ने जानबूझकर किसी तरह की लापरवाही या आपराधिक साजिश की थी। इसी उद्देश्य से मामले की आगे जांच भी कराई गई, जिसके बाद कानूनी राय लेकर क्लोजर रिपोर्ट पेश की गई है।"
फिलहाल आरोपी चिकित्सक के विरुद्ध मामला न्यायालय में विचाराधीन है। दूसरी ओर, अपोलो प्रबंधन को मिली क्लीन चिट और राजेंद्र प्रसाद शुक्ल के परिजनों द्वारा सीबीआई जांच की मांग के बाद इस बहुचर्चित प्रकरण पर एक बार फिर सबकी नजरें अदालत की आगामी कार्रवाई पर टिक गई हैं।
पंकज सैनी
वार्ता
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